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सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुक्तसंहिता

[ अ० ४० ]

केचिदाचार्यां द्रव्यते—द्रव्यं प्रधानं कस्मात् ? व्यवस्थितत्वात्, इह खलु द्रव्यं व्यवस्थितं न रसादयः, यथा—आमे फले ये रसादयस्ते पक्वे न सन्ति; नित्यत्वाच्च, नित्यं हि द्रव्यमनित्या गुणाः, यथा कल्कादिप्रविभागः, स एव संपन्नरसगन्धो व्यापन्नरसगन्धो वा भवति; स्वाजात्यवस्थानाच्च, यथा हि पार्थिवं द्रव्यमन्यभावं न गच्छत्येवं शेषाणि; पञ्चन्द्रियग्रहणाच्च, पञ्चभिरिन्द्रियैर्गृह्यते द्रव्यं न रसादयः; आश्रयत्वाच्च, द्रव्यमाश्रिता रसादयः; आरम्भसामर्थ्याच्च, द्रव्याश्रित आरम्भः, यथा—‘विदारिगन्धादिमाहृत्य संजुच्य विपचेत्’ इत्येवमाद्विषु न रसादिस्वारम्भः, आद्यप्रामाण्याच्च. शास्त्रे हि द्रव्यं प्रधानमुपदेशे योगानां, यथा—‘मातुलुङ्कारिनमन्थो च’ इत्यादौ न रसादय उपदिश्यन्ते, क्रमापेक्षितत्वाच्च रसादीनां, रसादयो हि द्रव्यक्रममपेक्षन्ते, यथा—तरुणे तरुणाः संपूर्णं संपूर्णो इति, एकदेशसाध्यत्वाच्च, द्रव्याणांमेकदेशे नापि व्याधयः साध्यन्ते यथा—महावृक्षक्षीरेणेति, तस्माद्द्रव्यं प्रधानं न रसादयः; कस्मात् ? निरवयवत्वात् । द्रव्यलक्षणं तु ‘क्रियागुणवत् समवायिकारणम्’ इति ॥१॥

कुछ आचार्यों की सम्मति है कि इन सब में ‘द्रव्य’ ही प्रधान है। कारण-व्यवस्थित होने से। द्रव्य ही व्यवस्थित रहता है, रस आदि व्यवस्थित नहीं रहते। जिस प्रकार कि कच्चे फल में प्रथम कषाय, अम्ल रस रहता है, पकने पर पीछे मधुर रस उत्पन्न हो जाता है—वे रस नहीं रहते, परन्तु वह आम का फल-आम्रतक या कोशाम् दूसरा फल नहीं बनता, अपितु आम ही रहता है। दूसरा कारण—नित्यत्वात् नित्य होने से द्रव्य प्रधान है। द्रव्य नित्य हैं और गुण अनित्य—विनाशी हैं। जिस प्रकार कल्क (स्वरस, श्रुत, फाण्ट) आदि में गुण, रस, गन्ध, वे ही रहते हैं, या बदल बिगड़ जाते हैं। तीसरा कारण—अपनी (पार्थिवादि) जाति में अवस्थित रहने के कारण द्रव्य प्रधान है। जिस प्रकार पार्थिव द्रव्य, जलीय आदि जाति में परिवर्चित नहीं होते, उसी पार्थिव रूप में रहते हैं। चौथा कारण—पाँचों इन्द्रियों से द्रव्य का ग्रहण होता है। इसलिये द्रव्य प्रधान है। पाँचों इन्द्रियों से द्रव्य का ही ग्रहण होता है, रस आदि का नहीं। पांचवाँ कारण-आश्रय होने से द्रव्य प्रधान है। रसादि द्रव्य में ही आश्रय करके रहते हैं। छठा कारण—योग का आरम्भ—उपक्रम सामर्थ्य में ही है। यथा-विदारीगन्धा आदि द्रव्यों को लाकर,

परन्तु वीर्य में भेद है, हरीतकी उष्णवीर्य और आंवला शीतवीर्य है। द्रव्य, रस, गुण, विपाक द्वारा जो कार्य नहीं हो सकता, वह प्रभाव से होता है।

“वीर्यं शक्तिरस्यतिविशेषः सामर्थ्यं प्रभाव इत्यर्थान्तरम् ।”

