भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 203, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 203

३० ४४ ]

सूत्रस्थानम्

१५५

दोषेषु यवागूमाकण्ठाप्तीतवस्तु च विदध्यात् । वमनविरेचनशिरोविरेचनद्रव्याण्येवं वा प्रधानतमानि भवन्ति ॥

कृतवेषन ( कडुवी तुरई ) के बीजों को वमनद्रव्यों के कषाय से कई बार भावना देकर उत्पल ( कुमुद, पुण्डरीक सौगन्धिक ) आदि कमलों पर फैलाकर सूँघने से वमन होता है । यह क्रिया उस समय करनी चाहिये, जब कि दोष बहुत अधिक बढे हों, उस समय गले तक ( पेट भरकर ) यवागू पिलाकर वमन कराना चाहिये । वमन, विरेचन, शिरोविरेचन आदि द्रव्य इस प्रकार से ( द्रव्य वमनादि कषायों से ) भावना देने पर अधिक वीर्यशाली हो जाते हैं । यहाँ पर कषाय की जगह ( स्वरस ) द्वारा भावना देने से अधिक गुण होता है ॥

भवतश्चात्र—

वमनद्रव्ययोगानां दिगिंयं संप्रक्रीतिता ।

तान् विभेद्य यथाव्याधि कालशक्तिविनिश्चयात् १०

कषायैः स्वरसैः कल्केक्षुण्णैरपि च बुद्धिमान् ।

पेयलेद्याद्यभोज्येषु वमनान्युपकल्पयेत् ॥ ११ ॥

कहा भी है—

वमन, द्रव्यों के योगों का निर्देश मात्र यहाँ कर दिया है । समय एवं शक्ति का विचार करके वमनद्रव्यों का विभाग करके प्रयोग करना चाहिए । कषाय ( श्रुत, शीत, फाण्ट ) से स्वरस ( यंत्रादि द्वारा पीड़ित स्वरस ) से, कल्क ( पत्थर पर पीसकर ), चूर्णों से, पेय, लेद्य, पूरी आदि वस्तुयें बनाकर वमनार्थ खाने को देनी चाहिये ॥ १०, ११ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने वमनद्रव्यविकल्पविज्ञा-

नीयो नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४३ ॥

चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

अथातो विरेचनद्रव्यविकल्पविज्ञानौन्यमध्यायं ऽध्या- ख्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे 'विरेचन-द्रव्य-विकल्प-विज्ञानौन्य' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥

अरुणाभं त्रिवृन्मूलं श्रेष्ठं मूलविरेचने ।

प्रधानं तिल्वकस्त्वन्तु फलेष्वपि हरीतकी ॥ ३ ॥

तैलेष्वेरण्डजं तैलं स्वरसे कारवेक्षिका ।

सुधापयः पयःसूक्तमिति प्राधान्यसंग्रहः ।

तेषां विधानं वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ४ ॥

मूलविरेचनों में लाल रंग की ( थोड़ी लाल ) निशोथ की जड़ श्रेष्ठ है । त्वचों में तिल्वक की छाल श्रेष्ठ है । फलविरेचनों

में हरीतकी का फल श्रेष्ठ है । तैलों में एरण्डतैल श्रेष्ठ है । स्वरसों में कारवेल्क ( करेला ) का स्वरस श्रेष्ठ है । दूधों में स्तुही का दूध उत्तम है, ये श्रेष्ठ द्रव्य हैं । इन निशोथ आदि द्रव्यों की विधि क्रमशः यथाविधि कहते हैं ॥ ३, ४ ॥

वैरेचनद्रव्यरसानुपीतं मूलं महत्त्रैवृतमस्तदोषम् ।

चूर्णाकृतं सैन्धवनागराख्यमस्तैः पिबेन्मारुतरोगजुष्टः ॥

त्रिवृत को महान् एवं कृमि आदि दोष रहित चिकनी जड़ की त्रिवृत आदि विरेचन द्रव्यों के रस से भावना देकर, इसका चूर्ण करा लेना चाहिये । इस चूर्ण में चतुर्थांश सैन्धव नमक और सोंठ मिलाकर—अनारदाना या बिजोरे निम्बू आदि खट्टे द्रवों के साथ, वायुरोग से पीड़ित मनुष्य को ( छै मासे ) पिलाना चाहिये ॥ ५ ॥

इक्षोर्विकारैर्भुंरै रसैस्तत् पैंते गदे क्षीरयुतं पिबेच्च ।

गुड्च्यरिष्टत्रिफलाख्येन सन्धोषमूत्रं कंकजे पिबेत्तत् ॥ ६ ॥

पैतिक रोग में—विरेचनार्थ—निशोत के चूर्ण को—खण्ड, गुड् आदि के पानक ( शर्बत ) अथवा दाख, मुनका आदि के मीठे रसों अथवा दूध के साथ पीना चाहिये अर्थात् चूर्ण फाँककर ऊपर से उक्त द्रव पीना चाहिये । कंकज रोग में—विरेचनार्थ—गिलोय, नीम अथवा त्रिफला के रस के साथ अथवा त्रिकुट चूर्ण मिश्रित गोमूत्र के साथ पीवे ॥ ६ ॥

त्रिवर्णकञ्च्युषण्युक्तमेतद् गुडेन लिह्यादनधेन चूर्णम् ।

प्रस्थे च तन्मूलरसस्य दत्त्वा तन्मूलकल्कं कुड्वभ्रमाणम् ॥

कर्षोन्मिते सन्धवनागरे च विपाच्य कल्काकृतमेतद्वात् ।

तत्कल्कभागः समहौषधार्धः ससैन्धवो मूत्रयुतश्च पेयः ८

विरेचनार्थ—दालचीनी, बड़ी इलायची, तंजपत्ता, सोंठ, मरिच पीपल १-१ तोला, निशोत का चूर्ण ६ तो० सबको मिलाकर रख लो, मा० ४-८-१२-१६ आना भर, पुराना गुड् चूर्ण से दुगुना मिलाकर चाट लेवे । अथवा चूर्ण से द्विगुण गुड् की चासनी में उक्त चूर्ण मिला अवलेह बनाकर १ तोला खावे अथवा निशोत की जड़ ( की छाल ) का स्वरस १ प्रस्थ ( ६४ तो० ), निशोत का कल्क १ कुड्व ( १६ तो० ) सैन्धव लवण तथा सोंठ १-१ तोला सब को एक साथ पकाकर कल्क जैसा हो जाने पर उचित मात्रा में खावे । अथवा—निशोत का कल्क १ भाग, सोंठ आधा भाग और लवण आधा भाग मिलाकर—गोमूत्र के साथ पीवे ॥ ७, ८ ॥

समाखिबुत्रागरकाभ्याः स्थुर्भागाधर्कं पूगफलं सुपकम् । विडङ्गसारो मरिचं सदार्ण्योगः ससिन्धुद्रवमूत्रयुक्तः ॥ ९ ॥

१ अस्तदोष का अर्थ—कविराज हाराणचन्द्र जी ने, 'कार्क' श्यादि दोष रहित' किया है । महत् का अर्थ—गम्भीर किया है । जैसा कि चरक में पाठ है—'गम्भीरानुगतं रक्षणम्' ।