भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४० ]

अम्ल हो जाता है, आग्नेय गुण होने से । यदि अम्ल विपाक को मानने हो तो—'लवण' भी एक पाक होगा, क्योंकि श्लेष्मा विदग्ध होकर 'लवण' हो जाता है। कई आचार्यों का कहना है कि मधुररस का मधुरविपाक, अम्ल रस का अम्लविपाक । इस प्रकार से सब रसों का (प्रतिरस) विपाक होता है । वे अपने इस कथन की पुष्टि में उदाहरण भी देते हैं—जिस प्रकार थाली (कड़ाही) में रक्खा दूध पकने पर भी मधुर ही रहता है, जिस प्रकार शाली (हेमन्तधान्य), जो, मूळ आदि भी भूमि में बोए जाने पर दूसरा फल लगने (पकने) पर भी अपने स्वभाव का परित्याग नहीं कर सकते । इसी प्रकार से रस भी जठराग्नि द्वारा पाक होने पर भी अपने मधुर आदि स्वभाव का परित्याग नहीं कर सकते । कई आचार्यों का कथन है कि—निर्वल रस बलवान् रसों के वश में आ जाते हैं । इसलिये यह निश्चित नहीं, यह अनागम है । अपना पक्ष—शाल्व में दो ही प्रकार का पाक है, यथा—मधुर और कटु । इनमें मधुर विपाक गुरु और कटु विपाक लघु है । इनमें—पृथिवी, अप, तेज, वायु और आकाश, इन पञ्चमहाभूतों के भी गुरु लघु, गुण साधर्म्य के कारण दो भेद हैं । यथा—पृथिवी और जल गुरु, तेज वायु और आकाश लघु हैं । इसलिये पाक भी दो प्रकार का ही है ॥१०॥

भवन्ति चात्र—

द्रव्येषु पञ्चमानेषु येष्वन्वुपृथिवीगुणाः ।

निर्वर्तन्तेऽधिकस्तत्र पाको मधुर उच्यते ॥११॥

तेजोऽनिलाकाशगुणः पञ्चमानेषु येषु तु ।

निर्वर्तन्तेऽधिकस्तत्र पाकः कटुक उच्यते ॥१२॥

कहा भी है—

द्रव्यों के पाककाल में जब पृथ्वी और जल के गुण अधिक प्रबल होते हैं, तब मधुर विपाक होता है । और जिन द्रव्यों के पाककाल में तेज, वायु, आकाश के गुण अधिक प्रबल रहते हैं तब कटुविपाक होता है ॥११,१२॥

पृथक्त्वदग्निनामेव वादिनां वादसंग्रहः ।

चतुर्णामपि सामग्र्यमच्छन्त्यत्र विपक्षितः ॥१३॥

भिन्न-भिन्न रूपसे देखनेवाले वादियों के मत ऊपर दिखा दिये हैं । बुद्धिमान् मनुष्य रस, वीर्य, गुण और विपाक इन चारों की समुदायता को स्वीकार करते हैं ॥१३॥

तद्वद्रव्यमात्मना किंचित्किचिद्वीर्येण सेवितम् ।

किंचिद्रसविपाकाभ्यां दोषं हन्ति करोति वा ॥१४॥

कोई तो द्रव्य अपने द्रव्यत्व से, कोई द्रव्य अपने वीर्य से, कोई अपने रस से और कोई अपने विपाक से दोष को उत्पन्न करता है, या दोष का शमन करता है । यथा—खैर कुछ को, महत्पञ्चमूल वीर्य द्वारा वायु का शमन करता है । तित्त गिलोय

उष्णवीर्य होने पर भी (रस से) पित्त का शमन करती है । गुण्ठी कटु रस होने पर भी (मधुरविपाक के कारण) वायु का शमन करती है ॥१४॥

पाको नास्ति विना वीर्यद्वीर्यं नास्ति विना रसात् । रसो नास्ति विना द्रव्याद् द्रव्यं श्रेष्ठतमं स्मृतम् ॥१५॥

विना वीर्य के तो विपाक नहीं, विना रस के वीर्य नहीं, विना द्रव्य के रस नहीं, इसलिये द्रव्य को श्रेष्ठ कहा है ॥१५॥

जन्म तु द्रव्यरसयोरन्योन्यापेक्षिकं स्मृतम् ।

अन्योन्यापेक्षिकं जन्म यथा स्याद्देहेहिन्तोः ॥१६॥

वीर्यसंज्ञा गुणा येऽष्टौ तेषुि द्रव्याश्रयाः स्मृताः ।

रसेषु न भवन्त्येते निर्गुणास्तु गुणाः स्मृताः ॥१७॥

द्रव्ये द्रव्याणि यस्माद्धि विपञ्च्यन्ते न षड्साः ।

श्रेष्ठं द्रव्यमतो ज्ञेयं, शेषा भावास्तदाश्रयाः ॥१८॥

जिस प्रकार (देह शरीर) और देही (आत्मा) का जन्म परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा से है, उसी प्रकार द्रव्य एवं रस की उत्पत्ति अन्योन्याश्रित है । आठों प्रकार का वीर्य भी द्रव्य में ही आश्रित है । यह वीर्य रसों में नहीं हो सकता, क्योंकि गुण तो निर्गुण हैं (गुण में गुण नहीं रहता), गुण द्रव्य में रहते हैं । पञ्चमहाभूतों से बने इस द्रव्य (शरीर) में आहार द्रव्य पकते हैं, गुणों का पाक नहीं होता (मधुर आदि रस नहीं पकते) । इसलिये रस, वीर्य विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना चाहिये, ये रसादि उसी के आश्रित हैं ॥१६-१८॥

अमीमांस्थान्यचिन्त्यानि प्रसिद्धानि स्वभावतः ।

आगमेनोपयोव्यानि भेषजानि विचक्षणः ॥१९॥

जो औषधियाँ स्वभाव से ही प्रसिद्ध हैं (यथा—खदिर, तुवरक, रसाञ्जन, हरिद्रादि-कुष्ठनाशक हैं) ।—उनके विषय में विचार करने की आवश्यकता नहीं । क्योंकि इनका स्वभाव (प्रभाव) अचिन्त्य है । इसी प्रकार जो औषधियाँ शाल्व से व्यवहार में आती हैं, वे भी अविचारणीय हैं ॥१९॥

१ किंचिद् रसेन कुष्ठे कमं वीर्येण चापरम् ।

द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किञ्चन ॥

रसौ विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपौहति ।

बलसाम्ये रसादोनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ चरक ।

२ 'रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते ।

विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥

प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥'

प्रभाव दो प्रकार का है । यथा—चिन्त्य और अचिन्त्य । चिन्त्य प्रभाव पाठा का संयाही होना, अचिन्त्य प्रभाव—मणि-मुक्ता के धारण से रोगनिवृत्ति, दन्ती—चित्रक के समान रस, वीर्य होने पर भी एक विरेचक है, दूसरा नहीं ।

रस, वीर्य, विपाक प्रभाव के विस्तार के लिये—

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