कूटकर पकाना चाहिये, यह व्यवहार द्रव्य में ही होता है, रसादि में नहीं। सातवाँ कारण—शास्त्र के प्रमाण से द्रव्य प्रधान है। यथा—मातुलुङ्कारिगन्ध आदि में द्रव्य का ही उपदेश शास्त्र में है, रसादि का नहीं। आठवाँ कारण—रस आदिमें क्रम की अपेक्षा रहती है, क्योंकि रस आदि द्रव्य के क्रम की अपेक्षा रखते हैं। यथा—तरुण द्रव्य में रस भी तरुण रहते हैं, सम्पूर्ण द्रव्य में रस भी सम्पूर्ण रहते हैं। नौवाँ कारण—रोगों के एकदेश द्वारा साध्य होने से। यथा—द्रव्यों के एक भाग से रोग अच्छे होते हैं—जैसे—महावृक्ष के दूध से। इसलिये रस-वीर्य-विपाक में द्रव्य ही प्रधान है। रसादि प्रधान नहीं। क्योंकि रसादि अवयव रहित हैं। द्रव्य का लक्षण—क्रिया गुणवान् एवं समवायिकरणवाला द्रव्य है। जिसमें क्रिया तथा गुण रहें और जो समवायी करण हो वह द्रव्य है, यथा—वृक्ष में तन्तु, घड़े में मिट्टी ॥१॥

नेत्याहुर्नर्ये, रसास्तु प्रधानं; कस्मात् ? आगमात्, आगमो हि शास्त्रमुच्यते, शास्त्रे हि रसा अधिकृताः, यथा—रसायत्त अहार इति, तस्मिन्तु प्राणाः उपदेशात् उपदिश्यन्ते हि रसाः, यथा—मधुराम्ललवणा वान् शमयन्ति; अनुमानाच्च, रसेन हानुमीयते द्रव्यं, यथा—मधुरमिति; ऋषिवचनाच्च, ऋषिवचनं वेदो यथा—किंचिद्विद्यार्थं मधुरमाहुरेदिति, तस्माद्दसाः प्रधानं; रसेषु गुणसंज्ञा । रसलक्षणमन्यत्र पदेद्व्यामः ॥४॥

दूसरे आचार्यों का कथन है कि यह ठीक नहीं (द्रव्य प्रधान नहीं है), रस ही प्रधान हैं। क्योंकि—आगम के प्रमाण से। आगम का अर्थ शास्त्र है। शास्त्र में रस को ही प्रधानता दी गई है। यथा—आहार रस के अधीन है और प्राण आहार के आश्रित हैं। दूसरा कारण—उपदेश से यथा—मधुर, अम्ल, लवण रस वायु का शमन करते हैं। तीसरा कारण—अनुमान से रस के द्वारा ही द्रव्य का अनुमान होता है, यथा—यह मीठा है। चौथा कारण—ऋषि के वचन से। ऋषिवचन का अर्थ वेद है, यथा—यज्ञ के लिये कुछ थोड़ा मधुर (मीठा) लाओ, यहाँ पर द्रव्य को न कहकर रस को मांगा। इसलिये रस ही प्रधान है। रस की भांति गुण भी प्रधान है। रस का लक्षण (रसविज्ञानीय अध्याय में) कहेंगे ॥४॥

नेत्याहुर्नर्ये, वीर्यं प्रधानमिति। कस्मात् ? तद्वशेनौषधकर्मान्मप्यतेः। इहौषधकर्माण्युधर्वाधोभागोभयभागांसंशोधनसशमनसाङ्ग्राहिकगिन्दीपनपीडनलेखनबृहणं रसायनवाज्करणश्वयशुकरविलयनदहनदारणमादनप्राणघ्नविषप्रशमनादीनि वीर्य प्रधान्याद्भवन्ति। तच्च वीर्य द्विविधमुष्णं शोतं च, अग्नीषोमीयत्वाज्जगतः। केचिदष्टविधमाहुः शीतमुष्णं क्षिप्रं रूक्षं विशदं पिच्छिलं मृदुं तीक्ष्णं

४० ४० ] १९

सूत्रस्थानम्

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चेति । एतानि वीर्याणि स्वबलगुणोत्कर्षाद्दसमभिभूयात्मकर्म कुर्वन्ति । यथा तावन्महत्पञ्चमूलं कषायं तित्तानुरसं वातं जमयति, उष्णवीर्यत्वात्, तथा कुल्लथः कषायः कटुकः पलाण्डुः, स्नेहभावाच्च, मधुररुचेःप्रसरो वातं वर्धयति, शीतवीर्यत्वात् ; कटुका पिप्पलीं पित्तं जमयति, मृदु शीतवीर्यत्वात्, अम्लमामलकं लवणं सैन्धवं च, तित्ता काकमाचीं पित्तं वर्धयति, उष्णवीर्यत्वात् ; मधुरा मत्स्याश्च; कटुकं मूलकं श्लेष्माणं वर्धयति, स्निग्धवीर्यत्वात् ; अम्लं; कपित्थं श्लेष्माणं जमयति, रूक्षवीर्यत्वात्, मधुरं क्षौद्रं च तदेतन्निन्दर्शनमात्रमुक्तम् ॥४॥

