सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४१ ]
योजनाओं के कारण एवं नाना प्रकार के रोगों के नाश के प्रयोजन की दृष्टि से, सब द्रव्य अपने वीर्य एवं गुणों के कारण कार्यशील होते हैं। ये द्रव्य जिस समय में क्रिया करते हैं, वह काल है, जो क्रिया (शोधनादि, भेषज द्रव्य व्यापार) करते हैं, वह कर्म है, जिस शक्ति से कार्य करते हैं, वह वीर्य है, जिस स्थान में (पञ्चमहाभूतसमवायी शरीर में) कार्य करते हैं, वह अधिकरण है, जिस प्रकार (स्वरस, श्रुतु; फाण्ट, घृत, तैल आदि) से करते हैं वह उपाय है, जो (स्वास्थ्य या अस्वास्थ्य) उत्पन्न होता है, वह फल है ॥ ५ ॥
तत्र, विरेचनद्रव्याणि पृथिव्यन्मुखगुणभूयिष्टानि पृथिव्यापो गुर्ध्वः, तानि गुस्स्वादधोगच्छन्ति, तस्माद्विरेचनसधोगुणभूयिष्टमनुमानात्। वसनद्रव्याण्यग्निवायुगुणभूयिष्टानि, अग्निवायु हि लघु, लघुत्वाच्च तान्युर्ध्वमुत्तिष्ठन्ति, तस्माद्वसनसप्युर्ध्वगुणभूयिष्टम्। उभयगुणभूयिष्टमुभयतोभागम्, आकाशगुणभूयिष्टं संशमनं सांप्राहिकमानल्लगुणभूयिष्टम्, आनलस्य शाषणात्मकत्वात्, दीपनमग्निगुणभूयिष्टं, तत्समानत्वात्, लेखनमनिलानल्लगुणभूयिष्टं, बृहण् प्राथव्यन्मुखगुणभूयिष्टम्, एवमौषधकर्मप्यनुमानात् साधयेत् ॥ ६ ॥
विरचनद्रव्यां स पृथिवी एवं जल के गुणों की अधिकता रहती है। पृथिवी और जल भारी हैं, इसलिये भारी होने से नीचे जात है। इसलिये अनुमान द्वारा यह जाना जा सकता है कि विरेचनद्रव्य प्रायः अधागामी होते हैं। वसनद्रव्यों में—अग्नि एवं वायु के गुणों की अधिकता रहती है। अग्नि और वायु लघु हैं—इसलिये लघु होने से ऊपर जाते हैं। इसलिये वसन द्रव्य मा ऊपर का जात है। दोनों प्रकार के गुणवाले [अधामागों और ऊर्ध्वमागों] द्रव्य दोनों मागों से जाते हैं। आकाशगुण की अधिकतावाले द्रव्य संशमन गुणवाले हैं। सांप्राहक द्रव्यों में वायु के गुणों की अधिकता रहती है। चूंकि वायु शाषक है। दीपन गुणवाले द्रव्यों में अग्निगुणों की अधिकता रहती है। चूंकि ये आग्नेय द्रव्य—जाटगान के समान होते हैं। लेखनद्रव्यां में—वायु एवं अग्नि के गुणों की अधिकता होती है। बृहण्द्रव्यों में—पृथिवी एवं जल के गुणों की अधिकता रहती है। इस प्रकार से औषध के कार्यों को अनुमान से जानना चाहिये ॥ ६ ॥
भवान्त चात्र—
भूतजावागजद्रव्यैः शमं याति समीरणः।
भूयन्मुखवायुजः पित्तं क्षप्रमाप्नोति निर्धृतिम् ॥ ७ ॥
खेतजानल्लजः श्लेष्मा शममेति शरीरिणाम्।
वियत्पवनजाताभ्यां वृद्धिमभ्यति मारुतः ॥ ८ ॥
१ संशमन का लक्षण—
‘न शोषयति यद्वाणं समाबोदीरयत्यपि।
समीकरोतिविषमान् तत् संशमनमुच्यते ॥’
