भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ३५ ]

सूत्रस्थानम्

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महाजिरः स्कन्धं दृढदन्तहन्वस्थिनखमस्थिभिः; स्निग्धमूत्र-स्वेदस्वरं बृहच्छरीरमायासासहिष्णुं मेदसा; अछिद्रागत्रं गूढस्थिसन्धिं मांसोपचितं च मांसेन; स्निग्धताघ्ननख-नयनतालुजिह्वाष्टपणिपादतलं रक्तेन; सुप्रसन्नमुदुत्वप्रो-माणं त्वकदारं विद्यादिति । एषां पूर्व पूर्वं प्रधानमायुः सौभाग्ययोरिति ॥ १६ ॥

इसके आगे सारों को कहते हैं—सत्त्वसार—स्मृति (स्मरण), भक्ति (श्रद्धा), प्रज्ञा (बुद्धि), शौच (पवित्रता), शौर्य (सब कार्यों में अनालस्थ) से युक्त, कल्याण विषय में तत्पर (यत्नपर) को सत्त्वसार समझना चाहिये। स्निग्ध—परस्पर मिले एवं श्वेत अस्थि, दांत एवं नखों से युक्त, बहुत काम युक्त, बहुत प्रजायुक्त मनुष्य शुक्लसार युक्त होता है। स्थूल, उत्तुमबलयुक्त, स्निग्ध एवं गम्भीर स्वरयुक्त-सौभाग्ययुक्त, विशाल नेत्रवाला पुरुष मज्जासारवाला होता है, महान् स्वर, महान् स्कन्ध; मजबूत दांतों, हन्वस्थि, नखवाला, अस्थिसार, स्निग्ध मूत्र, स्वेद एवं स्वरवाला, बड़े शरीरवाला, परिश्रम को न सहन करनेवाला मेद से युक्त होता है। कहीं शरीर दबा (छिद्रयुक्त) न हो, अस्थि एवं सन्धियाँ गूढ़ हों, मांस से भरा शरीर मांससारवाला है। आँख, नख, तालु, जिह्वा, ओठ, हाथ, पाँव के तालुओं का लाल एवं चिकना होना रक्तसार का लक्षण है। त्वचा एवं रोमों का स्वच्छ एवं कोमल होना त्वचा का सार है। इनमें पूर्व-पूर्व सार (त्वचा से रक्तसार, रक्त से मांस-सार इस प्रकार से) आयु एवं कल्याण के लिये मुख्य है।

वि० मन्तव्य—सारों की व्याख्या चरक वि० अ० ८ में बहुत विशद एवं स्पष्ट है। पाठक अवश्य देखें। वहाँ यह भी लिखा है कि—सब (आठों) सारों से युक्त मानव-अत्यन्त बलवान्, महान्, कलेश सहनेवाला, सभी कार्यों को करने में अपने को समर्थ समझनेवाला, भले कार्यों में तत्पर, स्थिर एवं प्रथित शरीरवाला, सुन्दर एवं सावधान गतिवाला, अनुनाद युक्त, स्निग्ध, गम्भीर एवं महान् स्वरवाला, सुख, ऐश्वर्य, सुखभोग तथा सम्मान का भागी (भोक्ता) होता है और उसका बुढ़ापा मन्द (थोड़ा) तथा रोग भी मन्द होता है अपने समान गुणवाली सन्तान (पुत्र पौत्र आदि) वाला होता है तथा चिरजीवी होता है। उक्त सत्त्व (मनसु) आदि सार देखकर आयु का बहुत कुछ पता लग जाता है। सार का अर्थ है स्थिर अंश, जैसे काष्ठ में मध्य काष्ठ सार होता है उक्त सत्त्व आदि जितने अधिक उत्कृष्ट होते हैं उनके अनुसार वे सार कहे जाते हैं, यथा प्रबल सत्त्ववाला “सत्त्वसार” प्रबल शुक्लवाला “शुक्लसार” आदि-आदि ॥ १६ ॥

