सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[अ० ३५]
अर्धपञ्चांगुले प्रदेशिन्यनामिके, सार्धत्र्यंगुलौ कनिष्ठाङ्गुलो, चतुर्विंशतिविस्तारपरिणाहं मुखग्रीवं, त्रिभागंगुलविस्तारा नासापुटमर्यादा, नयनत्रिभागपरिणाहा तारका, नवमस्तारकांगो दृष्टिः, केशान्तमस्तकान्तमेकादशंगुलं, मस्तकादवटुकेशान्तो दशंगुलः, कर्णवटवन्तरं चतुर्दशंगुलं, पुरुषोरःप्रमाणविस्तीर्णो स्त्रीश्रोणिः, अष्टादशंगुलविस्तारसुरः, तत्प्रमाणं पुरुषस्य कटी, सर्वशमंगुलगतं पुरुषायाम इति ॥१२॥
इसके आगे आयु के विज्ञान के लिये अङ्गप्रत्यंगों का ज्ञान, प्रमाण, एवं सारी को कहते हैं। अङ्ग-अन्तराधि—(मध्यकाय या धड़), दोनों बाहु एवं दोनों जंघा और सिर ये ६ अङ्ग हैं। इन अङ्गों के अवयवों को प्रत्यङ्ग कहते हैं। इन प्रत्यङ्गों में—पांव का अंगूठा एवं पांव की प्रदेशिनी अंगुलि—दो अंगुल लम्बी (अपनी अंगुलियों से), प्रदेशिनी से मध्यमांगुलि १।५ भाग, मध्यमांगुलि से अनामिका १।५ भाग, अनामिका से कनिष्ठिका १।५ भाग छोटी; पांव का तलुवा चार अंगुल लम्बा और पाँच अंगुल चौड़ा, पार्णि (एड़ी) पाँच अंगुल लम्बी चार अंगुल चौड़ी; पाँव चौदह अंगुल लम्बा, पाँवगुरुफ, जंघा एवं जानु का मध्य स्थान चौदह अंगुल गोल, जंघा अठारह अंगुल लम्बी घुटने के ऊपर बत्तीस अंगुल—इस प्रकार से कुल पचास अंगुल, जंघा के समान दीर्घ ऊरु, अण्डकोष, टोडी, दांत, नासापुट (नयने), कर्णमूल और कानों तथा भौं एवं नेत्र का अन्तर दो अंगुल, अनुत्तेजित शिरन, खुला मुख नाक, कान-ललाट ग्रीवा, आँखों का मध्य भाग चार अंगुल, योनिच्छिद्र की गहराई बारह अंगुल (हस्तिनी जाति की स्त्री में); मेहननाभि का अन्तर, हृदय एवं ग्रीवा का अन्तर, दोनों स्तनों का अन्तर, चेहरे की लम्बाई, मणिबन्ध (कलाई) की गोलाई, प्रकोष्ठ भाग बारह अंगुल, इन्द्रवस्ति (जंघा का मध्य भाग) की गोलाई, अंसपीठ एवं कोहनी कामध य भाग सोलह अंगुल, लम्बाई तथा गोलाई हाथ चौबीस अंगुल, सुजायें बत्तीस अंगुल, ऊरु बत्तीस अंगुल गोलाई में, मणिबन्ध और कोहनी के बीच का अन्तर सोलह अंगुल, हाथ का तलुवा छै अंगुल लम्बा और चार अंगुल चौड़ा, अंगुष्ठ एवं प्रदेशिनी का अन्तर, कान और नेत्र कोणों का अन्तर और मध्यमांगुलि पाँच अंगुल, प्रदेशिनी और अनामिका ४। अंगुल, कनिष्ठा और अंगुष्ठ—साढ़े तीन अंगुल, मुख की लम्बाई चार अंगुल और ग्रीवा की गोलाई बीस अंगुल, नासापुट की मर्यादा १।३ अंगुल, आँख की कृष्ण मण्डल या तारक-आँख का १।३ भाग, दृष्टि—तारक का १।६ भाग, बालों की जड़, शङ्ख प्रदेश के एवं मस्तक (चोटी) के स्थान के बीच का भाग ग्यारह अंगुल, मस्तक से ग्रीवा के बालों की जड़ का मध्यभाग दस अंगुल, कान एवं
