भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुभ्रतसंहिता

[ अ० ३८ ]

मुष्ककपलाग्रधवचित्रकमदनवृक्षकशिशापावज्रवृक्षा - खिफला चेति ॥२०॥

मुष्ककादिर्गणो ह्येष मेनोघ्नः शुक्रदोषहृत ।

मेहार्जःपाण्डुरोगाऽमर्करानाशनः परः ॥२१॥

मुष्क (आरवृक्ष), पलाश (डाक), धव, चित्रक, मदन (मैनफल), वृक्षक (कुटज), शिशापा (शीशम), वज्रवृक्ष (सेहुण्ड) और विफला (हरड, बहेडा और आँबला)—यह मुष्ककादिर्गण मेदोनाशक तथा शुक्रदोष को मिटानेवाला है । प्रमेह, अर्श, पाण्डुरोग नाशक एवं शर्करा को दूर करने के लिये श्रेष्ठ है ॥

पिप्पलीपिप्पलीमूलचव्यचित्रकशृङ्गवेरमरिचहस्ति - पिप्पलीहरेणुकैलाजमोदेन्द्रयवपाठाजीरकसर्पपमहानिम्ब - फलहिङ्गुभार्गभिघुरसातिविषावचाविडङ्गानि कटुरोहिणी चेति ॥२२॥

पिप्पल्यादिः कफहरः प्रतिश्यायानिलाखूचैः ।

निहन्त्याहीपिनो गुल्मशूलघ्नश्चामपाचनः ॥२३॥

पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य (चविका), चित्रक, शृङ्गवेर (आद्रक), मरिच (कालीमिर्च), हस्तिपिप्पली (गजपिप्पली), हरेणुका (रेणुका), एला (बड़ी इलायची), अजमोदा (अज-वायन), इन्द्रजौ, पाठा, जीरा, सरसौ, महानिम्ब-फल (वकायन की निमौली), हींग, भागी, मधुरसा (मूवी), अतीस, वच, वाय-विडङ्ग और कुटकी, यह पिप्पल्यादिर्गण कफनाशक, प्रतिश्याय, वायु, अरुचि को मिटानेवाला, दीपक (अग्नि को बढ़ानेवाला), गुल्म एवं शूल का नाशक एवं आम रस का पाक करने-वाला है ॥२२, २३॥

एलातगरकुष्ठमांसीध्यामकत्वकपत्रनागपुष्पप्रियङ्गुहरेणु काव्याघ्नरसखुरुक्तिचण्डास्थौण्यकश्रीवैणुकचोचचोरकवालुकु कगुगुलुसजंरसतुरुष्ककुन्दुरुकागुरुष्ककोशीरभद्रदारुकु - ङ्गुमान् पुत्रागकेशरं चेति ॥२४॥

एलादिको वातकफौ निहन्त्याद्विषमेव च ।

वर्णप्रसादनः कण्डुपिडकाकोठनाशनः ॥२५॥

एलादिर्गण-एला (सूईमैला), तगर, कुष्ठ, मांसी (जटा-मांसी), ध्यामक (कचूण रोहिषतृण), त्वक (दालचीनी), पत्र (तेजपात), नागपुष्प (नागकेशर), प्रियंगु, (फूल प्रियंगु), हरेणुका (रेणुका), व्याघ्नरस (नाखूता), श्रुक्ति (नख का भेद-अल्पनख), चण्डा (चौरक चौरपुष्पी), स्थौण्यक (शुणेरक), श्रीवैणुक (सरलवृक्ष), चोच (दालचीनी का भेद-वानवासिका त्वक), चौरक (सुगन्धित द्रव्य-पहाड़ में होता है), वालुक (एलावालुक), गुगुलु, सजंरस (राल), तुरुष्क (सिद्धारक), कुन्दरु (गोद भेद), अगुरु (अगर), स्थुक्का (सुगन्धित द्रव्य),

उशीर, भद्रदारु (देवदारु), कुंकुम (केशर), पुन्नागकेशर (पद्मकेशर या नागकेशर), यह एलादिर्गण वायु, कफ, विष को नष्ट करता है । वर्ण (रंग) को स्वच्छ करता है, कण्डु, पिडका और कोठ को नष्ट करता है ॥२४, २५॥

