भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ३५ ] १७

सूत्रस्थानम्

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युक्तमुदरशिरोगौरवकासश्वासप्रसेकच्छदिंगात्रसद्दानानि कृत्वा महता कालेन पचति, स मन्दः ॥२५॥

व्रणप्रश्नीय अध्याय में प्रथम कहा है कि—अग्नि अन्न का पाचक है। यहाँ एक अग्नि दोषों से आयुक्त रहने पर एक प्रकार की है। दोषों से युक्त होने पर विकृतावस्था में तीन प्रकार की है। यथा—वायु के कारण विषम, पित्त के कारण तीक्ष्ण, कफ के कारण मन्द, तीनों धातुओं के समान होने से सम होती है। इन्हीं में जो अग्नि ठीक समय पर खाये अन्न को भली प्रकार से पचाती है, वह सम अग्नि है, यह तीनों दोषों के समान होने से होती है। जो अग्नि कभी तो भली प्रकार पचाती है और कभी-आधमान, शुल्क, उदवाचत्, अतिसार, पेट में भारीपन, अन्नों में गड़गड़ाहट, प्रवाहण (कुन्थन) उत्पन्न करके पचाती है, वह विषम है। जो अग्नि बहुत अधिक मात्रा में खाये अन्न को भी शीघ्र पचा देती है, वह तीक्ष्ण है। यही तीक्ष्णाग्नि बढ़कर अत्यग्नि कहाती है। यह अत्यग्नि बार-बार अधिक मात्रा में खाये अन्न को बहुत जल्दी पचा देती है, पचाने के पश्चात् गले, तालु, ओठ में शोष, जलन और संताप उत्पन्न करती है। जो अग्नि थोड़ी सी मात्रा में खाये अन्न को भी-उदर, खिर में भारीपन, कास, श्वास, लालाखाव, वमन, अङ्गों की शिथिलता करके बहुत समय पीछे पकाती है, वह मन्द अग्नि है।

वि० मन्तव्य—अत्यग्नि का दूसरा नाम 'भस्मक' है। दोषाडनविषम अग्नि का ही नाम 'सम' या 'समाग्नि' है ॥ विषमो वातजान् रोगास्तीक्ष्णः पित्तनिमित्तजान्। करोत्यग्निस्तथा मन्दो विकारान् कफसंभवान् ॥२५॥

विषमाग्नि वातजन्य रोगों को, तीक्ष्णाग्नि पित्तजन्य रोगों को, मन्दाग्नि कफजन्य रोगों को उत्पन्न करती है ॥२५॥

तत्र, समे परिरक्षणं कुर्वीत; विषमे स्निग्धामल्लवणैः क्रियाविशेषैः प्रतिकुर्वीत, तीक्ष्णे मधुरस्निग्धशीतैर्विरेकैश्च, एवमेवात्यग्नी, विशेषेण माहिषैश्च क्षीरदधिर्सर्पिभिः, मन्दे कटुतिक्तकषायैर्वमनैश्च ॥२६॥

इनमें समाग्नि की रक्षा करनी चाहिये। तीक्ष्णाग्नि की—स्निग्ध, अम्ल एवं लवण क्रियाओं से- तीक्ष्णाग्नि एवं अत्यग्नि की—मधुर, स्निग्ध, क्षीतवीर्य एवं विरेचनों द्वारा, खासकर अत्यग्नि में—भैंस का दही, घी एवं दूध देना चाहिये। मन्दाग्नि

१ वात आदि प्रकृतिवाले पुरुषों में वात आदि दोषों से युक्त होती है। इसलिये विषम, तीक्ष्ण, मंद ये तीन भेद हैं। अग्नि यद्यपि ईश्वर है, तो भी पूर्व-जन्मकृत कर्मों के कारण इस अग्नि में विषम, तीक्ष्ण, मन्द-दोष होते हैं। अथवा पित्त के दोष से अग्नि में भी दोष आ जाता है।

