भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४४ ]

सूत्रस्थानम्

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चाटना चाहिये । सब प्रकार के कफरोंगों में यह उत्तम विरेचन है ॥१९॥

बीजाक्षपथ्याकाइमर्थधात्रीदाडिमकोलजान् ।

तैलभृष्टान् रसानम्लफलैरावाप्य साधयेत् ॥२०॥

घनोभूतं त्रिसौगन्ध्यत्रिवृक्षौद्रसमन्वितम् ।

लेह्यमेतत्कफप्रार्थैः सुकुमारैर्विरेचनम् ॥२१॥

बीजाक्षपथ्या (पकी बीजवाली हरड), कारमरी (गम्भारी),

धात्री, (आईवला), दाडिम (अनार) कोल (बेर) इनको एरण्ड-तैल में मूनकर, बिजौर आदि खड़े फलों के रस में इनको पकाना चाहिये । जब कफ हो जाये तब इनमें दालचीनी, इलायची, तेजपात सुगन्धि के लिये तथा निशोथ एवं शहद मिलाकर चाटना चाहिये । तैलमात्रा इतनी होनी चाहिये, जिसमें सुन जाये । क्वाथ के लिये जल हरड से सोलह गुणा, बिजौर का रस क्वाथ से चतुर्थीश, त्रिवृत्त और शहद प्रत्येक लेह का चतुर्थीश । यह लेह कफबहुल सुकुमार रोगियों के लिये विरेचन है ॥२०, २१॥

नीलीतुल्यं त्वगेलं च तैछिद्युत्ससितोपला ।

चूर्णं संतर्पणं क्षौद्रफलांम्लं सन्निपातनुत् ॥२२॥

नीली (नील की जड़ की त्वचा) के समान मिलित दालचीनी और इलायची, इनके वराबर शर्करामिश्रित निशोथ का चूर्ण मिलाकर इसमें मधु और अनार का रस मिलाकर बनाया संतर्पणं सन्निपातनाशक है । सन्निपात रोग अच्छा होने पर उपद्रव शान्ति के लिये देना उत्तम है ॥२२॥

त्रिवृच्छ्यामासिताकृष्णात्रिफलामाक्षिकैः समैः ।

मोदकाः सन्निपातोऽर्ध्वरक्तपित्तव्यरापहाः ॥२३॥

निशोथ, श्यामा (विधारा), खिता (मिश्री), कृष्णा (पिप्ली), त्रिफला और माक्षिक (मधु), इनको समान भाग लेकर लड्डू बना लेने चाहिये । ये विरेचन लड्डू—सन्निपात, ऊर्ध्वरक्तपित्त तथा खरनाशक है ॥२३॥

त्रिवृद्धागाख्यः प्रोक्ताक्षिफला तत्समा तथा ।

क्षारकृष्णाविडङ्गानि संचूर्ण्यै मधुसर्पिषा ॥२४॥

लिह्याद् गुडेन गुटिकाः कृत्वा वाऽप्यथ भक्षयेत् ।

कफवातक्रुतान् गुल्मान् प्लीहोदरहलीमकान् ॥२५॥

हन्त्यन्यानपि चाप्येतत्त्रिरपायं विरेचनम् ।

निशोथ तीन भाग, त्रिफला (हरड, बहेडा, आईवला) तीन भाग, क्षार (यवक्षार), कृष्णा (पिप्ली), विडङ्ग (वायविडङ्ग), इनका चूर्ण भी तीन भाग लेकर घी और शहद में मिलाकर अथवा गुड में गोली बॉधकर खाना चाहिये । इससे कफ एवं वायुजन्य गुल्मरोग, प्लीहा, उदर, हलीमक रोग नष्ट होते हैं । यह उपद्रवरहित विरेचन है ॥२४, २५॥