आग्नेयमेव यद्द्रव्यं तेन पित्तमुदीर्यते।
वसुधाजलजाताभ्यां बलासः परिवर्धते ॥ ९ ॥
कहा भी है—
पुरुषों में वायु—पृथिवी, अग्नि और वायु के द्रव्यों से, पित्त—पृथिवी, वायु और जलीय द्रव्यों से, कफ—आकाश, अग्नि और वायवीय द्रव्यों से वायु शान्त होते हैं। आकाश एवं वायवीय द्रव्यों से वायु, आग्नेय द्रव्यों से पित्त, पृथिवी एवं जलीय से कफ बढ़ता है ॥ ७-९ ॥
एवमेतद्गुणाधिक्यं द्रव्ये द्रव्ये विनिश्चितम्।
द्विशो वा बहुशो वापि ज्ञात्वा दोषेषु चाचरेत् ॥ १० ॥
इस प्रकार गुणों की प्रधानता प्रत्येक द्रव्यों में निश्चित है। इस प्रधानता को देखकर; (एक दोष की), दो दोषों अथवा बहुत दोषों की अधिकता में (चिकित्सा में) उन तत्वों का उपयोग करना चाहिये ॥ १० ॥
तत्र य इमे गुणा वीर्यसंज्ञकाः शीतोष्णस्तिग्धरूपः मृदुतीक्ष्णपिच्छलविशदस्तेषां तीक्ष्णोष्णावान्नेयोः शीतपिच्छलवाक्मुखगुणभूयिष्टाः, पृथिव्यन्मुखगुणभूयिष्टाः स्नेहः, तोयाकाशगुणभूयिष्टाः मृदुत्वं, वायुगुणभूयिष्टाः रौद्र्यं, क्षिप्तसमरगुणभूयिष्टाः वैशर्यं; विपाकावुक्तगुणौ। तत्र, उष्णस्तिग्धो वातघ्नो, शीतमृदुपिच्छलाः पित्तघ्नाः, तीक्ष्णरूक्षविशदाः श्लेष्मघ्नाः, गुरुपाको वातपित्तघ्नाः, लघुपाकः श्लेष्मघ्नः। तेषां मृदुशीताष्णाः स्पशोप्राहाः, पिच्छलविशदौ चतुःस्पशोभ्या, स्तिग्धरूक्षौ चतुष्पा, तीक्ष्णो मुखे दुःखोत्पादनात्। गुरुपाकः मृदुविष्मृन्नतया कफोत्कलेशनं च, लघुबद्धविष्मृन्नतया मारुतकापनं च। तत्र तुल्यगुणेषु भूतेषु रसवैशज्यमुपलक्षयत्, तद्यथा—मधुरो गुरुश्च पाथवः, मधुरः स्तिग्धश्चाप्य इति ॥ ११ ॥
यह जो वीर्य संज्ञक गुण है। यथा—शीत, उष्ण, स्तिग्ध, रूक्ष, मृदु, तीक्ष्ण, पिच्छल और विशद। इनमें तीक्ष्ण और उष्ण गुण आग्नेय हैं, शीत और पिच्छल, जलगुण—बहुत होते हैं; स्नेह में प्राथवों एवं जलाय गुण की अधिकता रहता है, रूक्ष में वायवीय गुणों की अधिकता, वैशर्य में प्राथवी, वायु के गुण की अधिकता रहती है। गुरु एवं लघु विपाक (मधुर एवं कटु विपाक) के गुण पहले कह चुक हैं। इनमें—उष्ण एवं स्तिग्ध वातनाशक, शीत, मृदु और पिच्छल पित्तनाशक, तीक्ष्ण, रूक्ष और विशद गुण श्लेष्मानाशक हैं। गुरु (मधुर) विपाक वातपित्तनाशक, लघु (कटु) कफनाशक हैं। इनमें से मृदु-शीत और उष्णगुण स्पशोन्द्रिय-प्राहा हैं। पिच्छल एवं विशद गुण आँख और स्पशोन्द्रिय द्वारा, स्तिग्ध और रूक्ष आँख द्वारा, तीक्ष्ण गुण-मुख में दुःख उत्पन्न होने से, गुरुपाक (मधुरविपाक) मल—मूत्र की प्रवृत्ति से एवं कफ से जनित वमनेच्छा होने से; लघुपाक (कटुविपाक)—मल मूत्र के अवरोध