सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुमुक्षुसहिता
[ अ० ४५ ]
सुरा को पीना चाहिये । यही सुराकल्पविधि वमन औषधियों में भी बरतनी चाहिये ॥३१-३४॥
मूलाणि त्रिवृदादीनां प्रथमस्य गणस्य च ।
महतः पञ्चमूलस्य मूर्वाशाङ्कघ्योरपि ॥३५॥
सुधां हैमवतीं चैव त्रिफलातिविषे वचाम् ।
संहृत्यैतानि भागौ द्वौ कारयेदेकमेतयोः ॥३६॥
कुर्यान्निरःकाथमेकस्मिन्नेकस्मिन्धूर्णमेव तु ।
लुण्णांस्तस्मिंस्तु निःकाथे भावयेद्द्वहुग्रो यवान् ॥३७॥
शुष्काणां मृदुभृष्टानां तेषां भागाद्ययो सताः ।
चतुर्थं भागमावाप्य चूर्णानामत्र कीर्तितम् ॥३८॥
प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् ततस्तं तदनन्तरम् ।
तेषामेव कषायेण शीतलेन सुयोजितम् ॥३९॥
पूर्ववत् सन्नन्दध्यात्तु ज्ञेयं सौवीरकं हि तत् ॥
त्रिद्वत आदि संशोधनयोगण में कही औषधियाँ, प्रथमगण (विदारीगन्धादि), महापञ्चमूल, मूर्वा (चोरस्नायु), शाङ्कधा (नाटकारज), सुधा (स्तुही का दूध), हैमवती (रक्तवच अथवा अन्य मत से उधार रेबन्द), त्रिफला, अतीस, वच, इनको परस्पर समान भाग लेकर दो भाग करने चाहिये । एक भाग से क्वाथ सिद्ध करना चाहिये और दूसरे भाग का चूर्ण बनाना चाहिये । जो को कूट करके इस क्वाथ से बार-बार भावना देनी चाहिये । इनको सुखाकर मधुर आँच पर धीमे २ मूत्र लेना चाहिये । इन जीओं के तीन भाग लेने चाहिये । उपर्युक्त चूर्ण का चौथा भाग मिलाकर इस समस्त चूर्ण को एक पात्र में रखकर ऊपर से वैरेचनिक द्रव्यों का शीतल कषाय डालकर पूर्व की भाँति बन्द करके रख देना चाहिये । इस प्रकार से उत्तम हितकारी सौवीरक (काड़ी) बन जाती है ॥३५-३९॥
पूर्वोक्तं वर्गमाहृत्य द्विधा कृत्वैकमेतयोः ॥४०॥
भागं संख्यु ससृज्य यवैः स्थाल्यामधिश्येत् ।
अजशृङ्ग्याः कषायेण तमभ्यासिच्य साधयेत् ॥४१॥
सुसिद्धाश्चावतायंतानौषधिभ्यो विवेचेयेत् ।
विमृद्य सतुषान् सम्यक् ततस्तान् पूर्ववन्मिदान् ॥४२॥
पूर्वोक्तौषधभागस्य चूर्णं दत्त्वा तु पूर्ववत् ।
तेनैव सह यूषेण कलशे पूर्ववत् क्षिपेत् ॥४३॥
ज्ञात्वा जातरसं चापि तत्तुषादकमादिशेत् ।
तुषाम्बुसौवीरकयोविधिरेष प्रकीर्तितः ॥४४॥
षड्ग्रात्रात् सप्तग्रात्राद्वा ते च पेये प्रकीर्तिते ।
पूर्वोक्त (त्रिद्वतादिमूल, विदारीगन्धादि) महापञ्चमूल (मूर्वा, शाङ्कधा आदि) वर्ग के दो भाग करके इनमें से एक भाग को कूटना चाहिये । इसमें जो मिलाकर थाली में रखना चाहिये । इनको अजशृङ्गी (काकशाशृङ्गी) के कषाय से आर्द्र करके पकाना चाहिये । और जब भली प्रकार से पक जावे तब इन तृषयुक्त जो को औषधि से पुष्क कर लेना चाहिये । इन तृष
