सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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सालसारादिगण—सालसार (साल का सार), अजकण (सर्ज-साल का भेद), खदिर (खैर), कदर (श्वेत या पूति खदिर), कालस्कन्ध (तमाल), कमुक (सुपारी), भूर्ज (भोजपत्र), मेघशृङ्गी (मेदाशृङ्गी), तिनिश (सादण), चन्दन (श्रीचन्दन), कुचन्दन (लाल चन्दन), शिशिपा (शीशम), शिरीष, असन, धव, अर्जुन, ताल (ताड़), शाक (सहगौन), नक्तमाल (करञ्ज), पूतीक (नाटाकरञ्ज), अश्वकर्ण (साल भेद), अगार, और कालीयक (कालिया चन्दन)—यह सालसारादिगण कुछनाशक, प्रमेह-पाण्डुरोगनाशक, कफ और भेद का शोषक है ॥८६॥
वरुणातिगलशिशुमधुशिशुतकर्त्रीमेघशृङ्गीपूतीकनक्तमालमोरटाप्रिमन्थसैर्यकद्रवयिम्बोवसुकवसिरचित्रकशतावरी—बिल्वराजशृङ्गीदर्भा वृहतीद्रव्यं चेति ॥१०॥
वरुणादिगणो ह्येष कफमेदोनिवारणः ।
विनिहन्ति शिरःशूलगुल्माध्यन्तरविद्रधीन् ॥११॥
वरुण (वरना), आर्तगल (नील झिंटी), शिशु (कडुवा और मीठा सहजन, श्वेत एवं लाल फूल का), तर्कारी (जयन्ती), मेघशृङ्गी (मेदाशृङ्गी), पूतीक (चिरबिल्व-करञ्ज), नक्तमाल (बड़ी करञ्ज), मोरटा (अंकोटपुष्प), अग्निमन्थ (अरणी), सैर्यक (लाल फूल और नीले फूल की दो झिण्टियाँ), विम्बी (ओष्ठोपम फल), वसुक (वकपुष्प-मौलसरी), वसिर (अपामार्ग या गजपिप्पली), चित्रक, शतावरी, बिल्व, अजशृङ्गी (सुण्ड-तिका-काकड़ाशृङ्गी), दर्भ (कुशा१), वृहतीद्रव (छोटी कटेरी और बड़ी कटेरी)—यह वरुणादिगण—कफ भेदनाशक, शिरःशूल, गुल्म एवं अन्तर्विद्रधि को नष्ट करता है ॥१०, ११॥
वीरतरसहचरद्रव्यदर्भवृक्षादनीगुन्द्रानलकुकाशाशमभेदकाप्रिमन्थमोरटावसुकवसिरभल्लुककुरणिटकेन्दीवरकपोतवङ्गाः श्वदंष्ट्रा चेति ॥१२॥
वीरतर्वादिरित्येष गणो वातविकारनृत ।
अश्मरीशर्करामूत्रकृच्छ्राघातरुजापहः ॥१३॥
वीरतर्वादि गण—
वीरतरु (अर्जुन वृक्ष), सहचरद्रव्य (पीले और नीले फूल की दो झिण्टी), दर्भ, वृक्षादनी (वन्दाक), गुन्द्रा (बिना गाँठ का तृण—पादरक भेद), नल (प्रसिद्ध है), कुशा, काश, अश्मभेद (पाषाणभेद), अग्निमन्थ (अरणी), मोरटा (मूर्वा), वसुक (वकपुष्प), वसिर (अपामार्ग), भल्लुक (शयोनाक), कुरणटक (सिरिवालिका—लाल रङ्ग की झिण्टी), इन्दीवर (नीला कमल), कपोतवङ्गा (सुवर्चला), श्वदंष्ट्रा (गोलखर)—यह वीर-
तर्वादिगण—वातविकारनाशक, अश्मरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, मूत्राघात की पीड़ा को शान्त करता है ॥१२, १३॥
