सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ३८ ]
गुह्यचौनिम्बकुस्तुम्बूरचन्दनानि पद्मकं चेति ॥ ५० ॥
एष सर्वञ्चरान् हन्ति गुह्य्यादिस्तु दीपनः ।
हल्लासारोचकवमोपिपासादाहनाशनः ॥ ५१ ॥
गिलोय, नीम, कुस्तुम्बुर (धनिया), चन्दन और पद्माल, यह गुह्य्यादिगण सब प्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है । अग्निदीपक है । हलास (मचली), अरुचि, वमन, पिपासा, दाह को नष्ट करता है ॥ ५०, ५१ ॥
उत्पलरक्तोत्पलकुमुदसौगन्धिकुक्कुल्यपुण्डरीकाणि - मधुकं चेति ॥ ५२ ॥
उत्पलादिरयं दाहपित्तरक्तविनाशनः ।
पिपासाविषहृद्दोगच्छद्विर्मुर्लोहरो गणः ॥ ५३ ॥
उत्पल (कमल), लालकमल, कुमुद (श्वेतकमल), सौगन्धिक (सुगन्धि), कुक्कुल्य (थोड़ा नीला-श्वेतकमल), पुण्डरीक (श्वेतपद्म) और मुलहटी—यह उत्पलादिगण दाह-पित्त-रक्तनाशक है । पिपासाविष-हृदयरोग, छर्दि (वमन), मूर्च्छा को दूर करता है ॥ ५२, ५३ ॥
मुस्ताहरिद्रादारुहरिद्राहरीतक्यामलकविभीतकुकुष्ठ- हैमवतोवचापाठाकटुरोहिणीशाङ्गुष्टातिविषाद्राविडीगल्ला- तकानि चित्रकश्चेति ॥ ५४ ॥
एष मुस्तादिको नाम्ना गणः श्लेष्मनिषूदनः ।
योनिदीषहरः स्तन्यशोधनः पाचनस्तथा ॥ ५५ ॥
मुस्ता (नागर मोथा), हरिद्रा (हल्दी), दाहहरिद्रा (दारुहल्दी), हरीतकी, आँवला, बेहड़ा, कूठ, हैमवती (श्वेत वच), पाठा, कटुरोहिणी (कुटकी), शाङ्गुष्टा (यव- कतिका), अतिविषा (अतीस), द्राविडी (हलायची), भल्लातक (मिलावा), चित्रक (चीता)—यह मुस्तादिगण कफनाशक है । योनिदीषनाशक, दूध का शोधन करनेवाला और पाचन है ॥ ५४, ५५ ॥
हरीतक्यामलकविभीतकान्ति त्रिफला ॥ ५६ ॥
त्रिफला कर्कपित्तघ्नी मेहकुष्ठविनाशनी ।
चक्षुष्या दीपनी चैव विषमञ्चरताशिनी ॥ ५७ ॥
हरड, बेहड़ा और आँवला—इनका नाम त्रिफला है ।
यह त्रिफला—कर्कपित्तनाशक है, प्रमेह कुष्ठ को नष्ट करता है, आँखों के लिये हितकारी, अग्निदीपक और विषम ज्वर को नष्ट करता है ॥ ५६, ५७ ॥
पिप्पलीमरिचशृंगवेराणीति त्रिकुटुकम् ॥ ५८ ॥
शृंगण कफमेदोघ्नं मेहकुष्ठत्वगामयान् ।
निहन्त्यादीपनं गुल्मपीनसारन्यल्पतामपि ॥ ५९ ॥
पिप्पल्यादिगण—पिप्पली, मरिच, शृङ्गवेर (सौंठ)—
इनका नाम त्रिकुटु है । यह त्रिकुटु (शृंगण) कफ मेदनाशक, प्रमेह, कुष्ठ, ल्वा के रोगों को दूर करता है । अग्निवर्धक है, गुल्म, पीनस, आग्निमान्द्य को दूर करता है ॥ ५८, ५९ ॥
आमलकीहरीतकीपिप्पलीचित्रकाश्चेति ॥ ६० ॥
