सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाश्च स्वभावतः । नौषधीर्हंतुभिर्विद्वान् परीक्षेत् कदाचन ॥ २० ॥ सहस्रेणापि हेतूनां नामृषडादिविरेचेयेत् । तस्मात्तिष्ठेत्तु मतिमानागमे न तु हेतुषु ॥ २१ ॥ शास्त्र की प्रधानता—
जिन औषधियों का शास्त्र के कथनानुसार प्रत्यक्ष लक्षण, प्रत्यक्षफल दीखता है, स्वभाव से ही जिनके कार्य प्रसिद्ध हैं, उन औषधियों की तर्क द्वारा परीक्षा नहीं करनी चाहिये। हजारों तर्क से भी अम्बुषा (पाठा) आदि औषधियों से विरेचन कार्य नहीं प्राप्त किया जा सकता। इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि सदा शास्त्र के अनुसार व्यवहार करे—तर्क से नहीं ॥ २०, २१ ॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यगुणरसवीर्यविपा- कविज्ञानीयो नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४० ॥
एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो द्रव्यविशेषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके आगे 'द्रव्य-विशेष-विज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥
तत्र पृथिव्यपतेजोवायुत्राकाशानां समुदायाद् द्रव्याभि- निर्धत्तिः, उत्कर्षस्त्वभिपद्यज्ञको भवति—इदं पार्थिवमिद- माप्यमिदं तैजसमिदं वायव्यमिदमाकाशीयमिति ॥ ३ ॥
इनमें, पृथ्वी, अप्, तेज वायु और आकाश के मिलने से द्रव्य की उत्पत्ति होती है। इन पाँचों के समुदाय में से जिस भूत के गुणों की उत्कर्षता होती है, उसी से वह द्रव्य पहिचाना जाता है, यह पार्थिव है, यह जलीय है, यह तेजस है, यह वायवीय है, यह आकाशीय है। "इह हि द्रव्यं पञ्चमहाभूता- त्मकम् । तस्याधिष्ठानं पृथिवी, योनिरुदकं, खानिलानलसमवा- याभिर्वृत्तिविशेषौ ।" (अष्टांगसंग्रहः) ॥ ३ ॥
तत्र स्थूलसारसान्द्रमन्दस्थिरगुरुकठिनं गन्धबहुलमी- षत्कृपायं प्रायशो मधुरमिति पार्थिवं, तत् स्थैर्यबलगीर- वसंघातोपचयकरं विशेषतश्चाधोगतिस्वभावमिति ॥(१)॥
इनमें जो द्रव्य स्थूल, सार (हृद) सान्द्र (घन), मन्द, स्थिर, गुरु, कठिन, गन्धबहुल, थोड़ा कृपाय रस, प्रायः मधुर रस होता है, वह पार्थिव द्रव्य है। यह द्रव्य शरीर में स्थिरता, बल, गुरुता, कठिनता और वृद्धि उत्पन्न करता है। विशेषकर यह पार्थिव द्रव्य अघोगामी (विरेचन गुण) स्वभाववाला होता है ॥(१)॥
“द्रव्यगुण-संग्रह” अवश्य देखिये। अथवा श्रीयादवजी महाराज का “द्रव्य-गुण-विज्ञान” प्रथम भाग देखें।
शीतस्तिमितस्निग्धमन्दगुरुसरसान्द्रमुदुपिच्छिलं र- सबहुलमोषत्कृपायाम्ललवणं मधुररसप्रायमाप्यं; तत् स्नेहनह्लादनकंलेदनबन्धनविष्यनदनकरमिति ॥(२)॥
जो द्रव्य शीत, स्तिमित (जड़), स्निग्ध, मन्द, गुरु, सर (फैलेनेवाला), सान्द्र, मुदु, पिच्छिल, रसबहुल, ईषत्कृपाय, अम्ल-लवणरस, एवं प्रायः मधुर रस होता है, वह आप्य है। यह द्रव्य स्नेहन; प्रह्लादन (सुखोत्पत्ति में हेतु) क्लेदन (आर्द्रता), बन्धन (संहति उत्पन्न करनेवाला), विष्यनदन (द्रव का बहानेवाला) है ॥(२)॥
सष्ठगीदीणसूदमरूक्षखरलघुविशदं रूपबहुलमीषदम्ल- लवणं कटुकरसप्रायं विशेषतश्चोर्ध्वगतिस्वभावमिति तैजसं तदहनपचनदारणतापनप्रकाशनप्रभावर्णकरमिति ॥(३)॥
जो द्रव्य—उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, रूक्ष, खर, लघु, विशद, एवं रूप-गुण-बहुल थोड़ा अम्ल-लवण रस, प्रायः (अधिकतवा) कटुरस, खासकर ऊर्ध्वभाग (वमन) में जानेवाला तैजस द्रव्य है। यह द्रव्य—बहन (जलाने), पाचन (पकाने), दारण; तापन(शरीरादि सन्तापन), प्रकाशन (अभिव्यक्ति), प्रभा-तेज वर्ण—(गोरादि) करनेवाला है ॥(३)॥
सूदमरूक्षखरशिशिरलघुविशदं स्पर्शबहुलमीषत्तिक्तं विशेषतः कृपायमिति वायवीयं, तद्वैशघलाघवरूपनविरू- क्षणविचारणकरमिति ॥(४)॥
जो द्रव्य—सूक्ष्म, रूक्ष, खर, शिशिर, लघु, विशद, स्पर्श- बहुल, थोड़ा सा तिक्त रस और अधिकतवा कृपाय रसवाला हो, वह वायवीय द्रव्य है। यह द्रव्य—विशदता, लाघव, ग्लपन (हर्ष का नाश), विरूक्षण (रूक्षता), विचारण (मन में अनेक प्रकार के विचार) उत्पन्न करता है ॥(४)॥
ऋदण्णसूदममुदुन्यवायिविशदविविकतमव्यकतरसं अ- द्बबहुलमाकाशोयं, तन्माद्वेशोपिष्यलाघवकरमिति ॥(५)॥
जो द्रव्य—त्रिकना, सूक्ष्म, मुदु, व्यवायी (सम्पूर्ण देह में फैलकर जो पीछे से पक होता है), विभक्त (पृथक् बना हुआ), अव्यक्त रस, शब्दबहुल हाता है, वह आकाशीय द्रव्य है। यह मुदुता, शुभिरता (सन्निद्धता), और लघुताको उत्पन्न करता है।
अनेन निदशनेन नानौषधीभूतं जगति किंचिद् द्रव्य- मस्तीति कृत्वा तं तं युक्तिवांशेपमर्थं चाभिसमीद्वय स्व- वीर्यगुणयुक्तानि द्रव्याणि कामुकाणि भवन्ति। तानि यदा कुर्वन्ति स कालः, यत् कुर्वन्ति तत् कमं, येन कुर्वन्ति तद्वार्यं, यत्र कुर्वन्ति तदधिकरणं, यथा कुर्वन्ति स उपायः, यन्निरूपादयन्ति तत् फलमिति ॥ ५ ॥
इस दृष्टि से इस स्थावर-जङ्गम संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं है, जो कि औषधि-(दोषों का नाश करनेवाला) रूप न हो, (क्योंकि सब वस्तुयें पञ्चमहाभूतों के समुदाय से ही बनी हैं)। इसलिये—जल, अग्नि, संस्कार, भावना आदि