सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 200, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ें१५२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४१ ]
प्रभूतीनि समासेन लवणो वर्गः । पिप्पल्यादिः सुरसादिः शिघ्रमघुशिघ्रमूलकलजन्मुखशीतजिवकृष्टदेवदारुहरेण - कावलजुजफलचण्डागुग्गलुमुस्तलाङ्गलकीशुकनासापीलुप्रभू- तीनि सालसारादिश्च प्रायजः कटुको वर्गः, अररवधादि- गर्दूच्यादिर्मण्डकपर्णीवैत्रकरीरहरिद्राद्वेन्द्रयवचरणस्वा- दुकण्टकसमप्रणबृहतीद्वयशङ्खिनीद्वयन्तीत्रिवृक्तवैधनककों- टककारवेल्लवार्ताकुकीरकरवीरसुमनःशङ्खपुष्पपामार्गज्रा- यमाणशोकरोहिणीवैजयन्तीसुवर्चलापुनर्नवावृश्चिकाली - ज्योतिष्मतीप्रभूतीनि समासेन तित्तो वर्गः । न्यग्रोधादिर- म्बष्ठादिः प्रियङ्गुवादी रोधादिच्छिफलाशल्लकीजम्बाश्र- बकुलतिन्दुकफलानि कतकजाकफलपाषाणभेदकवनस्पति- फलानि सालसारादिश्च प्रायजः कुरुवककोविदारकजीव- न्तीचिल्लीपालङ्क्यासुनिषणकप्रभूतीनि वरकादयो सुद्- गादयश्च समासेन कषायो वर्गः ॥११॥
इसके आगे सम्पूर्ण रसों के द्रव्यों को कहते हैं । यथा—
मधुरवर्ग—काकोल्यादिगण, दूध, घी, वसा, मज्जा, शालि, शाठी, जी, गेहूँ, सिंघाड़ा, कसेव, खीरा, ककड़ी, कर्करक (खरबूजा), अलाबु (तुम्बी), कालिन्द (तरबूज), कतक (निर्मली) का बीज, पियाल, पुष्करबीज (कमलगट्टा), काश्मरी (गम्भारी), मधूक (महुवा), मुनका, खजूर, राजादन (खिरनी), ताड़, नारियल, गन्ना और गन्ने के रस से बनी बस्तुयें, खरेंटी, अति- बला. कौंच के बीज, बिदारीकन्द, पयस्या (विदारीभेद), गोखरू, खीरमोरट (तुरन्त प्रसूता गाय का सात दिन तक अशुद्ध दूध अर्थात् खीस अथवा इन्तुमूल), मधुलिका (मूर्वा), कृष्माण्ड (पेठा) आदि संक्षेप में मधुरवर्ग है ।
अम्लवर्ग—अनार, आँवला, बिजौरा, आम्रतक (आमड़ा), कैय, करौंदा, वृक्ष का बेर, झाड़ी का बेर, प्राचीन आमलक (सूखा आँवला), तित्तिडीक (हमली), कोशाम्र (आम का भेद), भय्य (कमरख), पारावत (कामरूप में मधुर-अम्लरस फल), (वैत्रफल वेत का फल), लकुच (बड़हल), अम्लवेतस, दन्तशठ (निम्बु), दही, छाछ, सुरा, शुक्त, सीवीरक (काजी), तुषोदक- धान्याम्ल आदि—संक्षेप में अम्लवर्ग है ।
लवणवर्ग—सेन्धव, सोवर्चल, विड़, पाक्य (उद्भिद), रोमक (साम्भर), सामुद्रक (समुद्रजल से निष्पन्न) पक्त्रम (पाक द्वारा बनाया), यवक्षार, ऊषरप्रसूत (ऊषरलवण), सुव- चिका (सज्जीक्षार) आदि संक्षेप में लवणवर्ग है । (आदि शब्द से टक्कणक्षार तथा अन्य खारों का ग्रहण होता है) ।
