भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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२० ४० ]

सूत्रस्थानम्

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चन्दन (श्वेत चन्दन), कुचन्दन (लाल चन्दन), हीबेर (बालक हीबेर), उशीर (खस), मजीठ, पयस्या (धीरकाकोली, शतावरी), विदारीकन्द, शतावरी, गुंदा (एडकाकचूण), शोवाल (काई), कल्लार (लाल कमल), कुमुदोत्पल (श्वेत कमल), कन्दली (पद्मवीज या सर्पच्छत्रिका), दूर्वा, मूर्वा आदि (मधुर, तिक्र द्रव्य), काकोल्यादि, सारिवादि, अञ्जनादि, उत्पलादि, न्यघो-धादि और तृण पञ्चमूल—यह संक्षेप में पित्तशामक वर्ग है ॥८॥

कालेयकागुरुतिलपर्णीकुष्ठहरिद्राशीतशिवजतपुष्पास-रलारान्ताप्रकीर्यादकीर्यङ्गदौमुमनः काकादनीलाङ्गलकीह-स्तिकर्णमुञ्जातकलामञ्जकप्रभृतीनि बल्लीकण्टकपञ्चमूल्यौ पिप्पल्यादिषु हृत्यादिसुष्ककादिर्वचादिः सुरसादिरारम्भ-धादिरिति समासेन श्लेष्मसंशमनो वर्गः ॥९॥

कालेयक (मलयाचल का चन्दन विशेष जो काले रंग का होता है), अगुरु (अगर), तिलपर्णी (हुलहुल), कूठ, हरिद्रा, शीतशिव (कपूर), शतपुष्पा (सौफ), सरला (त्रिबुत), रास्ता, प्रकीर्या (गोटाकरज), उदकीर्या (चिरबिल्व, करज), इंगुदी, सुमन (चमेली), काकादनी (हिला, गुञ्जा), लंगली (कलिहारी) हस्तिकर्ण (लाल एरण्ड), मुञ्जातक (स्वरूपकन्द-विशेष), लाम-ञ्जक (उशीर) आदि द्रव्य, बल्ली एवं कण्टक पञ्चमूल, पिप्प-ल्यादि, बृहत्यादि, मुष्ककादि, बचादि, सुरसादि, आरम्भधादि गण संक्षेप में कफनाशक है ॥९॥

तत्र सर्वाण्येवौषधानि व्याध्यग्निपुरुषबलान्यभिस्-मौक्ष्य विदध्यात् । तत्र, व्याधिवलादधिकमौषधमुपयुक्तं तमुपगम्य व्याधि व्याधिसन्यमावहति; अग्निबलादधिक-मजीर्णं विष्टम्ब्य वा पच्यते; पुरुषबलादधिकं ग्लानिमूर्च्छा-मदानावहति संशमनम्; एवं संशोधनमतिपातयति । हीनमेभ्यो दत्तमकिंचित्करं भवति । तस्मान् समसेव विदध्यात् ॥१०॥

इनमें संशोधन एवं संशमन सब औषधियाँ रोग, अग्नि, पुरुष के बल को देखकर प्रयुक्त करनी चाहिये । यदि व्याधि के बल से अधिक औषधि रोगी को दी जाती है, तो वह रोग को शान्त करके अन्य रोग को उत्पन्न कर देती है । अग्निबल से अधिक औषध अजीर्ण उत्पन्न करके, शरीर में देर तक स्थिर होकर (विषम्व या) शूल उत्पन्न करके पचती है । पुरुष बल से अधिक औषध ग्लान, मूर्च्छा, मद (नशा) उत्पन्न करती है । ये संशमन द्रव्यों के गुण, दोष हैं । संशोधन औषध भी बहुत हानि करती है । हीन मात्रा में दी हुई औषध कुछ गुण नहीं करती, इसलिये उचित मात्रा में औषध देनी चाहिये ॥१०॥ भवन्ति चात्र—

रोगे शोधनसाध्ये तु यो भवेदोषदुर्बलः । तस्मै दद्याद् भिषक् प्राज्ञो दोषप्रच्छावन् मृदु ॥११॥

कहा भी है—

संशोधन साध्य रोग में जो रोगी दुर्बल हो, उस के लिये कोमल विरेचन देना चाहिये । (यथा मृदु-वीर्य, अमलतास आदि) ॥११॥

चले दोषे मृदौ कोष्ठे नेक्षेतात्र बलं नृणाम् । अन्याधितुर्बलस्याति शोधनं हि तदा भवेत् ॥१२॥ स्वयं प्रवृत्तदोषस्य मृदुकोष्ठस्य शोधनम् । भवेदल्पबलस्यापि प्रयुक्तं व्याधिनाशनम् ॥१३॥

दोष के अपने स्थान से चलायमान होने पर एवं कोष्ठ के मृदु होने पर बिना व्याधि के कारण (उपवासादि से) दुर्बल होने की अवस्था में—रोगी के बल की विवेचना नहीं करनी चाहिये । यह दुर्बल विरेचन को सहन नहीं कर सकता, ऐसा विचार नहीं करना चाहिये । क्योंकि—जब दोष स्वयं प्रवृत्त (चलायमान) हो रहे हों, कोष्ठ मृदु हो, अल्प बलवाले रोगी को भी दिया हुआ संशोधन रोग का नाशक होता है । (कहा भी है—अपने स्थान से स्वलिप्त, पके हुए दोषों को निबल या बलवान् दोनों को निकालना चाहिये ।) ॥१२,१३॥ व्याध्यादिषु तु मध्येषु क्वथस्याञ्जलिख्यते । बिडालपदकं चूर्णं देयः कल्कोऽश्चसमितः ॥१४॥

रोग अग्नि एवं पुरुष के मध्यम बल होने पर (श्रुत, शीत, फाण्ट) को अञ्जलि (चार पल) देनी चाहिये । चूर्ण-बिडाल पद (एक कर्ष), कल्क (द्रवपिष्ट) एक अक्ष (कर्ष मात्र) देना चाहिये । रोग आदि के हीन बल होने पर मात्रा भी अधिक होनी चाहिये ॥१४॥

इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने संशोधनवंशमनीयोः नामैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३६ ॥

चत्वारिंशतमोऽध्यायः

अथातो द्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'द्रव्य, रस, गुण, वीर्य विपाक विज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १,२ ॥

१. द्रव्य—औषध, रस, मधुरादि, गुण-शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, मन्द, तीक्ष्ण, गुरु, लघु, पिच्छिल, विशद, श्लक्ष्ण, पक्ष, कठिन, मृदु, द्रव, सान्द्र, स्थिर, सर, स्थूल, सूक्ष्म—ये बीस गुण हैं । वीर्य आठ प्रकार का है । (आगे-शीतोष्ण भेद कहेंगे) । गुण और वीर्य-में भेद-हरीतकी के समान ही आँखें में गुण हैं ।