सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ ३०-३५ ]
बीस वर्ष तक वृद्धि, तीस साल तक यौवन, चालीस तक सब घातु इन्द्रियाँ बल-वीर्य में सम्पूर्णता रखती हैं, इसके आगे सत्तर वर्ष तक धीरे-धीरे कमी क्षीणता आरम्भ हो जाती है। सत्तर वर्ष के आगे-घातु, इन्द्रिय, बल, वीर्य, उत्साह में दिन प्रति-दिन क्षीणता प्रारम्भ हो जाती है, शरीर में बलियाँ पड़ जाती हैं, सिर के बाल श्वेत हो जाते हैं, बाल गिरने लगते हैं, कास श्वास आदि रोगों से पीड़ित होकर सम्पूर्ण क्रियाओं में अस-मर्थता आ जाती है, इस अवस्था को वृद्धावस्था कहते हैं। जिस प्रकार पुराना घर बरसात आदि से गिर रहा होता है, वही अवस्था इस समय शरीर की होती है ॥२६॥
तत्रोत्तरोत्तरासु व्योवस्थासूत्रोत्तरा भेषजमात्रा-विशेषा भवन्ति, ऋते च परिहाणेः, तत्राद्यापेक्षया प्रति-कुर्वीत ॥३०॥
सत्तर वर्ष के ऊपर की आयु को छोड़कर, जिस प्रकार उत्तरोत्तर आयु बढ़ती जाती है, उसी प्रकार औषध की मात्रा भी उत्कृष्ट (बढ़ती) हो जाती है। इस वृद्धावस्था में बाल्या-वस्था के समान औषधमात्रा देनी चाहिये ॥३०॥
भवन्ति चान्न—
वाले विवर्धते इलेषमा मध्यमे पित्तमेव तु।
भूयिष्ठं वर्धते वायुर्बुद्धे तद्वादय योजयेत् ॥३१॥
कहा भी है—
बाल्यावस्था में कफ बहुत बढ़ता है, मध्यमावस्था में पित्त, वृद्धावस्था में वायु विशेष रूप से बढ़ती है, इसलिये इनका विचार करके औषध देनी चाहिये ॥३१॥
अग्निक्षारविरकेस्तु बालवृद्धौ विवर्जयेत्।
तत्साध्येषु विकारेषु मृद्धौ कुर्यात् क्रियां ज्ञानैः ॥३२॥
बालक एवं वृद्ध पुरुषों में अग्नि, क्षार एवं विरेचन कर्म नहीं करने चाहिये। यदि इन कार्यों से साध्य रोगों में क्रिया करनी पड़े तो कोमल रूप में करनी चाहिये। यथा—दारण कार्य में—कपोत गीध की विष्टा, क्षार कर्म में आवाप-प्रतिवाप हीन मृदु क्षार, विरेचन में अमल्लास आदि मृदु द्रव्य, अग्नि-कर्म अजाशक्तु से करना चाहिये ॥३२॥
देहः स्थूलः क्रुशो, मध्य इति प्रागुपदिष्टः ॥३३॥
१ मात्रा विवेचन—
‘प्रथमे मासि जातस्य शिशोर्भेषजरक्तिना।
अवलेह्या तु कर्तव्या मधुचौरसिताघृतैः ॥
एकैकां वर्धयेत्तावद यावत्सवत्सरो भवेत्।
तदुद्ध्वं माषवृद्धिः स्यात् यावत्पोडशकाद्विकाः ॥
षोडशान्वात्ततस्तूढ्वं यावदासप्ततैरिति।
एवमेव विभागोऽयं तदुद्ध्वं बालवक्रिया ॥”
देहपरीक्षा—शरीर स्थूल, क्रुश, मध्य, तीन प्रकार का है, यह पहिले कह चुके हैं ॥३३॥
कर्शयेद् बृंहयेत्वापि सना स्थूलकुरु शौरौ।
रक्षणं वैद्य मध्यस्य कुर्वीत सततं भिषक् ॥३४॥
स्थूल शरीर का कर्षण और क्रुश पुरुष का बृंहण सदा करना चाहिये। मध्यम शरीर की रक्षा निरन्तर वैद्य को करनी चाहिये ॥३४॥
बलमभिहितगुणं, दौर्बल्यं तु स्वभाबदोषजरादिभि-रवेक्षितव्यम्। यस्माद्बलवतः सर्वक्रियाप्रवृत्तिस्तस्माद्बलमेव प्रधानमधिकरणनाम् ॥३५॥
बल के गुण कह चुके हैं। दुर्बलता की स्वभाव (माता-पिता के शुक्र शोणित से), दोष (वातादि), वृद्धावस्था आदि से परीक्षा करनी चाहिये चूंकि बल के कारण से ही सब क्रियाओं में प्रवृत्ति होती है, इसलिये क्रियाओं को धारण करनेवालों में बल ही सब से प्रधान है ॥३५॥
केचित् क्रुशाः प्राणवन्तः स्थूलाश्चालपबला नराः।
तस्मात् स्थिरत्वं व्यायामैर्बलं वैद्यः प्रतर्कयेत् ॥३६॥
कई शरीर से क्रुश व्यक्ति प्राणवान् होते हैं और कई स्थूल व्यक्ति अल्पबलवाले होते हैं। इसलिये वैद्य को चाहिए कि स्थिरस्वरूपी बल व्यायाम आदि कार्यों से जानें ॥३६॥
सन्त्वं तु न्यसनाभ्युदयक्रियादिस्थानेन्यविकलवकरम् ॥३७॥ सन्त्ववान् सहते सर्वं संस्तभ्यात्मानमात्मना।
राजसः स्तभ्यमानोऽन्यः सहते नैव तामसः ॥३८॥
सत्त्व (मनोबल)—दुःख एवं सुख में कार्य भार आदि तथा छेदन भेदन आदि के स्थानों-अवसरों में ग्लानि या हर्ष का उत्पन्न न होना सत्त्व बल है। यह बल तीन प्रकार का है—सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। इनमें—जो मनुष्य अपने मन को स्वयं हृद बनावकर सब कुछ सहन करना है, वह सात्त्विक बलवाला है। और जो दूसरे मनुष्यों से हृद किया जाता है, वह राजस बलवाला है। और जो किसी प्रकार हृद नहीं होता, धैर्य धारण नहीं करता, वह तामसिक बलवाला है। यथा चरक में—सत्त्वमुच्यते मनः। तच्छरीरस्य तंत्रकामात्मसंयोगात्। तत् त्रिविधं बलभेदेन-प्रवरं, मध्यमम्, अवरं चेति ॥
सात्स्यानि तु देशकालजात्युतुरोगव्यायामोदकदिवास्वप्नरसप्रभृतीनि प्रकृतिविरुद्धान्यपि यान्यबाधकराणि भवन्ति ॥३९॥
जो देश, काल, जन्य, श्रुतु, रोग, व्यायाम, जल, दिवास्वप्न तथा मधुर आदि—प्रकृति के विरुद्ध होने पर भी कोई कष्ट नहीं देते वे “सात्त्व्य” कहे जाते हैं ॥ यही
१ विस्तार के लिये चरक विमान ४०-८।११-१९ में देखिये।
२ सात्त्व्य के लिये चरक विमान स्थान आँठवां अध्याय देखिये।