सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३६ ]
क्रियायास्तु गुणात्माभे क्रियामन्यां प्रयोजयेत् ।
पूर्वस्यां शान्तवेगायां न क्रियासंकरो हितः ॥४८॥
एक क्रिया के प्रयुक्त करने से यदि पाँच छे दिन तक कुछ लाभ नहीं दीखता, तो दूसरी क्रिया प्रयुक्त करनी चाहिये। प्रथम क्रिया के शान्त होने पर दूसरी क्रिया करनी चाहिये। क्रिया-संकर (दोनों क्रियाओं का एक साथ होना) करना उत्तम नहीं। एक ही काल में दो विरोधी क्रियाओं को करना क्रिया-संकर है ॥४८॥
गुणात्माभेऽपि सपदि यदि सैव क्रिया हिता ।
कर्तव्यैव तदा न्याधिः कृच्छ्रासाध्यतमो यदि ॥४९॥
यदि रोग कष्टसाध्य हो तो क्रिया के लाभ (गुण) न होने पर भी, यदि वही क्रिया हितकारी हो तो जल्दी में उसे बदल नहीं देना चाहिये, अपितु उसी को कुछ अधिक समय तक चालू रखना चाहिये ॥४९॥
य एवमेन विधिमेकरूपं विभर्ति कालादिवशेन धीमान् ।
स मृत्युपाग्राह्यगतो गदौघाद्विच्छनति भेषज्यपरश्वघेन ॥
जो वैद्य इस प्रकार इस पूर्वोक्त विधान को बिना किसी भेद के ग्रहण कर लेता है, बुद्धिमान् कालादि के सामर्थ्य द्वारा रोगसमूहों को भेषज्य रूपी कुल्हाड़े से काटता है ॥५०॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने आतुरोपक्रमणीयो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः ॥१५॥
पट्त्रिंशतमोऽध्यायः
अथातो भूमिप्रविभागीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥१,२॥
इसके आगे 'भूमि-प्रविभागीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१॥
श्वभ्रशर्कराश्मविषमवलमीकरमशानाघातनदेवतायतनसिकताभरतुपहतामनूषरामभङ्गुरामदूरोदकां स्निग्धां प्ररोहवतीं मृद्वीं स्थिरां समां कृष्णां गौरां लोहितां वा भूमिमौषधग्रहणाय परीच्येत् । तस्यां जातमपि क्रुमिविष-शक्षांतपपवनदहनतोयसंवाधमार्गेरनुपहतमेकरसं पुष्टं पृथक्वगाढमूलमुदीच्य्यां चौषधमाद्वीतेत्येष भूमिपरीक्षा-विशेषः सामान्यः ॥३॥
यह भूमि का विभाग दो प्रकार का है—सामान्य और विशेष। सामान्य भूमि को कहते हैं—श्वभ्र (बिल), शर्करा (पत्थर के टुकड़े), अश्म (पत्थर), विषम, वलमीक, रमशान, आघातन (वधस्थान), देवायतन (मन्दिर), सिकता (बालुका) से रहित, अनूषरा (ऊधर रहित), अभंगुर (दराड़ों रहित), भङ्गुरादका (जहाँ पर पानी दूर न हो साधारण), स्निग्धा, प्ररोहवती (जहाँ पर बीजअंकुर जन्मते हैं), कोमल, स्थिर