युक्त जो को भली प्रकार से पीसकर दो भाग परिमित लेना चाहिये । इसमें पूर्वोक्त औषधियों के चूर्ण का एक भाग पूर्व की भाँति (चतुर्थ भाग) मिलाना चाहिये । इस चूर्ण को तथा पूर्वोक्त अजशृङ्गी के यूष को पात्र में भरकर पूर्व की भाँति रख देना चाहिये । जब अम्लता उत्पन्न हो जाये, तब 'तृषोदक' बन गया, ऐसा समझना चाहिये । तुषाम्बु और सौवीरक की यह विधि कह दी है । लै या सात दिन में (अत्यन्त उष्णकाल में लै दिन के अन्दर) ये पीने के योग्य हो जाते हैं ॥४०-४४॥
वैरेचनेषु सर्वेषु त्रिवृन्मूलविधिः स्मृतः ॥४५॥
शेष अवशिष्ट श्यामा, दन्ती, द्रवन्ती, सतला आदि विरेचन द्रव्यों में त्रिद्वतमूल के समान विधि का प्रयोग करना चाहिये ॥४५॥
दन्तीद्रवन्त्योर्मूलाणि विशेषान्मृत्कुशान्तरे ।
पिपप्लोक्षौद्रयुक्तानि सिवन्तान्युद्ग्रुत्य शोषयेत् ॥४६॥
ततस्त्रिद्विधानेन योजयेच्छल्लेखमपित्तयोः ।
दन्ती और द्रवन्ती की जड़ों को मिट्टी एवं कुशा के अन्दर रखकर पुटपाक विधि से पकाना चाहिए । जब भली प्रकार से सिवन्न हो जायें तब पिपप्लो और शहद में मिलाकर, त्रिद्वत की विधि से कफ-पित्त रोगियों में प्रयोग करना चाहिये ॥४६॥
तयोः कलकषायाभ्यां चक्रतैलं विपाचयेत् ॥४७॥
सर्पिश्च पक्वं वीसर्पकक्षाद्वाहालजीर्जयेत् ।
मेहगुल्मानिलश्लेखमविबन्धास्तैलमेव च ॥४८॥
चतुःस्नेहं शकृच्छ्लुक्वातसंरोधजा रुजः ।
दन्ती और द्रवन्ती के कलक एवं कषाय से चक्रतैल (तिल-तैल-कोल्हू में पिरा हुआ) सिद्ध करना चाहिये । तैल ३२ पल-दन्ती द्रवन्ती कलक ८ पल, दन्ती द्रवन्ती क्वाथ १२८ पल लेना चाहिये । इसी प्रकार दन्ती-द्रवन्ती के मूल के कलक एवं कषाय से सिद्ध घृत, वीसर्प, कक्षा-दाह, अलजी को जीर्तता है । तथा इसी प्रकार सिद्ध तैल, प्रमेह, गुल्म, वायु, कफ, विबन्ध को नष्ट करता है । इनसे सिद्ध चतुःस्नेह (वसा, वी, तैल, मज्जा), मल, शुक्र, वायु के अवरोधजन्य उदावत्त की पीड़ा को नष्ट करता है ॥४७, ४८॥
दन्तीद्रवन्तीमरिचकनकाहृत्यवासकैः ॥४९॥
विश्वमेषजम्बूद्वीकाचित्रकैर्मूत्रभावितम् ।
समाहं सर्पिषा चूर्णं योज्यमेतद्विरेचनम् ॥५०॥
जीर्णं संतर्पणं क्षौद्रं पित्तश्लेखमरुजापहम् ।
अजीर्णपार्श्वरूपपाण्डुप्लीहोदरनिर्बर्हणम् ॥५१॥
दन्ती, द्रवन्ती, मरिच, कनकाहवा (नागकेसर) यवार्त (दुरालमा), विश्वमेषज (सोठ), मूद्वीका (किसमिस)
१ वृद्ध वैद्य—दशमूल क्वाथ भी मिलाते हैं । २ कनकाहवा का अर्थ कंकुष्ठ (सत्यानाशी) भी करते हैं । आजकल वैद्य समाज में कंकुष्ठ अभी अनिश्चित द्रव्य है ।