ग्रीवा के पिछले भाग का अन्तर चौदह अंगुल, पुरुष के उरु के बराबर (बारह अंगुल) स्त्री का श्रोणिफलक, स्त्री का उरुः स्थल अठारह अंगुल चौड़ा, पुरुष की कटि अठारह अंगुल, पुरुष की सम्पूर्ण लम्बाई एक सौ बीस अंगुल है।
वि० मन्तव्य—मेहन-पुरुष के स्वामाविक लिंग का बाह्यभाग। नाभि और हृदय का अन्तर १२ अंगुल। चतुर्विंशति-अंगुलो हस्तः—कूपर से मध्यमांगुलि के अन्त तक २४ अंगुल लम्बा हस्त—हाथ। नयन.....दृष्टिः—नेत्र गोलक (नयनबुद्धिद) का तिहाई भाग तारक (कृष्णमण्डल) हो, और तारक का नौवाँ भाग दृष्टि हो। उत्तर तन्त्र अ० १ के श्लोक १३ के अनुसार मण्डल का सातवाँ भाग दृष्टि होती है। तात्पर्य है दीर्घायु की दृष्टि नौवाँ भाग और अन्यो की सातवाँ भाग होती है। या सर्वसाधारण की सातवाँ भाग होती है। आयत (लम्बा) आयाम (लम्बाई), परिणाह तथा परिच्छेप (मोटाई), गोलाई या घेरा, विस्तार (चौड़ाई)। अन्तर (दूरी) ॥१२॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
पञ्चविंशे ततो वर्षं पुमान् नारी तु षोडशे।
समत्वागतवीर्यो तौ जानीयात् कुण्डलो भिषक् ॥१३॥
यह उपर्युक्त प्रमाण युवावस्था में ही होता है, थोड़ी आयु में नहीं। क्योंकि—पञ्चवीस वर्ष में पुरुष और सोलह वर्ष की आयु में स्त्री, रसादि धातुओं से परिपूर्ण होते हैं। यह बात कुशल वैद्य को मली प्रकार जान लेनी चाहिये ॥१३॥
देहः स्वेरङ्गुलैरेष यथावदनुकीर्तितः।
युक्तः प्रमाणेनानेन पुमान् वा यदि वाङ्मना ॥१४॥
दीर्घमायुरवाप्नोति वित्तं च महद्दृच्छति।
मध्यमं मध्यमैरायुर्वित्तं हीनैस्तथाऽवरम् ॥१५॥
शरीर का यह उपर्युक्त मान—मनुष्य की अपनी ही अंगुलियों से समझना चाहिये। यदि इस परिमाण से पुरुष या स्त्री युक्त हो तो वह दीर्घायु एवं बहुत धन को प्राप्त करता है। मध्यम लक्षणोंवाला पुरुष मध्यमायु, मध्यमवित्त प्राप्त करता है, हीन लक्षणोंवाला, हीन आयु और हीन वित्त प्राप्त करता है ॥१४, १५॥
अथ सारान् वक्ष्यामः—स्मृतिभक्तिप्रज्ञाशौचशौर्योपेतं कल्याणामिनिवेशं सत्त्वसारं विद्यात्; स्तिग्धसंहतः श्वेतोस्थिदन्तनखं बहुलकामप्रजं शुकेण; अक्रुशमुत्तमबलं स्तिग्धगम्भीरस्वरं सौभाग्योपपन्नं महानेत्रं च मञ्जः।
१ कहा भी है—
“वर्षेऽथ पंचविंशे नरः समन्वितबलः षोडशे नारी।
अर्हति मानोन्मानं जीवितभागे क्षुत्तु वा ॥”