सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३२ ]
प्रियङ्कुका सर्जरसः पुष्पकासीममेव च ।
त्वक्चूर्णं धवजं चैव रोपणार्थं प्रशस्यते ॥२६॥
रोपणचूर्णं—कंगुका ( कंगनी ), त्रिफला, रोश्र, कासीस, श्रवणाहृ ( मुण्डतिका), धव एवं अश्वकर्ण ( अश्वकर्ण, पलाश), इनकी छाल का चूर्ण रोपणकार्य में उत्तम है। प्रियंगु, सर्जरस ( राल) कासीस-पुष्प, धववृक्ष की त्वचा का चूर्ण रोपण के लिये उत्तम है ॥२२, २६॥
त्वस्त्र न्यग्रोधवर्गस्य त्रिफलायास्तथैवच ।
रसक्रियां रोपणार्थं विदधीत यथाक्रमम् ॥३०॥
न्यग्रोधगण की तथा त्रिफला की ( हरड, बहेड़ा, आँवला) त्वचा से, द्विप्राणीय अध्याय में कही विधि से रोपणकार्य के लिये रसक्रिया बनानी चाहिये ॥३०॥
अपामार्गोऽश्वगन्धा च तालपत्री सुवर्चला ।
उत्सादने प्रशस्यन्ते काकोल्यादिश्च यो गणः ॥३१॥
अपामार्ग की जड़, असगन्ध, तालपत्री (मूसली), सुवर्चला (सूर्यावर्त्त) की जड़, एवं काकोल्यादिगण की औषधियाँ—उत्सादन (मांसवर्धन) कार्य में प्रशस्त हैं ॥३१॥
कासीसं सैनधवं किण्वं कुरुविन्दो मन्तःशिला ।
कुक्कुटाण्डकपालानि सुमनोमुक्कुलानि च ॥३२॥
फले शैरीपकारञ्जे धातुचूर्णानि यानि च ।
व्रणेपूरसन्नमांसेषु प्रशस्तान्यवसादने ॥३३॥
कासीस, सैनधानमक, किण्व, कुरुविन्द ( लाल रत्न ), मैनेसिल, मुर्गे के अण्डे के छिलके, चमेली की कली, शिरीष, करञ्ज, धातुचूर्ण ( हरिताल, पुष्पकासीस, रसाञ्जन आदि)—ये वस्तुयें उभरे हुए मांस काटने के लिये (अवसादन के लिये) प्रशस्त हैं ॥३२, ३३॥
समस्तं वगमर्धं वा यथाटामभमथापि वा ।
प्रयुञ्ज्येत मिषक् प्राज्ञो यथोद्दिष्टेषु कर्मसु ॥३४॥
इस मिश्रक अध्याय में, द्रव्यसंग्रहणीय अध्याय में संशोधन-संशमनीय अध्याय में कहे हुए द्रव्यों में से जितने चार, पाँच, छे द्रव्य, या सम्पूर्ण अथवा आधे, जितने भी प्राप्त हो सकें, उनको लेकर वैद्य को चाहिये कि कार्य में व्यवहार कर ले ॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने मिश्रकाध्यायो
नाम सप्तत्रिंशत्तमोऽध्यायः ॥३७॥
अष्टत्रिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो द्रव्यसंग्रहणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे द्रव्यसंग्रहणीय नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥
समासेन सप्तत्रिंशद्द्रव्यगणा भवन्ति ॥३॥
संज्ञेय में सैतीस द्रव्य समूह हैं। (यथा—प्रत्येक गण का नाम आदिम दवाई के नाम से है) ॥३॥
तद्यथा—विदारिगन्धा विदारी विश्वदेवा सहदेवा श्वदंष्ट्रा पृथक्पणीं शतावरी सारिवा कृष्णसारिवा जीव-कर्मभक्ती महासहा क्षुद्रसहा बृहत्तयो पुनन्वैरण्डो हंसपादो वृश्चिकाल्युषभी चेति ॥४॥
विदारीगन्धा (शालपर्णी), विदारी (भूमिकृष्णण्ड), विश्वदेवा (श्वेतबला-गोरोत्तन), सहदेवा (पीले फूल की बला), श्वदंष्ट्रा (गोखर), पृथक्पणीं (पुश्पिणी-पिठवन), शतावरी, सारिवा (अनन्तमूल), कृष्णसारिवा (श्यामलता), जीवक, ऋषभक, महासहा (माषपर्णी), क्षुद्रसहा (मुद्गपर्णी), दोनों बृहती (छोटी एवं बड़ी कटेरी), पुनन्वा (साटोड़ी), एरण्ड, हंसपादी (हंसपदी-हंसराज), वृश्चिकाली (विच्छूबूटी बिछातु—अथवा मेघशुद्धी), ऋषभी (कौंच का फल) ॥४॥
विदारिगन्धादिर्यं गणः पित्तानिलापहः ।
शोषगुल्माङ्गमर्दोर्ध्वश्वासकासविनाशनः ॥५॥
यह विदारीगन्धादिगण पित्त एवं वायु का नाश करने वाला है। शोष (राजयद्म), गुल्म, अङ्गों में पीड़ा, ऊर्ध्वश्वास, कासरोग का नाश करने वाला है। इस गण से अथवा अन्य गणों से श्रुतशीत, कषाय, फाण्ट, रसक्रिया, गुटिका, चूर्ण, प्रलेप, प्रदेह, परिषेक, अवगाहन, घी, तैल आदि तैयार करके प्रयोग करने चाहिये ॥५॥
आरग्वधमदनोपघोण्टाकण्टकीकुटजपाठापाटलाम्-वैन्द्रयवसप्तपर्णनिम्बकुसुण्टकदासीकुरण्टक-गुड्डीची चित्रकशाङ्ग (ङ्ग) घाकरञ्जद्रवपटोलकिरातितिक्कानि सुषवी चेति ॥६॥
आरग्वधादिरित्येष गणः श्लेष्मविषापहः ।
मेहकुष्ठज्वरवमीकण्डूस्तो व्रणशोधनः ॥७॥
आरग्वधादिगण—आरग्वध (अमलतास) मदन (मैनफल), शोषघण्टा (कंकोटी), कण्टकी (विकङ्कृत), कुटज (कूड़ा), पाठा, पाटला, मूर्वा, इन्द्रयव (कूड़ा), सप्तपर्ण (सतवन), निम्ब, कुरण्टक (श्वेतपुष्प झिटी), दासीकुरण्टक (नीलपुष्प झिटी), गुड्डीची (गिलोय), चित्रक, शाङ्ग (काकजंघा), करञ्जद्रव (नाटा और पूतीकरञ्ज), पटोल, किरातितिक, (चिरायता) सुषवी (करेला)—यह आरग्वधादिगण—श्लेष्मा, विष, कुष्ठ, प्रमेह, ज्वर, वसन, कण्डू का नाशक तथा व्रणशोधक है ॥६, ७॥
सालसारजकणखदिरकदरकालस्कन्धकमुकभूर्जमेव-शुद्धतिनिशचन्दनकुचन्दनशिशपाशिरीषासनधवाजुनता-लशानक्तमालपूतिकाश्वकर्णागुरुणि काळीयकं चेति ॥८॥
सालसारादिरित्येष गणः कुष्ठविनाशनः ।
मेहपाण्डुवामयहरः कफमेदोविशोषणः ॥९॥