सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४२ ]
इनमें वायु-शीतल, रूक्ष, लघु, विशद, विष्टम्भी गुणोंवाला है। इस वायु के समान योनि ( उत्पत्तिस्थान ) वाला कषाय रस है। यह कषाय रस शीतल होने से वायु के शीत गुण को बढ़ाता है, अपनी रूक्षता से रूक्ष गुण को, अपनी लघुता से लघु गुण को, विशदता से विशदता को, विष्टम्भी होने से विष्टम्भी गुण को बढ़ाता है ॥ १ ॥
औषध्यतैश्चण्यलाघववैशद्यगुणलक्षणं पित्तं, तस्य समानयोनिः कटुको रसः सोऽस्य औषण्यादौषण्यं वर्धयति, तैश्चण्यतैश्चण्यं, रौद्याद्गौरव्यं, लाघवालाघवं वैशद्याद्देश्यमिति ॥ (२) ॥
पित्त—उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष, लघु, विशद गुणवाला है। इस पित्त के समान योनिवाला 'कटु' रस है। यह रस अपनी उष्णता से उष्ण गुण को, तीक्ष्णता से तीक्ष्ण गुण को, रूक्षता से रूक्ष गुण को, लघुता से लघु गुण को, विशदता से विशद गुण को बढ़ाता है ॥ २ ॥
माधुर्यस्नेहगौरवशैत्यपैच्छिल्यगुणलक्षणः रूलेष्मणः, तस्य समानयोनिर्मधुरो रसः सोऽस्य माधुर्यान्माधुर्यं वर्धयति, स्नेहात् स्नेहं, गौरवाद् गौरव्यं, शैत्याच्छैत्यं, पैच्छिल्यात् पैच्छिल्यमिति ॥ (३) ॥
कफ—मधुर, स्नेह, गुरु, शीतल, पिच्छिल गुणवाला है। इस कफ के समान योनिवाला रस 'मधुर' रस है। यह रस अपनी मधुरता से कफ के मधुर गुण को, स्नेह से स्नेह को गौरव से गुरुता को शीतलता से शीत को और पिच्छिलता से पिच्छिल गुण को बढ़ाता है ॥ ३ ॥
तस्य पुनरन्ययोनिः कटुको रसः, स रूलेष्मणः प्रत्यनीकत्वात् कटुकत्वान्माधुर्यमभिभवति, रौद्यात् स्नेहं, लाघवाद् गौरवम्, औषण्याच्छैत्यं वैशद्यात् पैच्छिल्यमिति। तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तं भवति ॥३॥
अन्य योनि ( विरोधी गुण ) वाला कटु रस है और वह इस कफ के विरुद्ध गुणोंवाला है। इसलिये—कटुरस होने से मधुरता का तिरस्कार करता है। अपने रूक्ष गुण के कारण स्नेह का; लघुता से गौरव गुण का; उष्णता से शीत गुण का; विशदता से पिच्छिलता का नाश करता है। यह तो केवल उदाहरण मात्र है। इसी प्रकार पित्त की योनि के विपरीत मधुर रस पित्त का शमन करता है। "रसदोषसन्निपाते तु ये रसा येदोषैः समानगुणाः समानगुणभूमिष्व वा भवन्ति" ते तान्निवर्धयन्ति विपरीतगुणा विपरीतगुणभूमिष्व वा शमयन्ति अन्यस्यमानाः। एतद् हि व्यवस्थाहेतोः षट्वत्समुपदिश्यते रसानां त्रित्वं च दोषाणाम् ॥ चरक ॥ ८ ॥
रसलक्षणमत ऊर्ध्वं वद्यामः—तत्र, यः परितोषमुत्पादयति। तर्पयति जीवयति मुखोपलेपं जनयति रूलेष्मणं चाभिवर्धयति स मधुरः, यो दन्तहर्षमुत्पादयति मुखान्
घ्राणं जनयति श्रद्धां चोत्पादयति सोम्लः, यो भक्तुरुचिमुत्पादयति कफप्रसेकं जनयति मार्दवं चापादयति स लवणः, यो जिह्वाग्रं बाधते उद्वेगं जनयति शिरो गुह्यते नासिकां च स्नाययति मुखवैशद्यं जनयति भक्तुरुचि चापादयति हर्षं च स तिक्तः, यो वक्रं परिशोषयति जिह्वां स्तम्भयति कण्ठं बध्नाति हृदयं कर्षति पीडयति च स कषाय इति ॥ ६ ॥
इसके आगे रस के लक्षणों को कहते हैं—इनमें जो रस परितोष ( तुष्टि ) को उत्पन्न करता है, मुख उत्पन्न करता है, तृप्ति करता है, प्राणों को धारण करता है, मुख को मल से लित करता है और कफ को बढ़ाता है, वह मधुर रस है। जो रस दांतों में हर्ष ( कुण्ठता ) उत्पन्न करता है, मुख से लाला का स्नाय उत्पन्न करता है, भोजन में श्रद्धा को उत्पन्न करता है, वह अम्ल रस है और जो भोजन में रुचि उत्पन्न करता है, कफ का प्रसेक तथा मृदुता का आपादक है वह लवण रस है। जो रस जीभ के अगले भाग को पीडित करता है, नासिका से स्नाय बहाता है, वह कटु रस है। जो रस गले में खिचाव ( चूसने की तरह पीड़ा ) उत्पन्न करता है, वह तिक्त रस है। जो रस मुख को शुष्क कर देता है, जिह्वा को जड़ बना देता है, गले को रोक देता है, हृदय ( आमाशय ) को खींचता है और पीडित करता है, वह कषाय रस है ॥ ६ ॥
रसगुणान्त ऊर्ध्वं वद्यामः—तत्र, मधुरो रसो रस-रक्तमांसमेदोऽस्थिमज्जजौजःशुक्रस्तन्यवर्धनश्रद्धाध्वः केश्यो वण्यो बलकृत्सनध्यानः शोणितरसप्रसादनो बालवृद्धक्षतक्षोणहितः षट्पदपिपौलिकातामिष्टतमस्तृष्णामूर्च्छादाहश्रमनः षडिन्द्रियप्रसादनः क्रमिकफकरश्चेति; स एवं गुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेग्यमानः कासश्चासालसकवमशुश्रुद-नमाधुर्यस्वरोपघातक्रमिगलगण्डानापादयति तथाऽशुश्रुद-श्लीपदवस्तिगुदोपलेपाभिष्यन्दप्रभृतीजनयति ॥ (१) ॥
इसके आगे रस के गुणों को कहते हैं—इनमें—
मधुर रस-रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, ओज, शुक्र स्तन्य ( दूध स्त्रियों में ) को बढ़ानेवाला, आँखों वालों तथा शरीर के वर्ण के लिये—हितकारी है, बलकारक, जोड़नेवाला, रक्त-रस को स्वच्छ करनेवाला, बालक वृद्ध और क्षतक्षोण रोगों के लिये हितकारी, भौरे और चिज्जिटियों के लिये प्रियतर, तृष्णा मूर्च्छा-बाह को शान्त करनेवाला, मन समेत पाँवों जानेन्द्रियों को प्रसन्न करने वाला और क्रमियों तथा कफ को उत्पन्न करता है। यह मधुर रस उपयुक्त गुणोंवाला होने पर भी अकेला ही अधिक मात्रा में सेवन करने से—कास, श्वास, अलसक, वमन; मुख की मधुरता, स्वरमञ्ज, क्रमि, गलगण्ड रोगों को एवं अशुश्रुद, श्लीपद, वस्ती-गुदा में उपलेप ( चिप-चिपापन ) अभिष्यन्द ( नेत्र दुखना ) आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥ १ ॥