की कटु, तिक्त-कषाय एवं वमनों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥२६॥

जाठरो भगवानग्निरीश्वरोऽत्रस्य पाचकः।

सौन्दर्याद्वसानाददानो विवेकतु नैव गक्यते ॥२७॥

जाठराग्नि-भगवान् (महात्म्यवान्) ईश्वर (आठ प्रकार के ऐश्वर्य्य युक्त, अग्निमादि ऐश्वर्य्याश्ली), अन्न का पाचक है। मधुर आदि रसों को परिपाक के लिये ग्रहण करती हुई भी यह अग्नि सूक्ष्म होने के कारण जानी नहीं जा सकती।

वि० मन्तव्य—ईश्वर—आत्मा के समान जीवन का हेतु है, क्योंकि अग्नि के ही कारण-आयु है और अग्नि शान्त होने पर मर जाता है और समाग्नि रहने पर नीरोग रहकर चिरकाल तक जीता है। ईदृशु वरः (ईश्वरः) जीवन का सामर्थ्य देनेवाले अन्य कफ वात आदि में श्रेष्ठ है। अथवा ईश्वर-सामर्थ्याश्ली (सम) अग्नि ही भगवान् है ॥२७॥

प्राणापानसमानैस्तु सर्वतः पवनैस्त्रिभिः।

ध्यामते पालयते चापि स्वां स्वां गतिमवस्थितैः ॥२८॥

प्राण अपान एवं समान ये तीन प्रकार की वायुएँ, अपने अपने स्थानों में रहती हुई अपनी अपनी क्रियाशक्ति से इस अग्नि को प्रज्वलित करती हैं और पालती हैं। फूँक से जिस प्रकार अग्नि तीव्र होती है उसी प्रकार इन वायुओं द्वारा अग्नि भी देदीप्यमान होती है ॥२८॥

वयस्तु त्रिविधं—बाल्यं, मध्यं, वृद्धमिति। तत्रोन्नपोडशवर्षीया बालाः। ते त्रिविधाः—क्षीरपाः, क्षीरान्नदाः, अन्नदा इति। तेषु संवत्सरपराः क्षीरपाः, द्विसंवत्सरपराः क्षीरान्नदाः, परतोऽन्नदा इति। षोडशसप्तत्योन्नतरे मध्यं वयः। तस्य विकल्पो—वृद्धिः, यौवनं, संपूर्णता, परिहाणिरिति। तत्र, आविशतेवृद्धिः, आविश्रतो यौवनम्, आचत्वारिंशतः सर्वथा त्विन्द्रियबलवीर्यसंपूर्णता, अत ऊर्ध्वसोषत्वपरिहाणियां त्वं समतिरिति। सप्ततेरूर्ध्वं क्षीयमाणधात्विन्द्रियबलवीर्योत्साहमहन्मन्यहन्ति वलीपलितखा-लित्यजुष्टं कासश्वासप्रभृतिभिरुद्वैरभिमूयमानं सर्व-क्रियास्वसमर्थ जीर्णोत्तमिवाभिवृष्टमवसोदन्तं वृद्धमाचक्षते ॥२९॥

वय तीन प्रकार की है। यथा—बाल्य, मध्य और वृद्धावस्था। इनमें सोलह वर्ष की आयु से कम आयु के बालक होते हैं। ये बालक भी तीन प्रकार के हैं, १-क्षीर पीनेवाले, २-दूध और अन्न खानेवाले, ३-अन्न खानेवाले। इनमें एक साल की आयु तक दूध पीनेवाले, दो साल के दूध एवं अन्न खानेवाले, इससे बड़ी उमर के बच्चे अन्न खानेवाले हैं। सोलह और सत्तर वर्ष के बीच की आयु मध्यम आयु है। इस मध्यम आयु के भेद वृद्धि, यौवन, संपूर्णता और हानि हैं। इनमें