भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ३६ ]

सूत्रस्थानम्

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इन दोनों ( लघु और महान् ) को दशमूल कहते हैं । यह दशमूल—शासनशाक, कफ, पित्त, वायु नाशक, आम का पानक एवं सब प्रकार के ज्वर को नष्ट करता है ॥७०,७१॥

विदारीसारिवारजनीगुड्छयोऽजशृङ्गी चेति वल्लीसंज्ञः ७२। करमर्दत्रिकण्टकसैरीयकशतावरीगुध्रनख्य इति कण्टकसंज्ञः रक्तपित्तहरी ह्यौ शोकत्रयविनाशनौ ॥७३॥

सर्वमेहहरी चैव शुक्रदोषविनाशनौ ॥७४॥

वल्लीपञ्चमूल—विदारीकन्द, सारिवा (अनन्तमूल), रजनी (हल्दी), गुड्छी और अजशृङ्गी (काकड़ाशृङ्गी), यह वल्ली पञ्चमूल है ।

कण्टक पञ्चमूल—करमर्द (करौंदा), त्रिकण्टक, (गोखरु), सैरीयक (झिण्टी), शतावरी और गुध्रनख (नाखून) ये कण्टक पञ्चमूल हैं ।

ये दोनों पञ्चमूल रक्तपित्तनाशक, वातपित्त, कफजन्य तीनों प्रकार के शोथों को नष्ट करते हैं । सब प्रकार के प्रमेहों को मिटाते हैं । शुक्रदोष को दूर करते हैं १ ॥७२-७४॥

कुशकाग्नलदभकाण्डेलुका इति तृणसंज्ञकः ॥७५॥

मूत्रदोषविकारं च रक्तपित्तं तथैव च ।

अन्त्यः प्रयुक्तः क्षीरेण शीघ्रमेव विनाशयेत् ॥७६॥

तृण पञ्चमूल—कुश, काश, नल, दर्भ, काण्डेलु (गन्ना)

इनकी तृणपञ्चमूलसंज्ञा है । यह तृण पञ्चमूल मूत्रदोष का, रक्तपित्त को दूध के साथ देने से शीघ्र आराम कर देता है १ ॥७५,७६॥

एषां वातहरावाद्यावन्त्यः पित्तविनाशनः ।

पञ्चको इलेषमग्ननावितरो परिकीर्तिता ॥७७॥

इनमें लघु एवं महापञ्चमूल वातनाशक हैं, तृणपञ्चमूल पित्तनाशक है । शेष दो, वल्ली और कण्टक पञ्चमूल दानो कफनाशक हैं ॥७७॥

त्रिवृतादिकमन्यत्रोपदेक्ष्यामः ॥७८॥

त्रिवृत्त आदि को अन्यत्र कहेंगे ॥७८॥

समासेन गणां ह्यौ प्रोक्तास्तेषां तु विस्तरम् ।

चिकित्सितेषु वक्ष्यामि, ज्ञात्वा दोषबलाबलम् ॥७९॥

यहाँ पर ये गण संक्षेप में कह दिये हैं—इनका विस्तार

चिकित्सास्थान में दोषादि के बलाबल की अपेक्षा से करेंगे ॥

१. वल्लीज पञ्चमूल—

“वल्लीजं पञ्चमूलं तु प्रशस्तं कफनाशनम् ।

सूष्टूमृगानिलहर्षं वृष्यमिन्द्रियबोधनम् ॥”

कण्टकपञ्चमूल—

“कण्टकाख्यं पञ्चमूलं कफानिलहर्षं परम् ।

मधुरानुरसं चैव पक्वासायविशोधनम् ॥”

२. क्षीरपाकविधि—

“द्वय्यादष्टगुणं तोयं, क्षीरात्तोयं चतुर्गुणम् ।

क्षीराबशेषः कर्त्तव्यः क्षीरपाके त्वयं विधिः ॥”

एभिलपान् कवायांश्च तैलं सर्वांषि पानकान् ।

प्रविभज्य यथान्यायं कुर्वीत मतिमान् भिषक् ॥८०॥

बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि इन गणों से लेप, कषाय, तैल, घी, पानक (ठण्ढाई आदि) आदि वस्तुयें आवश्यकता-नुसार तैय्यार करनी चाहिये ॥८०॥

धूम्रवर्षांनिलकलैदैः सर्वतुष्ट्यनभिदुते ।

प्राहयित्वा गुह्ये न्यस्येद्विधिनौषधसंग्रहम् ॥८१॥

विधिपूर्वक औषधियों को एकत्रित करके—धूम्र, वर्षा, वायु, जल से रहित एवं सब ऋतुओं में उपद्रवों से रहित घर में औषधियों का संग्रह करना चाहिये ॥८१॥

समीक्ष्य दोषभेदांश्च भिन्नान् मिश्रान् प्रयोजयेत् ।

पृथङ्मिश्रान् समस्तान्वा गणं वा व्यस्तसंहतम् ॥८२॥

दोषों को भिन्न-पृथक् पृथक् देखकर गणों को भी पृथक् पृथक् प्रयोग करना चाहिये । दोषों को मिश्रित (द्वन्द्व रूप में) देखकर गणों को मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । समस्त (तीनों) दोषों के मिले होने पर-तीन या अधिक गणों को मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । अथवा गण की एक दो तीन या चार औषधियों को पृथक् या दूसरे गण की औषधियों से मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ॥८२॥

इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यसंग्रहणीयो नामाष्टविंशोऽध्यायः ॥३८॥

एकोनचत्वारिंशतमोऽध्यायः

अथातः संशोधनसंग्रहनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे संशोधन, संशमनीय नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने शुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

मदनकुट्जजीमृतकेद्वाकुषामार्गवक्रुतेवेधनसर्षपनि - दङ्गपिप्पलीकरञ्जप्रपुन्नाडकोविदारकनुदारादिष्टाधगन्धा - विदुल्वनधुजीवकरवेताशणपुष्पी-बिम्बीवचाभुगेवर्विश्चित्रा चेत्युर्ध्वभागहराणि । तत्र, कोविदारपूर्वाणां फलानि, कोविदारादोनां मूलानि ॥३॥

संशोधन दो प्रकार का है । वमन और विरेचन । इनमें वमन मुख्य होने से इसको प्रथम कहते हैं—

मदन ( मेनफल ), कुट्ज ( कूड़ा ), जीमूतक ( देवदाली), इद्वाकु ( कडुवी तुरई), कृतवेधन (कोषातकी का भेद), सर्षप ( सरसों ), विडंग ( वायविडंग ), पिप्पली, करञ्ज, प्रपुन्नाड (पन्याड), कोविदार ( कचनार), कर्बुदार (लसोड़ा), अरिष्ट (नीम), असगन्धा, विदुल (वेतस), वन्धुजीवक (वन्धुजीव), श्वेता (श्वेतवच), शणपुष्पी, बिम्बी (कडुरी), वचा, भुगेवर्व

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