भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सूत्रस्थानम्

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चेति । एतानि वीर्याणि स्वबलगुणोत्कर्षाद्दसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति । यथा तावन्महत्पञ्चमूलं कषायं तित्तानुरसं वातं जमयति, उष्णवीर्यत्वात्, तथा कुल्लथः कषायः कटुकः पलाण्डुः, स्नेहभावाच्च, मधुररुचेःप्रसरो वातं वर्धयति, शीतवीर्यत्वात् ; कटुका पिप्पलीं पित्तं जमयति, मृदु शीतवीर्यत्वात्, अम्लमामलकं लवणं सैन्धवं च, तित्ता काकमाचीं पित्तं वर्धयति, उष्णवीर्यत्वात् ; मधुरा मत्स्याश्च; कटुकं मूलकं श्लेष्माणं वर्धयति, स्निग्धवीर्यत्वात् ; अम्लं; कपित्थं श्लेष्माणं जमयति, रूक्षवीर्यत्वात्, मधुरं क्षौद्रं च तदेतन्निन्दर्शनमात्रमुक्तम् ॥४॥

यह भी ठीक नहीं—वीर्य ही प्रधान है, ऐसा तीसरे आचार्यों का मत है । कारण—वीर्य की अधीनता से औषध कर्म होता है । औषध कर्म, यथा—ऊर्ध्वभाग (वमन), अधोभाग (विरेचन), दोनों भागों का संशोधन, संशमन, संग्राहक (शाल्मलीवृक्ष आदि), अग्निदीपक (चित्रक आदि), प्रपीड़न, लेखन (पत्तलीकरण), बृंहण, रसायन, वाजीकरण, क्षयशुकर, क्षयशुबिलयन, दहन, द्वारण, मादन (मत्तताकरण), प्राणघ्न, विषप्रशमन (अगदादि), आदि कर्म वीर्य की प्रधानता से ही होते हैं । यह वीर्य दो प्रकार का है—शीत और उष्ण । क्योंकि—जगत् अग्नीषोमीय है, आग्नेय एवं सौम्य तत्त्वों से उत्पन्न हुआ है । कई आचार्यों का मत है कि वीर्य आठ प्रकार का है—शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विशद, पिच्छिल, मृदु और तीक्ष्ण । ये वीर्य अपने गुण की प्रधानता से रस को पराजित करके अपना कार्य करते हैं । यथा—महापञ्चमूल उष्णवीर्य होने से ही तित्तकषाय-अनुरस होने पर भी वायु का शमन करता है । कुल्लथी कषाय रस, पलाण्डु कटुरस होने पर भी स्निग्ध (स्निग्धवीर्य) होने से वायु का शमन करते हैं । गन्ने का मधुर रस—शीतवीर्य होने से वायु को बढ़ाता है । पिप्पली का कटुरस मृदु, शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करता है । आँवले का खट्टा रस और सैन्धव का लवण रस मृदु, शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करते हैं । मकोय का तित्तरस पित्त को बढ़ाता है, उष्णवीर्य होने से । मछलियों का मधुर रस, मूली का कटुरस कफ को बढ़ाता है स्निग्ध वीर्य होने से । रूक्ष वीर्य होने से, खट्टा कैथ और मधुर शहद कफ का शमन करते हैं । यह केवल उदाहरण मात्र ही हैं ॥५॥

भवन्ति चात्र— ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेषु चै । रौच्यलाघवशैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ॥६॥

१ उपनिषदों में भी कहा है—‘प्रजापतिः प्रजाकामी । स तपस्तत्त्वा मिथुनमुत्पादयते । रयिञ्च प्राणञ्च, इत्येवा प्रजाः करिष्यन्ते । रयिरैव चन्द्रमाः, प्राण एव सूर्यः ॥’

प्रकोपनिषद् ।

ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु चै । तैश्चयोष्णयलघुनाश्चैव न ते तत्कर्मकारिणः ॥७॥ ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु चै । स्नेहगौरवशैत्यानि न ते तत्कर्मकारिणः ॥८॥ तस्माद्वीर्यं प्रधानमिति ॥९॥

कहा भी है— जो रस (मधुर, अम्ल, लवण) वायु का शमन करते हैं, यदि इनमें रूक्ष, लघु, शीतवीर्य हो तो ये वायु का शमन नहीं कर सकते । जो रस (मधुर, तित्त, कषाय) पित्त का शमन करते हैं, यदि इनमें तीक्ष्ण, उष्ण, लघु वीर्य हो तो ये पित्त का शमन नहीं कर सकते । जो रस (कटु, तित्त, कषाय) कफ का शमन करते हैं, यदि इनमें स्नेह गुरु, शीतवीर्य हो तो ये कफ का शमन नहीं कर सकते । इसलिये रस से भी वीर्य ही प्रधान है ॥

नेत्याहुर्नये, विपाकः प्रधानमिति । कस्मात् ? सम्यङ्-मिथ्याविपक्त्वात्; इह सबद्रव्याण्यभ्यवहृतानि सम्यङ्-मिथ्याविपकानि गुणं दोषं वा जनयन्ति । तत्राहुर्नये-प्रतिरसं पाक इति । केचित्त्रिविधमिच्छन्ति—मधुरमम्लं कटुकं चेति । तत्तु न सम्यक्, भूतगुणादामाच्छान्योऽन्तो विपाको नास्ति; पित्तं हि विदग्धमम्लतामुपैत्याग्नेयत्वात् ; यद्येवं लवणोऽप्यन्यः पाको भविष्यति, श्लेष्मा हि विदग्धो लवणतामुपैतोति । मधुरो मधुरस्याम्लोऽम्लस्यैवं सर्वेषामिति केचिदाहुः, दृष्टान्तं चोपदिशन्ति,—यथा तावत् क्षीरमुखगन्तं पञ्चयमानं मधुरमेव स्यात्तथा शालिखमुद्गादयः प्रकीर्णोः स्वभावमुत्तरकालेऽपि न परित्यजन्ति तद्वदिति । केचिद्वदन्ति—अवलवन्तो बलवतां वशमायान्तोति । एवमनवस्थितिः, तस्माद् सिद्धान्त एष आगमे हि द्विविध एव पाको मधुरः कटुकश्च । तयोर्मधुराख्यो गुरुः, कटुकाख्यो लघुरिति । तत्र पृथिगप्येत्येजोवाय्वाकाशानां द्वैविध्यं भवति गुणसाधन्याद् गुरुता लघुता च; पृथिग्यापश्च गुर्न्यः शेषाणि लघूनि; तस्माद् द्विविध एव पाक इति ॥१०॥

यह बात ठीक नहीं, विपाक ही प्रधान है—ऐसी चौथे आचार्यों की सम्मति है । कारण—सब भुक्त द्रव्य ही, विपाक द्वारा गुण या दोष को उत्पन्न करते हैं । सम्यक् विपाक होने पर गुण एवं मिथ्याविपाक होने पर दोष उत्पन्न करते हैं । कई आचार्यों का कहना है कि पाक—प्रत्येक रस के अनुसार होता है । (इस प्रकार से छः प्रकार का विपाक है) । कोई तीन प्रकार का विपाक मानते हैं, यथा—मधुर, अम्ल और कटु । यह ठीक नहीं है । क्योंकि—पृथ्वी और अग्नि के गुणों से एवं आम के कारण ‘अम्ल’ विपाक नहीं है—पित्त ही विदग्ध होकर

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