सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० ३७]
चीनी, काच के हण्डी का, मत्तवान्, बोटल), फलक (फट्टे-आलमारी, टॉड आदि) में घरे अथच शंकु (विलङ्ग, छत को कुण्डा आदि) पर लटकाए गये हों ॥ १७ ॥ इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने भूमिप्रविभागीयो नाम षट्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥
सप्तत्रिंशतमोऽध्यायः
अथातो मिश्रकमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥ इसके आगे 'मिश्रक अध्याय' की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥ मातुलुङ्ग्याग्निमन्थो च भद्रवारु महौषधम् । अहिंसा चैव रास्ता च प्रलेपो वातशोफजित् ॥ ३ ॥ दूवां च नलमूलं च मधुकं चन्दनं तथा । शीतलाश्च गणाः सर्वं प्रलेपः पित्तशोफहृत् ॥ ४ ॥ आगन्तुजे रक्तजे च ह्येष एव विधिः स्मृतः । विधिर्विषधन्तो विषजे पित्तध्नोऽपि हितस्तथा ॥ ५ ॥ अजगन्धाऽश्वगन्धा च काला सरलया सह । एकैषिकाऽजशृङ्गी च प्रलेपः श्लेष्मशोफहृत् ॥ ६ ॥ एते वर्गाश्चयो लोभं पथ्या पिण्डीतकानि च । अनन्ता चेति लेपोऽयं सान्निपातिकशोफहृत् ॥ ७ ॥ मातुलुङ्ग (बिजौरा), अग्निमन्थ (अरणी), भद्रवारु (देवदारु), महौषध (सौठ), अहिंसा (बृहद् अहिंसा), और रास्ता—इनका प्रलेप वातजन्य शोथ को नष्ट करता है । दूवां, नलमूलं, मधुकं (मुलहर्डी), चन्दनं (श्वेत) एवं काकोल्यादि, उसलादि, न्यमाधादि, ये शीतल गण-इनका प्रलेप पित्तजन्य शूल को नष्ट करता है । आगन्तुज एवं रक्तजन्य शोफ में पित्त के समान चिकित्सा करनी चाहिये । विषजन्य शोफ में विषनाशक एवं पित्तनाशक विधि हितकारी है । अजगन्धा (अजवायन), अश्वगन्धा (असगन्ध), काला (अहिंसा) सरला (लाठ-जड़ की निशोथ), एकैषिका (श्वेत जड़ की त्रिवृत्), और अजशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी)—इनका प्रलेप कफजन्य शोथ को नष्ट करता है । ये उपयुक्त तीनों वर्ग, लोभं पथ्या (हरड), पिण्डीतक (मैनफल) और अनन्ता (सारिवा या दुगलमा)—सान्निपातजन्य शोथ को नष्ट करते हैं ॥ ३-७ ॥
स्निग्धानल्लवणो वाते कोष्णः, शीतः पयोयुतः । पित्ते, चोष्णः कफे क्षारमूत्राद्व्यस्तत्प्रगान्तये ॥ ८ ॥ लोप का संस्कार—वातजन्य शोफ में—लेप स्निग्ध, अम्ल,
१ व्रण के उपक्रमों में आठ उपाय अधिक प्रसिद्ध हैं । यथा— विस्लापन, पाचन, दारण, पीडन, शोचन, रोषण, उत्सेदन, अवसादन—इन आठों का मिश्रित रूप में वर्णन किया गया है ।
लवण, कोष्णः पित्त में—दूध मिश्रित शीत लेप, कफजन्य में— क्षौर एवं मूत्रवृह्ल उष्ण प्रलेप करना चाहिये ॥ ८ ॥ शणमूलकश्रिगुणां फलानि तिलसर्षपाः । सक्तवः किण्वमतसी द्रव्याण्युष्यानि पाचनम् ॥ ९ ॥ विस्लापन द्रव्य कहकर पाचन द्रव्यों को कहते हैं— सन के बीज, मूली (के बीज), सहजन का फल (पका), तिल, सरसों, सत्तू (जौ का), किण्व (सुरा का तलवट), और अलसी एवं उष्णवीर्य द्रव्य (कूठ, अगर आदि) शोथ को पकाने के लिये उत्तम हैं ॥ ९ ॥ चिरबिल्वोऽग्निनिको दन्ती चित्रको हयमारकः । कपोतकङ्कगुग्घ्राणां पुरोषाणि च दारणम् । क्षारद्रव्याणि वा यानि क्षारो वा दारणं परम् ॥ १० ॥
दारण द्रव्य— चिरबिल्व (नाटा करख), अग्निनिका (कलिहारिका या भल्लातक) दन्ती (जमालगोटा की जड़), चित्रक (चीता की जड़), हयमारक (करवीर-कनेर), कबूतर, गीध एवं कङ्क पक्षियों का मल, ये सब दारण काय में प्रयुक्त हो सकते हैं । क्षारद्रव्य (मुष्क, कुटज, पलाश, अश्वकर्ण, पारिमद्र आदि) या इनसे सिद्ध प्रतीसारणीय क्षार—उत्तम दारण हैं । दारण द्रव्य दो प्रकार के हैं—कपोतपुरीष आदि सुकुमार दारण हैं, क्षार कुच्छ दारण हैं ॥ १० ॥
द्रव्याणां पिच्छिलानां तु त्वङ्गमूलाणि प्रपीडनम् । यवगोधूमसाषाणां चूर्णाणि च समासतः ॥ ११ ॥ पीडन द्रव्य—पिच्छिल (सिम्बल, वट आदि) द्रव्यों की त्वचा-मूलप्रपीडन द्रव्य हैं । जौ, गेहूँ और माष (उड़द) ये संक्षेप में पीडन द्रव्य हैं । व्रण के मुख को बाहर करके, इन द्रव्यों का लेप करना चाहिये और फिर आग के द्वारा इनको शुष्क करना चाहिये । शुष्क होने से पीडन होता है ॥ ११ ॥
शङ्खिन्यङ्कोठसुमनःकरवीरसुवर्चलाः । शोधनानि कषायानि वर्गश्चाराश्वधादिकः ॥ १२ ॥ शोधन द्रव्य—शंखिनी (यवतिका), अङ्कोठ (अङ्कोठ), सुमन (मालती) करवीर (कनेर) सुवर्चला (हुलहुल या सूर्यमुखी)—एवं आश्वधादिवर्ग—इनका कषाय व्रण का शोधन करता है । शोधन—आठ प्रकार का है । यथा—कषाय, वर्त्ति, कल्क, घृत, रसक्रिया, चूर्ण एवं धूपन । धूपन चार प्रकार का है—श्रुत, शीत, फाण्ट और स्वरस । कल्क को पृथक् कहेंगे ॥ १२ ॥
अजगन्धाऽजशृङ्गी च गवाक्षी लाङ्गलाहया । पूतकश्चित्रकः पाठा विडङ्गैलाहरेणवः ॥ १३ ॥ कटुत्रिकं यवक्षारो लवणानि मनःशिला । कासीसं त्रिधूता दन्ती हरिताल सुराष्ट्रजा ॥ १४ ॥