आमलक्यादिरित्येष गणः सर्वञ्चरापहः ।
चक्षुष्यो दीपनो वृष्यः कफारोचकनाशनः ॥ ६१ ॥
आँवला, हरड, पिप्पली और चित्रक—यह आमलकादि- गण सब प्रकार के ज्वरों को दूर करता है । आँखों के लिये हितकारी अग्निदीपक, वृष्य, कफ एवं अरुचिको नष्ट करता है । त्रपुसीसताघ्नरजतसुवर्णकुण्डलोहानि लोहमलश्चेति ॥ गणच्छ्वादिरित्येष गरकुमिहरः परः । पिपासाविषहृद्दोगपाण्डुमेहहरस्तथा ॥ ६२ ॥
त्रपु, सीसक, ताम्बा, रजत (चाँदी), कुण्डलोह (तीक्ष्ण- लोह) स्वर्ण, लोहमल (किट्) —यह त्रप्वादिगण, गर (कुत्रिम विष) एवं कुमिनाशक है । पिपासा, विष, हृदयरोग, पाण्डु, प्रमेह को दूर करता है ॥ ६२, ६३ ॥
लाक्षारेवतकुटजाश्वसारकटफलहरिद्राद्रव्यनिम्बसप्त - चन्दमालत्यन्त्रायमाणं चेति ॥ ६४ ॥
कषायतिक्तमधुरः कफपित्तातिनाशनः ।
कुष्ठकुमिहरश्चैव दुष्टव्रणविशोधनः ॥ ६५ ॥
लाक्षा (लाख), आरेवत (शम्भाक), कुटज (कूड़ा), अश्वमार (करवीर), कटफल (कायफल), हरिद्राद्रव्य (हल्दी, दारुहल्दी), निम्ब, सप्तचन्द (सातवन), मालती (चमेली), त्रायमाण (जलबहुला) और (त्रिफला), यह गण कषाय, तिक्त, मधुर रस, कफ-पित्तज रोगों को नष्ट करनेवाला, कुष्ठ- कुमिनाशक, एवं दूषित व्रण का शोधक है ॥ ६४, ६५ ॥
पञ्च पञ्चमूलान्यत ऊर्ध्वं वक्ष्यामः—
तत्र त्रिकुटुकबृहतीद्रव्यप्रथक्पण्यो विदारिगन्धा चेति कनीयः ॥ ६६ ॥
कषायतिक्तमधुरः कनीयः पञ्चमूलकम् ।
वातघ्नं पित्तशमनं बृंहणं बलवर्धनम् ॥ ६७ ॥
इसके आगे पाँच पञ्चमूल कहते हैं । इनमें—प्रथम पञ्च- मूल, त्रिकुण्टक (गोलरु), छांटी कटेरी, कड़ी कटेरी (पुशिन- पर्णी) और विदारीगन्धा (शालपर्णी)—यह लघु पञ्चमूल है । यह लघु पञ्चमूल-कषाय, तिक्त, मधुररस है, वातनाशक, पित्तशामक, बृंहण एवं बलवर्धक है ॥ ६६, ६७ ॥
विल्वगनिमन्थटिण्टुकपाटलाः कारमरी चेति महत् ।
सतिक्तं कफवातघ्नं पाके लघ्वगनिदीपनम् ।
मधुरानुरसं चैव पञ्चमूलं महत् स्मृतम् ॥ ६८ ॥
महापञ्चमूल—विल्व (बेलगिरि), अग्निमन्थ (अरणी), टिण्टुक (शयोनाक), पाटला (पाटली) और कारमरी (गम्भारी)—यह महा पञ्चमूल है । महापञ्चमूल—तिक्तरस, कफवातनाशक, पाक में लघु, अग्निवर्धक, मधुर अनुरस है ॥
अनयोर्दशमूलमुच्यते ॥ ७० ॥
गणः श्वासहरो लोह कफपित्तानिलापहः ।
आमस्य पाचनश्चैव सर्वञ्चरविनाशनः ॥ ७१ ॥
१ किटु का लक्षण— “शताब्दमूलमं किटुं मध्यच्छ्वाशीतिबाषिकम् । अधमं षष्ठिवर्षाय ततो हीनं विषोषमम् ॥