चूर्णं श्यामा त्रिवन्नीली कटुवी मुस्ता दुरालभामा ॥२६॥

चक्ष्येन्द्रवीजं त्रिफला सर्पिर्मांसरसान्बुभिः ।

पीतं विरेचनं तद्धि रूक्षाणामपि अक्ष्यते ॥२७॥

श्यामा (विधारा), त्रिवृत्त (निशोथ), नील, कटुवी (कटुकी), मुस्ता (मोथा), दुरालभामा (धमासा), चक्ष्य (चविका), इन्द्रवीज (इन्द्रजौ), त्रिफला, घी, इनको मांसरस के साथ साथ देने से रूक्ष शरीरवाले पुरुष को भी विरेचन होता है । (स्निग्ध पुरुषों को त्रिफला तक औषधियों का चूर्ण पानी के साथ देना चाहिये) ॥

वैरेचनिकनिःकाथभागः शीताख्यो मताः ।

द्वौ फाणितस्य तच्चापि पुनरननावधिश्चयेत् ॥२८॥

तत् साधुसिद्धं विज्ञाय शीतं कृत्वा निधापयेत् ।

कलसे क्रुतसंस्कारे विभज्यतु हिमाहिमौ ॥२९॥

मासादूर्ध्वं जातरसं मधुगन्धं वरासवम् ।

पिवेदसावेव विधिः क्षारमूत्रासवेष्टवपि ॥३०॥

वैरेचनिक (निशोथादि) के शीतल क्वाथ के तीन भाग, फाणित (राब) के दो भाग, इनको मिलाकर फिर आग पर रखना चाहिये । जिस समय भली प्रकार पक जाये (आधा रह जाये) तब शीतल करके, अन्दर से घुले एवं मधु-पिप्ली से लिप्त तथा अगुह से धूपित मटके में डालकर, उष्ण श्रुतु में एक पक्ष, शीत श्रुतु में एक मास तक धान्यराशि में रख देना चाहिये । जब एक मास बीत जाये, रस निकल आये और मद्य की सी गन्ध आने लगे तब इस आसव को पीना चाहिये । क्षार, मूत्र आदि आसवों में भी यही विधि बरतनी चाहिये ॥

वैरेचनिकमूलांनां काथे माषान् सुभावितान् ।

सुधौतांतस्तकपायेण शालीनां चापि तण्डुलान् ॥३१॥

अवबुधैकतः पिण्डान् कृत्वा शुष्कान् सुचूर्णितान् ।

शालितण्डुलचूर्णं च तत्काषायोऽभसाधितम् ॥३२॥

तस्य पिष्टस्य भागांशोन् किण्वभागविमिश्रितान् ।

मण्डोदकार्थं कार्यं च दद्यात्तस्सर्वमेकतः ॥३३॥

निदध्यात्कलसे तां तु सुरां जातरसां पिवेत् ।

एष एव सुराकल्पो वमनेष्वपि कीर्तितः ॥३४॥

वैरेचनिक निशोथादि द्रव्यों के क्वाथ में उड्डव (की दाल) को अच्छी प्रकार से भावना देनी चाहिये । शालिधान्यों के चावलों को भी वैरेचनिक द्रव्यों के क्वाथ से भली प्रकार धोना चाहिये । इन दोनों को मिलाकर कूटना चाहिये । गीले होने से जब गोला-पिण्ड-सा बन जाये, तब इनको सुखाना चाहिये । वैरेचनिक द्रव्यों के क्वाथ की उष्णमा से धान्य के चावलों को पूथक पकाना चाहिये । उपर्युक्त चूर्ण के तीन भाग और किण्व का एक भाग, इनको मिलाकर, मण्ड पानी के लिये विरेचनद्रव्यों का क्वाथ मिलाना चाहिये । इनको एक पात्र में रख देना चाहिये । जब रस उत्पन्न हो जाय तब इस

१ "हिवा दिवातपे शुष्कं रात्री रात्री निवासयेत् ॥"

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