सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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वांतादि दोष) वलीयान् (अधिक बलवान् = अधिक कुपित) दोष के अधीन हो जाते हैं। तात्पर्य या सचाई यह है कि संसार का कोई भी द्रव्य-(प्राकृतिक पदार्थ हरीतकी आदि) एक रस-केवल एक रसवाला नहीं है और न ज्वर आदि रोग एक दोषज-केवल बात आदि किसी भी एक (अकेले) दोष से उत्पन्न होता है, यथा-'द्रव्यमेकरसं नास्ति न रोगोऽप्येकदोषजः, संसृष्टरसभूषिष्टत्वात् द्रव्याणाम्' (च० वि० अ० ८ सू० १४२)। 'तत्र खलु अनेकरसेषु द्रव्येषु अनेकदोषात्मकेषु च। विकारेषु (रोगेषु)' (चरक वि० अ० १ सू० ६)। "तस्मान्नैकरसं द्रव्यं भूतसंघातमभवत्। नैकदोषास्ततो रोगाः तत्र व्यक्तो रसः स्मृतः॥ अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चित्-अन्ते व्यक्तोऽपि ज्ञेयते" (अनुरसः)। (अ० ८ सू० अ० ६) तथापि—द्रव्यों को मधुर अम्ल कहा ही जाता है और वातज्वर, पितात्सार, कफकास आदि नामकरण किये ही जाते हैं। यह सब इसलिये कि-रस प्रधान या व्यक्त रस के और दोष प्रधान या बलवान् दोष के अधीन हो जाते हैं। बों समझिये कि—यदि मधुर रस का अधिक सेवन होता है तो अन्य रस अपना गुण दोष नहीं उत्पन्न कर पाते। एवमेव अन्य रसों के विषय में भी समझ लें। अलमति विस्तरेण ॥१३॥
इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने रसविशेषविज्ञानीयो नाम द्वित्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४२॥
त्रित्वारिशत्तमोऽध्यायः
अथातो वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानिनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे 'वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
वमनद्रव्याणां फलादीनां मदनफलानि श्रेष्ठतमानि भवन्ति। अथ मदनपुष्पाणामातपपरिशुष्काणां चूर्णप्रकृच्छं प्रत्यकपुष्पीसदापुष्पीनिम्बकषायानामन्यतमेनालोड्यमधु-सैन्धवयुक्तां पुष्पचूर्णमात्रां पाययित्वा वामयेत् मदनश-छादुचूर्णान्येवं वा बकुलरम्यकोपयुक्तानि मधुलवणयुक्ता-न्यभिपतमानि, मदनशछादुचूर्णसिद्धां वा तिलतण्डुल्य-वागूम्। निर्वृत्तानां वा नातिहरितपाण्डुनां कुगगृढावव-द्वमृदोमयप्रल्लिप्तानां यववृ (तु) षमुद्रमाषगाल्यादिधान्यरा-ग्रावष्टरात्रोषितकिन्नभिन्नानां फलानां फलपिपळीरूदधु-त्यातपे शोषयेत्, तासां दधिमधुपल्लविसृदितपरिशु-ष्काणां सुभाजनस्थानान्मन्तर्नखमुष्टिमुष्णे यष्टिमधुककषाये कोविदारादीनामन्यतमे वा कषाये प्रमूद्य रात्रिपर्युषितं मधुसैन्धवयुक्तमाशीर्भिरभिमन्त्रितमुदङ्मुखः प्राङ्मुखमा-तुरं पाययेद्देनं मन्त्रेणाभिमन्त्र्य—
"ब्रह्मदक्षाभिस्त्रेन्द्रभूचन्द्रार्कान्तठानिलाः। ऋषयः सोषधिप्रामा भूतसंवाश्च पान्तु ते ॥१॥ रमायनमिवर्षाणां देवानाममृतं यथा। सुषेवोत्तमतागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ॥२॥"
विशेषेण श्लेषमज्वरप्रतिशयान्तविद्रधिषु, अप्रवर्त-माने वा दोषे पिपळीवचागौरसर्षपकलकोनिमश्रैः सलवणे-रुष्णाभ्युधिः पुनः पुनः प्रवर्त्तयेदासभ्यग्वान्तलक्षणान्नि। सदनफलमज्जचूर्णं वा तत्कषाथपरिभावितां मदनफलकषा-येण, मदनफलमज्जसिद्धस्य वा पयसः सन्तानिकां श्वोद्व-युक्तां, मदनफलमज्जसिद्धं वा पयः, मदनफलमज्जसिद्धेन वा पयसा यवागूम्, अधोभागासूक्ष्पितहृद्वाहयोः, मदनफ-लमज्जसिद्धस्य वा पयसो दधिभावसुपगतस्य दध्युत्तरं दधि वा कफप्रसेकच्छदिर्मूलात्मकेषु मदनफलमज्जरसं स्नेहं वा भक्ष्यातकस्नेहवदादाय फाणितीभूतं लेहयेत्, आतपपरिशुष्कं वा तमेव जीवन्तीकषायेण, पित्ते कफ-स्थानगते, मदनफलमज्जकषाथं वा पिपल्यदादिप्रतीवापं, तच्छूर्णं वा निम्बरूपिकाकषाययोरन्यतरेण संतर्पणकफज-व्याधिहरं मदनफलमज्जचूर्णं वा मधुककार्मर्यद्राक्षाकषा-येण। मदनफलविधानमुक्तम् ॥३॥
मदनफल, कुटज, जीमूतक, इच्चाकु आदि वमनद्रव्यों में मैनफल सब से श्रेष्ठ है। मैनफल के फूलों को धूप में सुखाकर इनका चूर्ण कर लेना चाहिये। इसके चूर्ण की उपयुक्त मात्रा को प्रत्यकपुष्पी (अपामार्ग), या सदापुष्पी (आक), या नीम के कषाय में घोलकर तथा मधु और सैन्धव नमक मिलाकर (मैन-फल के चूर्ण की उपयुक्त मात्रा) पिलाकर वमन करना चाहिये। मैनफल के कच्चे फल के चूर्ण को भी इस प्रकार अथवा बकुल (मौलसरी), महानिम्ब (बकायन) के चारगुना कषाय में घोल-कर, मधु और सैन्धव-(नतुथीरा) मिलाकर; गरम करके पिलाना चाहिये। मैनफल के कच्चे फल के चूर्ण में सिद्ध की हुई तिल एवं चावलों की यवागू (लप्सी) पिलानी चाहिये। और जो मैनफल के फल बिल्कुल पक गये हों, बहुत हरे या पीले न हों, उनको कुशा से बने सम्पुटों में—बन्द करके ऊपर से मिट्टी या गोबर का लेप कर देना चाहिये। इनको अब जो, तुष, मूक, माष, शालि आदि धान्यों के ढेर के अन्दर आठ दिनों तक रखना चाहिये। जब फल नरम होकर फूट जायें, तब इनके बीजों को (फल-पिपळी) निकालकर धूप में सुखाना चाहिये। इन बीजों को दधि, शहद, पल्ल (तिल का चूर्ण), इनके साथ मलकर सुखाना चाहिये। इनको एक उत्तम पात्र में रखना चाहिये। इनमें से एक सुडी भर (नखों को अन्दर रखकर सुडी में जितने आ जायें), चूर्ण को मुलहठी के उष्ण कषाय में अथवा कोविदारादि (संशोधनसंशयनीय ग्यारह कषायों में से)