वचामुस्तातिविषाभयाभद्रदारुणि नागकेशरं चेति ॥२६॥ हरिद्रादारुहरिद्राकलगीकुटजबीजानि मधुकं चेति ॥२७॥

एतौ वचाहरिद्रात्री गणौ स्तन्यविशोधनौ । आमातिसारशमनौ विशेषाहोषपाचनौ ॥२८॥

वचादिर्गण-वच, मुस्ता (नागरमोथा), अतीस, अभया (हरड बड़ी), भद्रदारु (देवदारु) और नागकेशर । हरिद्रादिर्गण-हरिद्रा (हल्दी, दाहहल्दी), कलशी (पुश्पिणपणी), इन्द्रजौ एवं मुलहटी-ये वचादि एवं हरिद्रादि दोनों गण स्तन्य (दूध) के शोधक, आमातिसारनाशक, खासकर दौघों का पाचन करनेवाले हैं ॥

श्यामा महाश्यामात्रिवृहन्तीशङ्खिनीतिल्वककम्पिल्लक - रम्यकक्रमुकपुत्रश्रेणीगवाक्षीराजवृक्षकरऊजहृद्यगुडूचीस - मलाच्छगलान्त्रीसुधाः सुवर्णक्षीरी चेति ॥२९॥

उक्तः श्यामादिरित्येष गणो गुल्मविषापहः ।

आनाहोदरविडुभेदी तथोदावर्तनाशनः ॥३०॥

श्यामादिर्गण-श्यामा (काली त्रिवृत), महाश्यामा (विषारा), त्रिवृत (निशोथ), दन्ती (जमालभोटा की जड़), शङ्खिनी (यवतिका-कालमेघ), तिल्वक (रोधलालत्वचा वैरचनिक वृक्ष), क्रमुक (सुपारी), पुत्रश्रेणी (दन्ती का भेद), गवाक्षी (इन्द्रायण), राजवृक्ष (अमलतास), करञ्जहृद्य (दोनों करञ्ज नाटा और पूती), गुडूची (गिलोय), ससला (सातला), छागलात्री (विषारे का भेद), सुधा (सेहुण्ड), और स्वर्णक्षीरी (सत्यानाशी चौक)—यह श्यामादिर्गण गुल्म एवं विषनाशक है । आनाह, उदररोग-नाशक, मलविरचक, एवं उदावर्तनाशक है ॥२९, ३०॥

बृहतीकण्टकारिकाकुटजफलपाठा मधुकं चेति ॥३१॥

पाचनीयो बृहत्यादिर्गणः पिस्तानिलापहः ।

कफारोचकहृद्वोगमूत्रकृच्छ्ररुजापहः ॥३२॥

बृहती (बड़ी कटेरी), कण्टकारिका (छोटी कटेरी), कुटज-फल (इन्द्रजौ), पाठा, मधुक (मुलहटी), यह बृहत्यादि गण—पाचक, पिस्त-वायु-नाशक, कफ, अरुचि, हृदयरोग, मूत्रकृच्छ्र की पीड़ा को दूर करता है ॥३१, ३२॥

पटोलचन्दनकुचन्दनमूर्वागुडूचोपाठाः कटुरोहिणी चेति ॥

पटोलादिर्गणः पिस्तकफारोचकनाशनः ।

ज्वरोपशमनो व्रण्यश्छदिकण्डूविषापहः ॥३४॥

पटोल (परवल), चन्दन (श्वेत), कुचन्दन (लाल चन्दन), मूर्वा, गिलोय, पाठा और कुटका यह पटोलादिर्गण—पिस्त कफ अरुचि का नाशक, ज्वर को शान्त करनेवाला, व्रण के

१ बरटीदण्डसंकाशः कण्डुमान् लोहितोसकफंवातात् ।

क्षिप्रोत्पादविनाशः कोठ इति निगद्यते सद्भिः ॥

१ आमपाचन—

“जठरातलदौर्वल्याद् अविषवस्तु यो रसः ।

स आमसंज्ञको देहं सर्वदोषप्रकोपकः ॥”