(वायु, पानी से जहाँ की मिट्टी न खिसकती हो), समान (ऊँची नीची नहीं), काली, सफेद, रक्तवर्ण भूमि की औषध के लिये परीक्षा करनी चाहिये। इस भूमि में उत्पन्न औषधि को भी—कृमि, विष, शस्त्र, धूप, वायु, अग्नि, पानी से अपीड़ित, एकरस (उत्कृष्ट रसयुक्त), पुष्ट (बलवान्), पृथु, विशाल, अवगाढमूल (भूमि में प्रविष्ट मूलवाली), उत्तर दिशा में स्थित औषध का (उत्तर दिशा में मुख करके) ग्रहण करना चाहिये। यह सामान्य भूमि परीक्षा-विधि है ॥३॥
विशेषस्तु तत्र अश्मवती स्थिरा गुर्वी श्यामा कृष्णा वा स्थूलवृक्षशस्यप्राया स्वगुणभूयिष्ठा; स्निग्धा शीतला-ऽऽसन्चोदका स्निग्धशस्यरुणकोमलवृक्षप्राया शुक्लाऽऽमृ-गुणभूयिष्ठा, नानावर्णा लब्धश्मवती प्रत्रिरलालपपाण्डु-वृक्षप्ररोहाऽग्निगुणभूयिष्ठा, रूक्षा भस्मरासभवर्णा तनु-वृक्षालपरसकोटरवृक्षप्रायाऽनिलगुणभूयिष्ठा, मृद्वी समा श्वभ्रवत्यन्यत्करसजला सर्वतोऽसारवृक्षा महापर्वतयुक्ष-प्राया श्यामा चाकागुणभूयिष्ठा ॥४॥
विशेष भूमिपरीक्षा—पत्थरोंवाली, स्थिर, गुरु, श्याम, कृष्ण, स्थूल वृक्षों से तथा मोटे अन्न से भरी, भूमि पृथ्वीगुण-भूयिष्ट होती है। स्निग्ध, शीतल एवं समीपवर्ती पानीवाली, स्निग्ध सस्य, तिनके एवं कोमल वृक्षों से युक्त एवं निर्मल भूमि पानी के गुणोंवाली होती है। नाना प्रकार के रङ्गों की, छोटे-छोटे पत्थरोंवाली विरले एवं छोटे-छोटे पीले वृक्ष एवं अंकुरों-वाली भूमि अग्निगुणबहुल होती है। रूक्ष, भस्म या गर्दम के रङ्गवाली, पतले रूक्ष, कोटर (घोवल), तथा अल्परसवाले वृक्षों से युक्त भूमि वायुगुणबहुल होती है। कोमल, समान, गड्ढों-वाली, अन्यत्करस, अन्यत्क जलवाली, सब स्थानों में सार रहित वृक्षोंवाली, बड़े-बड़े पर्वत-वृक्षोंवाली, श्यामवर्ण भूमि आकाश-गुणबहुल होती है ॥४॥
अत्र केचिदाहुराचार्याः—प्रावृद्धवर्षाशरद्देमन्तवसन्तग्रीष्मेषु यथासंख्यं मूलपत्रवक्रक्षीरसारफलाद्याददी-तेति, तत्तु न सम्यक्, सौम्याग्नेयत्वाद्भज्जगतः। सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वतुष्वाद्दीत, आग्नेयान्याग्नेयेषु एवम-न्यापन्नगुणानि भवन्ति। सौम्यान्यौषधानि सौम्येष्वतुषु गृहीतानि सोमगुणभूयिष्ठायां भूमौ जातान्यतिमधुरस्ति-ग्धशीतानि जायन्ते। एतेन शेषं व्याख्यातम् ॥५॥
कई आचार्यों का कथन है कि—प्रावृट् (वर्षा के आदि मास), वर्षा, शरद, हेमन्त, वसन्त एवं ग्रीष्म ऋतुओं में क्रमशः मूल, पत्र, त्वचा, क्षीर, सार और फलों का ग्रहण करना चाहिये। यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि जगत् आग्नेय एवं सौम्य तत्त्वों से बना है। इसलिये सौम्य औषधियों को सौम्य ऋतु में (दक्षिणायन में) लेना चाहिये और आग्नेय औषधियों को आग्नेय ऋतु में (उत्तरायण में) ग्रहण करना चाहिये। इस प्रकार ग्रहण से अद्विषित गुणवाली होती है। सौम्य औषधियाँ