कटुरस—पिप्पल्यादि, सुरसादिगण; सहजन, लालफूल का मीठा सहजन, मूली, लहसुन, सुमुख (तुलसीभेद), शीतशिव (कूर्म), कूठ, देवदारु, हरेणुका (मेथी), अवलुजाबीज, (बावची बीज) चण्डा (अजवायन के आकार का सुगन्धित द्रव्य या शङ्खपुष्पी
का भेद), गुग्गुल, नागरमोथा, लींगली (कलिहारी), शुकनासा (श्यानक), पीलु आदि, द्रव्य एवं सालसारादिगण ( प्रायः करके) कटुवर्ग है ।
तित्तकवर्ग—आरवध आदिगण, उड्डची आदिगण, मण्ड- कपर्णी, वैत्रकरीर (वैत्रांकुर), हल्दी, दासहल्दी, इन्द्रजी, वरण (वरना), स्वादुकण्टक (विकङ्कृत), सप्तर्ण (सतवन) बृहतीद्वय (छोटी-बड़ी कटेरी), शङ्खिनी (यवतिका का भेद) द्रवन्ती, त्रिवृत् (निशोथ), कृतवेधन (तुरई), ककोंटक (ककोंडा), कार- वेल्ल (करेला), वार्ताक (बैंगन), करीर, करवीर (कनेर), सुमन (जाती चमेली), शङ्खपुष्प, अपामार्ग, त्रायमाण, अशोक, रोहिणी (कटुकी), वैजयन्ती, (तर्कारी), सुवर्चला (डुल्लुलु), पुनर्नवा, वृश्चिकालि (बिच्छूटी), ज्योतिष्मती (मालकङ्कनी) आदि द्रव्य संक्षेप में तित्तकवर्ग है ।
कषायवर्ग—न्यग्रोधादि, अम्बष्ठादि, प्रियङ्गुवादि, रोधादि, त्रिफला, शल्लकी (गजभक्ष्या), जामुन, आम, मौलसरी, तिन्दुक—इन सब वृक्षों के फल, कतक (निर्मली), शाक (सहगुन), पाषाणभेद, वनस्पतियों के फल, सालसारादिगण, प्रायः कुरुवक (लालझिण्टो-कण्टसेलायक), कोविदार (कच- नार), जीवन्ती, चिल्ली (बथुवा), पालंक्या (पालक), सुनि- षणक (सूणी) आदि, नीवारक आदि कुधान्य, मूळ आदि वैदलिक (दाले)—संक्षेप में कषायवर्ग है ॥१२॥
तत्रैतेषां रसानां संयोगाच्छिषष्टिभवन्ति । तथाथा— पञ्चदश द्विकाः, विशतिच्छिकाः, पञ्चदश चतुष्काः, षट् प्रयोजनानि वक्ष्यामः ॥१३॥
इन छे रसों के परस्पर संयोग से तिरसठ (६३) भेद बन जाते हैं । यथा—दो रसों की प्रधानता से १५, तीन रसों से २०, चार रसों से १५, पाँच रसों से ६, छे रसों से एक, और एक-एक रस से छे रस । इन ६३ रसों का प्रयोजन अन्यत्र कहेंगे१ । (उत्तरतन्त्र ६३ अध्याय में इस विषय का वर्णन दिया जायगा) ॥१३॥
भवति चात्र—
जग्धाः षडधिगच्छन्ति बलिनो वश्यतां रसाः । यथा प्रकृपिता दोषा वशं यान्ति बलीयसः ॥१३॥
कहा भी है—
मधुर आदि छः ही रस खा लेने पर बलवान् (छः में जो अधिक हो) रस के 'वस—अधीन (तदनुसार कार्य करनेवाले) हो जाते हैं, जैसे प्रकृपित दोष (बलवान्
१ दोषों के परस्पर संयोग से ६३ भेद होते हैं, रसों के ये ६३ भेद भी इन भेदों के अनुसार दोषों को शान्त करते हैं। स्वस्थ अवस्था में—मिलित छे रस ही स्वास्थ्यवर्धक—उपयोगी हैं। विस्तार के लिये तथा स्पष्टीकरण के लिये, चरक में रसों का प्रकरण "यज्जपुरुषीय अध्याय" में देखिये ।
चरक सूत्र अ० २६ ।