सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंॐ ४१ ]
सूत्रस्थानम्
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से ( विबन्ध होने से ) और वायु के प्रकोप द्वारा जाना जाता है । इस प्रकार से—पञ्चमहामृतों के समान गुणवाले द्रव्यों में—रस की विलक्षणता को जानना चाहिये । यथा—पायिष द्रव्य-मधुर एवं गुरु, जलीयद्रव्य मधुर एवं स्निग्ध होते हैं ॥ ११ ॥
भवति चात्र—
गुणा य उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते यथा ।
स्थानद्विद्विषयास्तस्मादेहिनां द्रव्यहेतुकाः ॥१२॥
कहा भी है—
द्रव्यों में जो ये बीस ( या इनसे अधिक ) गुण कहे हैं, ये गुण इसी प्रकार से शरीरों ( प्राणियों के देहों ) में भी हैं । इसलिये प्राणियों के शरीर में दोष, घातु, मल का अपने स्थान में रहना इनका बढ़ना अथवा इनका क्षीण होना, द्रव्यों के कारण से ही होता है ॥ १२ ॥
इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यविशेषविज्ञानीयो
नामैकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४१ ॥
—:—
द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो रसविशेषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
इसके आगे 'रसविशेषविज्ञान' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १,२ ॥
आकाशपवनदहनतोयभूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिदृष्टाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तस्मादाभ्यां रसः । परस्परसंसागतिं परस्परानुग्रहात् परस्परानुप्रवेशाच्च सर्वेषु सर्वेषां सान्निध्यमस्ति, उत्कर्षापकर्षात्तु ग्रहणम् । स खल्वान्यो रसः शेषभूतसंसर्गाद्विदग्धः षोढा विभज्यते; तथाथा—मधुरोऽम्लो लवणः कटुकस्तित्तकः कषाय इति । ते च भयः परस्परसंसर्गात्त्रिषष्टिधा भिद्यन्ते । तत्र, भूम्यन्मुगुणबाहुल्यादम्लः, तोयान्गुणबाहुल्यात्लवणः, वायवगुणबाहुल्यात् कटुकः वायवाकागुणबाहुल्यात्तित्तकः, पृथिव्यन्तिलगुणबाहुल्यात् कषाय इति ॥ ३ ॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि, इनमें क्रमशः एक-एक गुण की उत्तरोत्तर वृद्धि से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये गुण होते हैं । यथा—आकाश में केवल शब्द, वायु में—शब्द और स्पर्श, अग्नि में—शब्द, स्पर्श और रूप, जल में—शब्द, स्पर्श, रूप और रस, पृथिवी में—शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध हैं, ( परस्पर एक दूसरे में प्रविष्ट हुए हैं ) । इसलिये—रस जल से उत्पन्न होता है । इन सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध है । क्योंकि—एक दूसरों में मिले हैं, एक दूसरों का उपकार करते हैं, एक दूसरों में प्रविष्ट हुए हैं । इसलिये सब
मृतों के गुण मिलते हैं, परन्तु उत्कर्ष ( वृद्धि ) एवं अपकर्ष ( ह्रास ) द्वारा इनका ग्रहण होता है, ( वायु में स्पर्श अधिक है, आकाश में शब्द गुण अधिक है । ) यह जलीय रस अन्य मृतों के संसर्ग के कारण परिपक्व होकर छे प्रकार का हो जाता है । यथा—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तित्तक और कषाय । और ये रस परस्पर—एक दूसरे में मिलकर तिरसठ ( ६३ ) प्रकार के हो जाते हैं । इनमें—मधुर-रस-पृथ्वी और जल गुण की अधिकता से अम्लरस-पृथ्वी और अग्नि गुण की अधिकता से, लवण रस-जल और अग्नि गुण की अधिकता से, कटुरस-वायु और अग्नि की अधिकता से, तित्तक-वायु और आकाश गुण की अधिकता से, कषाय-पृथिवी, वायु की अधिकता से उत्पन्न होता है ॥ ३ ॥
तत्र मधुराम्ललवणा वातदन्ताः, मधुरतित्तकषायाः पित्तदन्ताः, कटुतित्तकषायाः श्लेष्मदन्ताः ॥ ४ ॥
इनमें मधुर-अम्ल और लवण वायु का, मधुर, तित्तक, और कषाय पित्त का; कटु तित्तक और कषाय कफ का नाश करते हैं ॥
तत्र, वायोरारत्नैवात्मा पित्तमाग्नेयं श्लेष्मा सौम्य इति ॥ ५ ॥
इनमें वायु-वायु से ही उत्पन्न होता है, पित्त-अग्नि, से, और कफ-सोम ( जल ) से उत्पन्न होता है ॥ ५ ॥
त एते रसाः स्वयोनिवर्धना अन्ययोनिप्रशमनाश्च ॥ इनमें जो रस जिस कारण ( दोष ) से उत्पन्न होते हैं, वे उसको बढ़ाते हैं ( अपनी योनि को बढ़ाते हैं ) । और दूसरों को शान्त करते हैं ॥ ६ ॥
केचिदाहुः—अग्नीषोमीयत्वाज्जगतो रसा द्विविधाः सौम्या आग्नेयाश्च । मधुरतित्तकषायाः सौम्याः, कटुवम्ललवणा आग्नेयाः । तत्र मधुराम्ललवणाः—स्निग्धा गुरुवश्च, कटुतित्तकषाया रुक्षा लघवश्च, सौम्याः शीताः, आग्नेया उष्णाः ॥ ७ ॥
कई आचार्यों का कहना है कि—रस दो ही प्रकार के हैं, क्योंकि ( स्थावर जङ्गमात्मक ) जगत, आग्नेय और सौम्य इन दो तत्त्वों से उत्पन्न होता है, इसलिये रस भी दो ही हैं । यथा—सौम्य और आग्नेय ( स्निग्ध, गुरु, लघु, शीत, रुक्ष, उष्ण ) इनका समावेश इन्हीं दोनों में हो जाता है । इनमें—मधुर, तित्तक और कषाय सौम्य कटु अम्ल, लवण, आग्नेय, मधुर, अम्ल, लवण स्निग्ध और गुरु हैं, कटु, तित्तक कषाय रुक्ष और लघु हैं । सौम्य रस शीतवीर्य और आग्नेय रस उष्णवीर्य हैं ॥ ७ ॥
तत्र शैत्यरौद्व्यलाघववैद्यवैद्यैष्टम्यगुणलक्षणो वायुः, तस्य समानयोनः कषायो रसः सोऽस्य शैत्याच्छैत्यं वर्धयति, रौद्व्याद्रौद्व्यं लाघवालाघवं, वैश्याद् वैशर्यं, वैष्टम्यात् वैष्टम्यमिति ॥ (१) ॥