सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुक्तसंहिता
[ अ० ४० ]
केचिदाचार्यां द्रव्यते—द्रव्यं प्रधानं कस्मात् ? व्यवस्थितत्वात्, इह खलु द्रव्यं व्यवस्थितं न रसादयः, यथा—आमे फले ये रसादयस्ते पक्वे न सन्ति; नित्यत्वाच्च, नित्यं हि द्रव्यमनित्या गुणाः, यथा कल्कादिप्रविभागः, स एव संपन्नरसगन्धो व्यापन्नरसगन्धो वा भवति; स्वाजात्यवस्थानाच्च, यथा हि पार्थिवं द्रव्यमन्यभावं न गच्छत्येवं शेषाणि; पञ्चन्द्रियग्रहणाच्च, पञ्चभिरिन्द्रियैर्गृह्यते द्रव्यं न रसादयः; आश्रयत्वाच्च, द्रव्यमाश्रिता रसादयः; आरम्भसामर्थ्याच्च, द्रव्याश्रित आरम्भः, यथा—‘विदारिगन्धादिमाहृत्य संजुच्य विपचेत्’ इत्येवमाद्विषु न रसादिस्वारम्भः, आद्यप्रामाण्याच्च. शास्त्रे हि द्रव्यं प्रधानमुपदेशे योगानां, यथा—‘मातुलुङ्कारिनमन्थो च’ इत्यादौ न रसादय उपदिश्यन्ते, क्रमापेक्षितत्वाच्च रसादीनां, रसादयो हि द्रव्यक्रममपेक्षन्ते, यथा—तरुणे तरुणाः संपूर्णं संपूर्णो इति, एकदेशसाध्यत्वाच्च, द्रव्याणांमेकदेशे नापि व्याधयः साध्यन्ते यथा—महावृक्षक्षीरेणेति, तस्माद्द्रव्यं प्रधानं न रसादयः; कस्मात् ? निरवयवत्वात् । द्रव्यलक्षणं तु ‘क्रियागुणवत् समवायिकारणम्’ इति ॥१॥
कुछ आचार्यों की सम्मति है कि इन सब में ‘द्रव्य’ ही प्रधान है। कारण-व्यवस्थित होने से। द्रव्य ही व्यवस्थित रहता है, रस आदि व्यवस्थित नहीं रहते। जिस प्रकार कि कच्चे फल में प्रथम कषाय, अम्ल रस रहता है, पकने पर पीछे मधुर रस उत्पन्न हो जाता है—वे रस नहीं रहते, परन्तु वह आम का फल-आम्रतक या कोशाम् दूसरा फल नहीं बनता, अपितु आम ही रहता है। दूसरा कारण—नित्यत्वात् नित्य होने से द्रव्य प्रधान है। द्रव्य नित्य हैं और गुण अनित्य—विनाशी हैं। जिस प्रकार कल्क (स्वरस, श्रुत, फाण्ट) आदि में गुण, रस, गन्ध, वे ही रहते हैं, या बदल बिगड़ जाते हैं। तीसरा कारण—अपनी (पार्थिवादि) जाति में अवस्थित रहने के कारण द्रव्य प्रधान है। जिस प्रकार पार्थिव द्रव्य, जलीय आदि जाति में परिवर्चित नहीं होते, उसी पार्थिव रूप में रहते हैं। चौथा कारण—पाँचों इन्द्रियों से द्रव्य का ग्रहण होता है। इसलिये द्रव्य प्रधान है। पाँचों इन्द्रियों से द्रव्य का ही ग्रहण होता है, रस आदि का नहीं। पांचवाँ कारण-आश्रय होने से द्रव्य प्रधान है। रसादि द्रव्य में ही आश्रय करके रहते हैं। छठा कारण—योग का आरम्भ—उपक्रम सामर्थ्य में ही है। यथा-विदारीगन्धा आदि द्रव्यों को लाकर,
परन्तु वीर्य में भेद है, हरीतकी उष्णवीर्य और आंवला शीतवीर्य है। द्रव्य, रस, गुण, विपाक द्वारा जो कार्य नहीं हो सकता, वह प्रभाव से होता है।