विशेषतोऽङ्गप्रत्यङ्गप्रमाणान्दथ सारतः । परीत्यायुः सुनिपुणो भिषक् सिध्यति कर्मसु ॥ १७ ॥ अङ्ग-प्रत्यङ्गों के प्रमाण द्वारा तथा सार द्वारा आयु की परीक्षा करके जो वैद्य चिकित्सा कर्म करता है, वह कार्य में सफल होता है।

वि० मन्तव्य—चरक ने एङ्गी (पार्श्व) के पश्चात्-भाग से शिर के शिक्षा स्थान पर्यन्त उचित परिमाणवाले मानव की लम्बाई ८४ अंगुल मानी है और वह उचित भी है, क्योंकि ३॥ हाथ-८४ अंगुल का पुरुष माना जाता है। १ हाथ २४ अंगुल का और ३॥ हाथ-८४ अंगुल का होता है और सुश्रुत ने—पाँव की मध्यमा—अंगुली से ऊपर को बाहु उठाये पुरुष की लम्बाई १२० अंगुलमानी है, जिसको “पुरुषा” कहते हैं, वह भी उचित ही है, क्योंकि १४ अंगुल का पाँव (पाद) होता है और ऊपर हाथ उठाने से ३० ३० अंगुल लम्बाई बढ़ जाती है। परन्तु—सुश्रुत ने-पार्श्व में १, मेहन नाभि के अन्तर में २ और शिर के मान में ५ अङ्गुल अधिक माने हैं। यदि ४४ में से ८ निकाल दें तो ३६ रह जाते हैं और यदि १२० में से ३६ निकाल दें तो ८४ रह जाते हैं और चरक में एकवाक्य और पाया जाता है वह है—“तत् आयामविस्तारसमं समुच्यते” अर्थात् वह शरीर आयाम (लम्बाई-दैर्घ्य) में तथा विस्तार (चौड़ाई बाहु पंखारे) में सम-समान सम-समीचीन उच्यते कहा जाता है। इस प्रकार ६६ अङ्गुल = ४ हाथ (६ फूट) लम्बा शरीर भी समीचीन-उत्तम होता है। हमारा विचार है कि चरक ने ८४ तथा ६६ अङ्गुल की अथवा इसके बीच की लम्बाई उत्तम मानी है। इस लम्बाई के युवक सेना एवं पुलिस में भर्ती भी किये जाते हैं और सुडौल भी होते हैं, यद्यत् उनके अवयवों का विस्तार भी उक्त प्रकार से सम्पन्न हो। पुरुषा शब्द का प्रयोग-पुरुषा भर गहरा पानी है तथा यह वृक्ष पुरुषा भर लम्बा है आदि-वाक्यों में किया जाता है। श्रीवामभट्ट ने शा० स्था० अ० ३ श्लो० ११२ में—स्वं स्वं हस्तत्रयं साद्वं वपुः पात्रं सुखायुषः।’ लिखा अर्थात् ३॥ हाथ लम्बा शरीर सुख आयु का पात्र होता है। इस प्रकार चरक में ८४ एवं ६६, सुश्रुत में १२० तथा वामभट्ट में ८४ अङ्गुल की लम्बाई उत्तम मानी है ॥ १७ ॥

व्याधि विशेषे वास्तु प्रागभिहिताः, सर्वं एवेते त्रिविधाः-साध्याः, याप्याः, प्रत्याख्येयाश्च । तत्रैतान् भूयश्चिधा परी-क्षेत् किमयमौपसर्गिकः; प्राक्केवलः, अन्यलक्षण इति । तत्र, औपसर्गिको नाम यः पूर्वोत्पन्नं व्याधं जघन्यकाल-जातो व्याधिरूपसृजति, तन्मूल एवोपद्रवसंज्ञः; प्राक्केवलो नाम यः प्रागेवोत्पन्नो व्याधिरूपरूपोऽनुपद्रवश्च; अन्य-लक्षणो नाम यो भविष्यद्वाद्याख्यापकः, स पूर्वरूपसंज्ञः।