भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४३ ]

किसी एक कषाय में मिलाकर (मथकर) रात भर भिगोकर—प्रातःकाल इसमें मधु तथा सैन्यवनमक मिलाकर आशीर्वाद-परक मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके वैद्य उत्तर दिशा में अपना मुख करके, रोगी का मुख पूर्व दिशा की ओर करके औषध पिलाये। अभिमन्त्रित करने का मन्त्र (मूल में है) का अर्थ यह है।

“ब्रह्मा-दक्ष-अश्विनी-रुद्र इन्द्र-पृथ्वी-चन्द्र-सूर्य-अग्नि एवं वायु, औषधिसमूह ऋषि-लोग, भूतसमूह तेरी रक्षा करें। जिस प्रकार ऋषियों के लिये रसायन, देवताओं के लिये अमृत, नागों के लिये जिस प्रकार सुधा है, उसी प्रकार वह औषध तेरे लिये हो।”

विशेष करके उपयुक्त योग कफज्वर, जुकाम और अन्तर्विद्रधि इनमें देने चाहिये।

इन योगों से यदि दोष प्रवृत्त (बाहर) न हों, तब-पिप्पली, वज्र, श्वेत सरसों इनके कल्क को नमक-मिश्रित तुषोदक के साथ बार-बार पिलाना चाहिये। यह कार्य तबतक करते रहना चाहिये, जब तक वमन भली प्रकार से न हो, भली प्रकार से वमन होने के लक्षण स्पष्ट न हों, मैनफल की मज्जा के चूर्ण को मैनफल के क्वाथ से भावना देकर मैनफल के कषाय के साथ पिलाना चाहिये। मैनफल की मज्जा द्वारा सिद्ध दूध की मलाई को शहद में मिलाकर देना चाहिये। मैनफल की मज्जा द्वारा सिद्ध दूध देना चाहिये। मैनफल की मज्जा द्वारा सिद्ध दूध में बनी यवागू (लप्सी) को अधोगामी रक्त-पित्त में हृदय के दाह में देना चाहिये। मैनफल को मज्जा द्वारा सिद्ध दूध से दही जमाकर, दही की मलाई को अथवा दही को ही, कफखाव, वमन, मूर्च्छा, तमक (शवास) में पिलाना चाहिये। मैनफल की मज्जा के रस को अथवा स्नेह (तेल) को, मिलावे के तैल के समान निकालकर; पकाने से रात्रि की भांति होने पर चटाना चाहिये। (मिलावे के तैल की विधि ‘द्विब्रणीय’ अध्याय में कही है) जब पित्त कफ के स्थान में पहुँचा हो तो मैनफल की मज्जा के चूर्ण को धूप में सुखाकर जीवन्तीकषाय के साथ पिलाना चाहिये। मैनफल की मज्जा के क्वाथ में पिप्पल्यादिगण की औषधियों का प्रक्षेप देकर मदनफलमज्जा के चूर्ण को नीम, रूपिका (आक), इनमें से किसी एक के कषाय के साथ संतर्पण एवं ककजन्त्य रोगों में देना चाहिये। अथवा मैनफल की मज्जा के चूर्ण को सुलहटी, गाभारी, द्राक्षा के कषाय के साथ देना चाहिये। मदनफल के ये इकतीस प्रयोग कह दिये हैं ॥३॥

१ वमन में मधु का गरम बस्तुओं से निषेध नहीं। यथा—सर्वेषु तु मधु सैन्धवं कफबिलयनच्छेदायं वमनेषु विदध्यात्। न चोष्णविरोधो मधुनः छर्दनयोगयुक्तस्य, अविष्ववप्रत्यागमनात् दोष-निर्हरणाच्च ॥ चरक।

जीमूतककुसुमचूर्ण पूर्ववदेव क्षीरेण, निर्वृत्तेषु क्षीर-यवागू, रोमशेषु सन्तानिकां, अरोमशेषु दध्युत्तरं हरित-पाण्डुषु दधि, तत्कषायसंमृद्धा वा सुरां कफारोचककास-श्वासपाण्डुरोगयदमसु. पर्यागतेषु मदनफलमज्जवदुपयोगः।

जीमूतक (देवदाली) के फूलों का चूर्ण पूर्व की भांति (अपमार्ग-आक के रस में भिगोकर) या दूध के साथ पिलाना चाहिये। निर्वृत्त (जात मात्र-छोटी अवस्था के) फलों को दूध की लप्सी के साथ, रोमश (कठिनावस्था) के फलों को दूध मलाई के साथ, अरोमश (बहुत बड़े उत्तम), फलों को दही की मलाई के साथ, हरे पीले फलों को दही के साथ, जीमूतक कषाय के साथ सुरा को मिलाकर, कफ, अरोचक, कास, शवास, पाण्डुरोग, यदमा रोग में देना चाहिये। हरे-पीले जीमूतक के फूल न मिलने पर मदनफल की मज्जा के समान जीमूतकफल की मज्जा का उपयोग करना चाहिये ॥४॥

तद्वदेव कुटजफलावधानम् ॥४॥

जीमूतक की भांति कूड़े के फलों का भी उपयोग करना चाहिये ॥५॥

कृतवेधनानामप्येष एव कल्पः ॥६॥

कुटजफल की भांति कृतवेधन (कड़वी तुरई) की भी यही विधि बरतनी चाहिये ॥६॥

इत्वाकुकुसुमचूर्णं वा पूर्ववत्, एवं क्षीरेण, कास-श्वासच्छर्दिकफारोगेपूपयोगः ॥७॥

इत्वाकु (कड़वी तुम्भी) के फूलों को दूध के साथ तथा मैनफल की भांति—(कुटज और कृतवेधन की भांति नहीं), कास, शवास, छर्दि, कफ रोगों में बरतना चाहिये ॥७॥

धामार्गवस्यापि मदनफलमज्जवदुपयोगः विशेषतस्तु गरगुल्मोदरकासश्वासस्नेहसामयेषु वायौ च कफस्थानगते॥

धामार्गव (पीले फूल की कड़वी तोरी) का भी मदनफल की मज्जा के समान ही (पुष्प, शलाट, क्षीर, सुरा) उपयोग करना चाहिये। विशेषतया-गर, गुल्म, उदर, कास, शवास, कफरोगों में अथवा कफ-स्थान में वायु के पहुँचने पर प्रयोग करना चाहिये ॥

कृतवेधनफलपिप्पलीनां वमनद्रव्यकषायपरिपीतानां बहुगुञ्जूर्णमुत्पलादिषु दत्तमाघ्रातं वामयति, तत्त्वनवबद्ध

१ सुरा-विधान—जीमूत के क्वाथ में उड़द पकाना चाहिये, जीमूत के क्वाथ से ही घात्य—चावल का प्रक्षालन करना चाहिये, माष और घात्य-चावलों को कूटकर मिला देना चाहिये। इनकी सुखाकर, दूसरे घात्य-चावलों को जीमूत-क्वाथ के साथ पीसकर थोड़ा-सा गरम कर लेना चाहिये। इन सब के तीन भाग, किंश भाग चौथा, सन्धान के लिये भाङ्गीक्वाथ-इन सब को एक पात्र में रखने से सुरा बन जाती है। यह पैंष्टिक सुरा है, इसलिये इसमें व तो गुड़ पड़ता है और न मधु। कई वैद्य गुड़ डालते हैं।