“वीर्यं शक्तिरस्यतिविशेषः सामर्थ्यं प्रभाव इत्यर्थान्तरम् ।”
कूटकर पकाना चाहिये, यह व्यवहार द्रव्य में ही होता है, रसादि में नहीं। सातवाँ कारण—शास्त्र के प्रमाण से द्रव्य प्रधान है। यथा—मातुलुङ्कारिगन्ध आदि में द्रव्य का ही उपदेश शास्त्र में है, रसादि का नहीं। आठवाँ कारण—रस आदिमें क्रम की अपेक्षा रहती है, क्योंकि रस आदि द्रव्य के क्रम की अपेक्षा रखते हैं। यथा—तरुण द्रव्य में रस भी तरुण रहते हैं, सम्पूर्ण द्रव्य में रस भी सम्पूर्ण रहते हैं। नौवाँ कारण—रोगों के एकदेश द्वारा साध्य होने से। यथा—द्रव्यों के एक भाग से रोग अच्छे होते हैं—जैसे—महावृक्ष के दूध से। इसलिये रस-वीर्य-विपाक में द्रव्य ही प्रधान है। रसादि प्रधान नहीं। क्योंकि रसादि अवयव रहित हैं। द्रव्य का लक्षण—क्रिया गुणवान् एवं समवायिकरणवाला द्रव्य है। जिसमें क्रिया तथा गुण रहें और जो समवायी करण हो वह द्रव्य है, यथा—वृक्ष में तन्तु, घड़े में मिट्टी ॥१॥
नेत्याहुर्नर्ये, रसास्तु प्रधानं; कस्मात् ? आगमात्, आगमो हि शास्त्रमुच्यते, शास्त्रे हि रसा अधिकृताः, यथा—रसायत्त अहार इति, तस्मिन्तु प्राणाः उपदेशात् उपदिश्यन्ते हि रसाः, यथा—मधुराम्ललवणा वान् शमयन्ति; अनुमानाच्च, रसेन हानुमीयते द्रव्यं, यथा—मधुरमिति; ऋषिवचनाच्च, ऋषिवचनं वेदो यथा—किंचिद्विद्यार्थं मधुरमाहुरेदिति, तस्माद्दसाः प्रधानं; रसेषु गुणसंज्ञा । रसलक्षणमन्यत्र पदेद्व्यामः ॥४॥
दूसरे आचार्यों का कथन है कि यह ठीक नहीं (द्रव्य प्रधान नहीं है), रस ही प्रधान हैं। क्योंकि—आगम के प्रमाण से। आगम का अर्थ शास्त्र है। शास्त्र में रस को ही प्रधानता दी गई है। यथा—आहार रस के अधीन है और प्राण आहार के आश्रित हैं। दूसरा कारण—उपदेश से यथा—मधुर, अम्ल, लवण रस वायु का शमन करते हैं। तीसरा कारण—अनुमान से रस के द्वारा ही द्रव्य का अनुमान होता है, यथा—यह मीठा है। चौथा कारण—ऋषि के वचन से। ऋषिवचन का अर्थ वेद है, यथा—यज्ञ के लिये कुछ थोड़ा मधुर (मीठा) लाओ, यहाँ पर द्रव्य को न कहकर रस को मांगा। इसलिये रस ही प्रधान है। रस की भांति गुण भी प्रधान है। रस का लक्षण (रसविज्ञानीय अध्याय में) कहेंगे ॥४॥
नेत्याहुर्नर्ये, वीर्यं प्रधानमिति। कस्मात् ? तद्वशेनौषधकर्मान्मप्यतेः। इहौषधकर्माण्युधर्वाधोभागोभयभागांसंशोधनसशमनसाङ्ग्राहिकगिन्दीपनपीडनलेखनबृहणं रसायनवाज्करणश्वयशुकरविलयनदहनदारणमादनप्राणघ्नविषप्रशमनादीनि वीर्य प्रधान्याद्भवन्ति। तच्च वीर्य द्विविधमुष्णं शोतं च, अग्नीषोमीयत्वाज्जगतः। केचिदष्टविधमाहुः शीतमुष्णं क्षिप्रं रूक्षं विशदं पिच्छिलं मृदुं तीक्ष्णं