भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३५ ]

सूत्रस्थानम्

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चरक ने भी कहा है कि—“सात्त्व्यं नाम तत् यत् सातत्येन उत्पद्यमानं उपशेते” अर्थात् जो आहार विहार निरन्तर या बहुत काल तक सेवन करने से “उपशय” हो जाते हैं वह “सात्त्व्य” कहे जाते हैं। सात्त्व्यार्थो हि उपशयार्थः—अर्थात् सात्त्व्य का अर्थ—तात्पर्य ही उपशय का अर्थ है। उदाहरणार्थ—अनूपदेश अनारोग्यकर होता है, परन्तु वहाँ अधिक समय तक निवास करने से कोई कष्ट नहीं होता, दूध एवं खिचड़ी एक साथ खाने से आमविष उत्पन्न हो जाता है। परन्तु—सी० पी० के निवासी खाते हैं तो कोई हानि नहीं होती, दिवास्वप्न निषिद्ध है—हानि कर भी है, परन्तु जो सदा दिन में सोते हैं उनको कोई हानि नहीं होती आदि २। रोग भी सात्त्व्य हो जाते हैं, यथा पुराने व्रण एवं श्वास कास आदि और रुजाकर भाव का नाम रोग है या शल्य है, परन्तु ऐसे शल्य नहीं निकाले जाते जो कष्ट नहीं देते, यथा—सोना आदि के सूक्ष्म शल्य देखिये—इसी स्थान का अ० २६ श्लो० २०, २१। ३६॥

योरसः कल्पते यस्य सुखायैव निषेवितः।

व्यायामजातमन्यद्वा तत् सात्त्व्यमिति निर्दिशेत् ॥४०॥

जोरस (आहार) अथवा व्यायाम (विहार) तथा अन्य (औषध) निन्तर सेवन करने पर सुखदायक ही हो जाता है वह सब “सात्त्व्य” कहलाता है ॥४०॥

प्रकृति भेषजं चोपरिष्टाद्व्यायामः ॥४१॥

प्रकृति शरीरस्थान और भेषज का वर्णन आगे करेंगे ॥

देशस्त्वानूपो जाङ्गलः साधारण इति । तत्र, बहूद-कनिन्मोन्नतनदीवर्षगहनो मृदुशीतानिलो बहुमहापर्वतवृक्षो मृदुसुकुमारोपचितशरीरमनुष्यप्रायः कफवातरागभूषिष्ट-श्रानूपः; आकाशसमः प्रविरलालयकण्टकिवृक्षप्रायोऽल्प-वर्षप्रसन्नवणोदपानोदकप्राय उष्णदारुणवातः प्रविरलालय-शैलः स्थिरकृशशरीरमनुष्यप्रायो वातपित्तरोगभूषिष्टश्रजाङ्गलः; उभयदेशलक्षणः साधारण इति ॥४२॥

देश तीन प्रकार का है। यथा—आनूप, जांगल और साधारण, इनमें जिस देश में बहुत पानी हो, बहुत नीची-ऊँची जगह हो, बहुत नदियाँ हों, बहुत वर्षा पड़ती हो, वन हो, मृदु एवं शीतल वायु बहती हो, बहुत एवं बड़े-बड़े पर्वत एवं वृक्ष हों, जिस देश के मनुष्य कोमल सुकुमार अङ्गोंवाले हों, जहाँ पर कफ एवं वायु के रोग प्रायः करके होते हों, वह देश आनूप है। जो देश आकाश से समान नीची-ऊँची जगह से रहित, थोड़े एवं काटेवाले बिल्वरे-वृक्षों से युक्त, जहाँ पर बरसात नदी झरने आदि पानी के साधन कम हों, जहाँ पर गरम-कठोर वायु चलती हो, बिल्व-छोटे पहाड़ हों, जहाँ के मनुष्य स्थिर-कृश शरीरवाले हों, जहाँ पर वायु एवं पित्त के रोग प्रायः

करके होते हैं, वह जांगल देश है। जिस देश में दोनों देशों के लक्षण होते हैं, वह साधारण देश है ॥४२॥

भवन्ति चात्र—

समाः साधारणे यस्माच्छोतवर्षोष्ममार्कताः।

दोषाणां समता जन्तोस्तस्मात्साधारणो मतः ॥४३॥

कहा भी है—

चूँकि शीत, बरसात, गरमी और वायु, ये वस्तुएँ साधारण देश में समान ही रहती हैं, एवं मनुष्य के दोषों में भी समानता रहती है, इसलिये इसको साधारण देश कहते हैं ॥४३॥

न तथा बलवन्तः स्युजंलजा वा स्थलाहृताः।

स्वदेशे निचिता दोषा अन्यस्मिन् कोपमागताः ॥४४॥

उचिते वर्तमानस्य नास्ति देशकृतं भयम्।

आहारस्वप्नचेष्टादौ तद्देशस्य गुणे सति ॥४५॥

जिस प्रकार जलजन्य पशु (कङ्कुवे आदि) स्थल में आकर उतने बलवान् नहीं रहते, या स्थलजन्य गाय आदि जल में जाकर उतने बलशाली नहीं रहते इसी प्रकार अपने देश में संचित दोष—अपने प्रतिकूल गुणवाले देश में जाकर कुपित होने से उतने बलशाली नहीं रहते। यथा आनूप देश में संचित कफ जांगल देश में जाने पर यदि कुपित होता है तो देशजन्य कोई भय नहीं। परन्तु यदि आनूप देश में संचित कफ जांगल देश में दिवा-स्वप्न आदि करने से कुपित होता है तो भय है। ठीक प्रकार से रहने पर भी जब देशजन्य कोप होता है तो भय नहीं। यद्यपि आहार, स्वप्न, चेष्टा आदि—उस देश के गुण—उचित रूप में हों तो भय नहीं होता ॥४४, ४५॥

देशप्रकृतिसात्त्व्युर्विपरीतोऽविरोधितयः।

संपत्तौ भिषगादीनां बलसत्त्वायुषां तथा ॥४६॥

केवलः समदेशाग्नेः सुखसाध्यतमो गदः।

अतोऽन्यथा त्वसाध्यः स्यात्कृच्छ्रो व्यामिश्रलक्षणः ॥

सुखसाध्य रोग—देशविपरीत (जांगल देश में कफरोग), प्रकृतिविपरीत (पित्तप्रकृति मनुष्य को कफरोग), सात्त्व्यविपरीत (कटुसात्त्व्य को कफरोगोत्पत्ति), ऋतुविपरीत (शरद् ऋतु में वातजन्य) रोग होना, नवीन रोग की अवस्था में भिषग, रोगी, भेषज, परिचारक गुणवान् होने पर, बल-सत्त्व, एवं वायु आदि की भी सम्पत्ति में, केवल एक दोष से उत्पन्न, समान-कायामिन पुरुष में रोग सुखसाध्य होता है। इनसे विपरीत अवस्थाओं में रोग असाध्य है। जिस रोग में साध्य एवं असाध्य के लक्षण मिले रहते हैं, वह कष्टसाध्य है ॥४६, ४७॥

१ अपवाद—

“ज्वरे तु ह्युदोषत्वं प्रमेहो तुल्यहृष्यता।

रक्तगुल्मे पुराणत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥”