सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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अम्लो जरणः पाचनो दीपनः पवननिग्रहणोऽनुलोमनः कोष्ठविदाही बहिःशीतः क्लेदनः प्रायशो हृद्यश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो दन्तहर्षनयन-संसीलनरोमसंवेजनकफविलयनशरीरशैथिल्यान्यापादयति तथा क्षताभिहतदग्धदृष्टभग्नरुग्णशून्यप्रच्युतावमूत्रितवि-सर्पितच्छिन्नविद्रोत्पिष्टादीनि पाचयत्याग्नेयस्वभावात् परिदहति कण्ठसुरो हृदयं चेति ॥(२)॥
अम्ल रस—आहार का पाचन करनेवाला; दोष एवं आम का पाचक, अग्निदीपक, वायु को शान्त करनेवाला, वायु-मलमूत्र का अनुलोमक, कोष्ठ में विदाह करनेवाला, बाह्य उप-चार में शीतल; क्लेदक और प्रायः हृदय के लिये हित होता है। इन गुणोंवाला होने पर भी अकेला अम्लरस ही अधिक मात्रा में सेवन करने से—दौर्ता में जड़ता, आँखों का संकोच, रोमहर्ष, कफ का विलयन ( पतलापन ) और शरीर की शिथिलता को उत्पन्न करता है। क्षत-अभिहत (चोट युक्त), दग्ध (जला हुआ), दृष्ट (डसा हुआ), भग्न, शून्य, रुग्ण, प्रच्युत (स्वलिप्त), अवमूत्रित (मूत्र विष से दूषित को), विसर्प, छिन्न-भिन्न विद्र-उत्पिष्ट आदि व्रणों को—आग्नेय स्वभाव होने से पका देता है, गला छाती और हृदय को जलाता है ॥(२)॥
लवणः संशोधनः पाचनो विश्लेषणः शैथिल्यकृदुग्गः सर्वरसप्रत्यनीको मार्गविशोधनः सर्वशरीरावयवमार्दवकरश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेव्यमानो गात्रकण्ठकोटशोफवैवर्ण्यपुंस्त्वोपघातेन्द्रियोपतापमुखाक्षिपाकर-कपित्तावातशोणिताम्लिकाप्रभृतीनापादयति ॥(३)॥
लवणरस—वमन-विरेचन द्वारा संशोधक, अन्न का पाचक, रस एवं मल का विश्लेषक, आहार का क्लेदक तथा शिथिल-ताकारक, उष्ण, सब रसों से विपरीत, विशेषक शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है। इन गुणोंवाला होने पर भी अकेला लवणरस ही अधिक मात्रा में सेवन करने से—शरीर में कण्ठ, कोठ, शोफ, विवर्णता, शुक्लक्षय, इन्द्रियों—नेत्रादि का उपताप (अपने कर्मों की हानि अर्थात् शक्तिनाश), मुख-आँख का पाक; रक्तपित्त, वातरक्त, अम्लिका ( अम्लोद्गार ) को उत्पन्न करता है ॥(३)॥
कटुको दीपनः पाचनो रोचनः शोधनः स्थौल्यालस्य-कफकृमिविषकुष्ठकण्ठप्रशमनः सन्धिबन्धविच्छेदोऽवसा-दनः स्तन्यशुक्लमेदसासुपहन्ता चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो भ्रममदगलताल्लेष्ठशोषदाहसंता-पवलविघातकम्पतोदभेदकृत् करचरणपारश्वग्रभतिषु च वातशूलानापादयति ॥(४)॥
कटुरस—अग्निदीपक, आहार का पाचक, रोचक, शोधक, स्थूलता आलस्य कफ-कृमि-विष कुष्ठ-कण्ठ को शान्त करनेवाला, सन्धिबन्धों का विच्छेदक, अनुत्साह उत्पन्न करनेवाला, दूध-
शुक्ल एवं मेद को नष्ट करनेवाला है। इन गुणोंवाला होने पर भी अकेला कटुरस अधिक मात्रा में सेवन करने से—भ्रम, मद, गला तालु-ओठ की शुष्कता; गात्रसंताप बल का ह्रास कम्प-तोद भेद उत्पन्न करता है, हाथ-पाँख पार्श्व-पीठ आदि अव-यवों में वातजन्य शूलों को उत्पन्न करता है ॥(४)॥
तिक्तच्छेदो रोचनो दीपनः शोधनः कण्ठकोठतृष्णा-मूर्च्छाश्वरप्रशमनः संतन्यशोधनो विण्मूत्रक्लेदमेदोवसा-पूयोपशोषणश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्य-मानो गात्रमन्यास्तम्भाक्षेपकादितिशिरःशूलभ्रमतोदभेदच्छे-दास्यवैरस्यान्यापादयति ॥(५)॥
तिक्तरस—( कफ का ) छेदक, रोचक ( स्वयं रुचिकर न होकर भी दूसरों में रुचि उत्पन्न करनेवाला), कण्ठ कोठ-प्यास-मूर्च्छा-श्वर को शान्त करनेवाला, दूध का शोधक, मल-मूत्र-आर्द्रता-मेद-वसा-पूय को सुखानेवाला भी यह रस अकेला अधिक मात्रा में सेवन करने से—शरीर-मन्या (श्रीवा की दो शिरायें) का स्तम्भ, आक्षेप, आर्द्रित, शिरःशूल, भ्रम, तोद, मेद, छेद (विचित्र प्रकार की पीड़ा), मुख की विरसता को उत्पन्न करता है ॥(५)॥
कषायः संग्राहको रोपणः स्तम्भनः शोधनो लेखनः शोषणः पीडनः क्लेदोपशोषणश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो हृत्पीडास्यशोषोदराभमानवाक्यग्र-हमन्यास्तम्भागात्रस्फुरणचुमुचुमायनाकुञ्चनाक्षेपणप्रभृती -ञ्जनयति ॥१०॥
कषायरस—संग्राही, व्रणरोपक, स्तम्भक, व्रणशोधक, लेखक, शोधक, पीडक, क्लेद (आर्द्रता) को सुखानेवाला है। यही रस इन गुणों के होने पर भी अकेला अधिक मात्रा में सेवन करने पर—हृदय की पीड़ा, मुख की शुष्कता, उदर में आभमान, वाक्यग्रह (वाणी की जड़ता), मन्यास्तम्भ गात्रों में स्फुरण, चुमुचुमायन (राई के लेप की भाँति), आकुञ्चन, आक्षेप आदि उत्पन्न करता है। (वायु के विकार उत्पन्न करता है) ॥१०॥
अतः सर्वेषामेव द्रव्यण्युपदेद्यमः। तद्यथा—काको-ल्यादिः क्षीरघृतवसासज्जगालिपुष्पिकयवगोधूममाषश्चूला-दककसेरुकत्रपुसैर्वारुकर्कराकालाबूकालिन्दकतकगिलोड्य-प्रियालपुष्करबीजकाश्मर्यमधुकद्राक्षासर्जूरराजान्दन्ताल -नालिकैरेवुविकारबलातिबलात्मगुमाविदारोपयस्यागोक्षुर-कक्षीरमोरटमधूलिकाकृष्माण्डप्रभृतीनि समासेन मधुरो वर्गः। दाडिमामलकमातुलुङ्गाश्रातककपित्थकरमर्दवदरको-लप्राचीनामलकतिन्तिडीककोशाग्रकभण्यपारावतवेत्रफल्ल-कुचाम्लवेतसदनतशठदधितकसुराशुक्तसौवीरकतुषोदकधा-न्याम्लप्रभृतीनि समासेनाम्लो वर्गः। सैन्धवसौवर्चलवि-डपाक्यरोमकसासुद्रकपित्रमयवक्षारोपरप्रसृतमुवत्रिका-