सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४४ ]
निशोथ, सोंठ, हरङ्ग ये तीनों परस्पर समान भाग, भली प्रकार पकी सुगारी का फल आधा भाग ( निशोथ का ), वाय-विडङ्ग के बीज; मरिच; देवदारु और सैन्धानमक; इनमें प्रत्येक द्रव्य सोंठ के बराबर मिलाकर गोमूत्र के साथ पीना चाहिये ॥ विरेचनद्रव्यभवं तु चूर्ण रसेन तेषां भिषजा विमृद्य । तन्मूलसिद्धेन च सर्पिषाऽऽक्तं सेव्यं तदाज्ये गुटिकीकृतं वा
विरेचन द्रव्यों के चूर्ण को ( त्रिहृतादि के चूर्ण को ), इन्हीं त्रिहृतादि विरेचनद्रव्यों के रस के साथ पीसकर, त्रिहृत-मूल द्वारा सिद्ध घृत के साथ गोली बनाकर खाना चाहिये । बलवान् पुरुष में मात्रा एक कर्ष ( १ तोला ) है ॥ १० ॥
गुडे च पाकाभिमुखे निधाय चूर्णाकृतं सम्यगिदं विपाच्य ।
शीतं त्रिजाताक्तमथो विमृद्य योगानुरुपा गुटिकाः प्रयोज्याः ॥ ११ ॥
मोदकपाक की विधि से चूर्ण से दुगुने गुड़ का पाक करना चाहिये, जब गुड़पाक के करीब हो तब इसमें निशोथ का चूर्ण ( गुड़ से आधा ) मिलाना चाहिये । जब ठण्डा हो जाये तो सुगन्ध के लिये त्रिजातक ( दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता ) मिलाकर, गोलियाँ बना लेनी चाहिये । मात्रा—उचितमात्रा में देनी चाहिये ॥ ११ ॥
वैरेकीयद्रव्यचूर्णस्य भागं
सिद्धं साधं क्वाथभागेक्षतुभिः ।
आमृदनीयात् सर्पिषा तच्छुतेन
तत्क्वाथोष्मस्वेदितं सामितं च ॥ १२ ॥
पाकप्राप्ते फाणिते चूर्णितं तत्
क्षिप्तं पक्वं चावतार्य प्रयत्नात् ।
शीतीभूता मोदका हृद्यगन्धाः
कार्यास्त्वेते भक्ष्यकल्पाः समाप्तात् ॥ १३ ॥
निशोत का चूर्ण १ भाग, निशोत का क्वाथ ४ भाग, दोनों को एक साथ पकाओ और निशोत के कल्क एवं क्वाथ के योग से सिद्ध घृत का मोहन डालकर रोहूँ के मैदा को मलो, फिर निशोत के क्वाथ में स्वेदित कर लो, फिर दोनों को राव (खण्ड) की परिपक्व चासनी में मिलाकर तत्काल अनि पर से उतार लो और शीतल होने पर उसमें सुगन्ध के लिये दालचीनी; इलायची तथा तेजपत्ता का चूर्ण थोड़ा सा मिलाकर मोदक बनालो । यह मोदक एक प्रकार की मिठाई ( भक्ष्य ) जैसे होते हैं—खाने में स्वाद । रोहूँ के मैदा का नाम “समिता” है और समिता से बना पदार्थ “सामित” कहलाता है उदा-हरण—मैदा का हलुवा आदि पदार्थ “सामित” होता है ॥
रसेन तेषां परिभाष्य मुद्गान्
यूषः ससिन्धूद्रवसर्पिरिष्टः ।
वैरेचनेऽन्यैरपि वैदलेः श्या-
देवं विदध्यद्भ्रमनौषधैश्च ॥ १४ ॥
यूषविधि—मूँग को त्रिहृत आदि विरेचन द्रव्यों के रस की भावना देकर, इसमें घी और सैन्धानमक मिलाकर यूष तैयार करना चाहिये । इस प्रकार से मखर आदि अन्य विदलों से भी यूष बनाना चाहिये । इसी प्रकार वमनादि औषधियों से भी यूष तैयार करना चाहिये ॥ १४ ॥
भिरूवा द्विषेभ्यं परिलिप्य कल्कैच्छि-
भण्डिजातैः प्रतिबध्य रञ्ज्वा ।
पक्वं च सम्यक् पुटपाकयुक्त्या
खादेत्तं तं पित्तगदी सुशीतम् ॥ १५ ॥
एक गन्ने को बीच से चीरकर इसमें त्रिभण्डी ( निशोथ ) के कल्क को भरकर पुनः एक रस्सी से बाँध देना चाहिये । इसके ऊपर निशोथ आदि के पत्ते लपेटकर ऊपर से कीचक का लेप करके अङ्गारों में पुटपाक—विधि से पकाना चाहिये । जब कीचक पक जाये तब इसको निकालकर, ठण्डा होने पर, पित्तरोगी को खाने के लिये देना चाहिये ॥ १५ ॥
सिताजगन्धात्क्कक्षीरीविदारीत्रिहृतः समाः ।
लिहोन्मधुघृताभ्यां तु रुद्वदाहव्वरशान्तयोः ॥ १६ ॥
सिता ( शर्करा ), अजगन्धा ( वनयवानी ), त्वक्क्षीरी ( वंशलोचन ), विदारीकन्द, और निशोथ इनको समान मात्रा में मिलाकर, घी और शहद के साथ ( असमान अनुपात से ) चाटना चाहिये । इससे प्यास, दाह और ज्वर शान्त होता है ॥
शर्कराक्षौद्रसंयुक्तं त्रिवृच्छूर्णावचूर्णितम् ।
रेचनं सुकुमारोणां त्वक्पत्रमरिचार्शकम् ॥ १७ ॥
पचेल्लेहं सितार्क्षौद्रपलार्धकुडवान्वितम् ।
त्रिवृच्छूर्णयुतं शीतं पित्तधनं तद्विरेचनम् ॥ १८ ॥
त्रिहृत के चूर्ण को शर्करा और शहद में त्वक ( दालचीनी ), पत्र ( तेजपत्ता ), मरिच इनको चतुर्थांश मिलाकर चटाने से कोमल प्रकृतिबालों को विरेचन हो जाता है । शर्करा एक पल ( चार तोले ), मधु आधा कुडव ( ८ तोले ) लेकर उसमें त्रिहृतचूर्ण चतुर्थांश ( ५ तोले ) डालें, ( शर्करा की पानी में मिलाकर चास बनाकर इसमें निशोथ का चूर्ण मिलाया चाहिये । पाकाभिमुख होने पर इसमें दालचीनी आदि आर्यशयकतानुसार मिलाया चाहिये । शीतल होने पर शहद मिलाया चाहिये ) । यह लेह विरेचक एवं पित्तनाशक है ॥ १७, १८ ॥
त्रिवृच्छयामांक्षारशुण्ठीपिप्पलीमधुनाऽऽनुयात् ।
सर्वश्लेष्मविकारोणां श्रेष्ठमेतद्विरेचनम् ॥ १९ ॥
त्रिहृत ( निशोथ ), श्यामा ( विधारा ), क्षार ( यवक्षार), सोंठ और पिप्पली, इनके चूर्ण को शहद से तर करके