लोघ्रासावरलोघ्रापलाजकुटत्रटाजोकफळजीकटफलैलाव-लुकशन्तकोजिज्जिनीकदम्बसाखाः कदली चेति ॥१४॥
एष रोधादिरित्युक्तो भेदः कफहरो गणः ।
योनिदोषहरः स्तम्भो वण्यो विषविनाशनः ॥१५॥
लोघ्रादिगण—लोघ्रा (पठानीलोघ), सावरलोघ्रा (सफेदमोटी छाल), पलाश (डाक), कुटत्रट (स्थोनाक), अशोक, (लाल फूल का—रक्ताशोकश्वलकिसलयो वामपादामिलायी), फळी (मार्गी), कटफल (कायफल), एलवालुक (नालुका—हरिवालुक), शल्लकी (जगमच्छा—शिल्ली), जिज्जिनी (जिज्जन), कदम्ब, साल, कदली (केला)—यह लोघ्रादिगण—भेदकफनाशक योनिदोषहर, स्तम्भक, वर्ण के लिये हितकारी, विषनाशक है ॥१४, १५॥
अर्कालककैरकद्रव्यनागदन्तीमयूरकभार्गीरास्नेन्द्रपुष्पी-लुद्रश्चेतामहारश्चेतावृश्चिकालयलवणास्तापसवृक्षश्चेति ॥१६॥
अर्कादिको गणो ह्येष कफमेदोविषापहः ।
कृमिकुष्ठप्रशमनो विशेषाद् व्रणशोधनः ॥१७॥
अर्कादिगण—अर्क (लाल फूल का आक), अलर्क (श्वेत फूल का आक) दोनों—नाटा और बड़ा करञ्ज, नागदन्ती (बड़ी जड़वाली दन्ती-जमालगोटा), मयूरक (अपामार्ग), मार्गी, रास्ता, इन्द्रपुष्पी (लांगली), लुद्रश्चेता (सिफन्द या अतोस), महारश्चेता (अपराजिता), वृश्चिकाली (बिलुटी), अलवणा (ज्योतिष्मती), तापसवृक्ष (इंगुदी)—यह अर्कादिगण कफ भेद एवं विष का नाशक, कृमि-कुष्ठ को शान्त करनेवाला, खासकर व्रण का शोषक है ॥१६, १७॥
सुरसाश्चेतसुरसाफणिज्झकाजर्कभूस्तृणसुगन्धकमुमु-खकालमालकुटेरककासमर्दक्षवकस्वरपुष्पाविडङ्गकटफल-सुरसीनिर्गुण्डिकुलाहलोन्दुरुकर्णिकाफळजीप्राचीबलकाक-मान्च्यो विषमुष्टिकश्चेति ॥१८॥
सुरसादिगणो ह्येष कफहृत कृमिसूदनः ।
प्रतिशयायारुचिश्वासकासन्तो व्रणशोधनः ॥१९॥
सुरसादिगण—सुरसा, श्वेतसुरसा (सफेद एवं काले फूल की तुलसी), फणिज्झक (मरुवा), अर्जक (वर्चिका) भूस्तृण (द्रोणपुष्पी), सुमुख (राजिका), कालमालिका (कुष्णमलिका), कासमर्द (कसौदी), क्षवक (नकलिकनी), स्वरपुष्प (वनवर्चिका), वायविडङ्ग, कायफल, सुरसी (तुलसी), निर्गुण्डी (सिन्दु-वार), कुलाहल (मुण्डिका), इन्दुकर्णी (मृषिकपर्णी), फळी (मार्गी), प्राचीबल (मत्स्याक्ष), काकमाची (मकोय), और विषमुष्टि (कुचिला)—यह सुरसादिगण कफ को दूर करनेवाला एवं कृमिनाशक है । प्रतिशयाय, अरुचि, स्वास, कास नाशक एवं व्रणशोधक है ॥१८, १९॥
१ दर्भ—
“कुशः काशा बल्वजाश्च तथान्ये तीक्ष्ण-रोमशाः ।
मौज्जाश्च शाङ्खाश्चैव षड् दर्भाः संप्रकीर्तिताः ॥