यह भी ठीक नहीं—वीर्य ही प्रधान है, ऐसा तीसरे आचार्यों का मत है । कारण—वीर्य की अधीनता से औषध कर्म होता है । औषध कर्म, यथा—ऊर्ध्वभाग (वमन), अधोभाग (विरेचन), दोनों भागों का संशोधन, संशमन, संग्राहक (शाल्मलीवृक्ष आदि), अग्निदीपक (चित्रक आदि), प्रपीड़न, लेखन (पत्तलीकरण), बृंहण, रसायन, वाजीकरण, क्षयशुकर, क्षयशुबिलयन, दहन, द्वारण, मादन (मत्तताकरण), प्राणघ्न, विषप्रशमन (अगदादि), आदि कर्म वीर्य की प्रधानता से ही होते हैं । यह वीर्य दो प्रकार का है—शीत और उष्ण । क्योंकि—जगत् अग्नीषोमीय है, आग्नेय एवं सौम्य तत्त्वों से उत्पन्न हुआ है । कई आचार्यों का मत है कि वीर्य आठ प्रकार का है—शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष, विशद, पिच्छिल, मृदु और तीक्ष्ण । ये वीर्य अपने गुण की प्रधानता से रस को पराजित करके अपना कार्य करते हैं । यथा—महापञ्चमूल उष्णवीर्य होने से ही तित्तकषाय-अनुरस होने पर भी वायु का शमन करता है । कुल्लथी कषाय रस, पलाण्डु कटुरस होने पर भी स्निग्ध (स्निग्धवीर्य) होने से वायु का शमन करते हैं । गन्ने का मधुर रस—शीतवीर्य होने से वायु को बढ़ाता है । पिप्पली का कटुरस मृदु, शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करता है । आँवले का खट्टा रस और सैन्धव का लवण रस मृदु, शीतवीर्य होने से पित्त का शमन करते हैं । मकोय का तित्तरस पित्त को बढ़ाता है, उष्णवीर्य होने से । मछलियों का मधुर रस, मूली का कटुरस कफ को बढ़ाता है स्निग्ध वीर्य होने से । रूक्ष वीर्य होने से, खट्टा कैथ और मधुर शहद कफ का शमन करते हैं । यह केवल उदाहरण मात्र ही हैं ॥५॥

भवन्ति चात्र— ये रसा वातशमना भवन्ति यदि तेषु चै । रौच्यलाघवशैत्यानि न ते हन्युः समीरणम् ॥६॥

१ उपनिषदों में भी कहा है—‘प्रजापतिः प्रजाकामी । स तपस्तत्त्वा मिथुनमुत्पादयते । रयिञ्च प्राणञ्च, इत्येवा प्रजाः करिष्यन्ते । रयिरैव चन्द्रमाः, प्राण एव सूर्यः ॥’

प्रकोपनिषद् ।

ये रसाः पित्तशमना भवन्ति यदि तेषु चै । तैश्चयोष्णयलघुनाश्चैव न ते तत्कर्मकारिणः ॥७॥ ये रसाः श्लेष्मशमना भवन्ति यदि तेषु चै । स्नेहगौरवशैत्यानि न ते तत्कर्मकारिणः ॥८॥ तस्माद्वीर्यं प्रधानमिति ॥९॥

कहा भी है— जो रस (मधुर, अम्ल, लवण) वायु का शमन करते हैं, यदि इनमें रूक्ष, लघु, शीतवीर्य हो तो ये वायु का शमन नहीं कर सकते । जो रस (मधुर, तित्त, कषाय) पित्त का शमन करते हैं, यदि इनमें तीक्ष्ण, उष्ण, लघु वीर्य हो तो ये पित्त का शमन नहीं कर सकते । जो रस (कटु, तित्त, कषाय) कफ का शमन करते हैं, यदि इनमें स्नेह गुरु, शीतवीर्य हो तो ये कफ का शमन नहीं कर सकते । इसलिये रस से भी वीर्य ही प्रधान है ॥

नेत्याहुर्नये, विपाकः प्रधानमिति । कस्मात् ? सम्यङ्-मिथ्याविपक्त्वात्; इह सबद्रव्याण्यभ्यवहृतानि सम्यङ्-मिथ्याविपकानि गुणं दोषं वा जनयन्ति । तत्राहुर्नये-प्रतिरसं पाक इति । केचित्त्रिविधमिच्छन्ति—मधुरमम्लं कटुकं चेति । तत्तु न सम्यक्, भूतगुणादामाच्छान्योऽन्तो विपाको नास्ति; पित्तं हि विदग्धमम्लतामुपैत्याग्नेयत्वात् ; यद्येवं लवणोऽप्यन्यः पाको भविष्यति, श्लेष्मा हि विदग्धो लवणतामुपैतोति । मधुरो मधुरस्याम्लोऽम्लस्यैवं सर्वेषामिति केचिदाहुः, दृष्टान्तं चोपदिशन्ति,—यथा तावत् क्षीरमुखगन्तं पञ्चयमानं मधुरमेव स्यात्तथा शालिखमुद्गादयः प्रकीर्णोः स्वभावमुत्तरकालेऽपि न परित्यजन्ति तद्वदिति । केचिद्वदन्ति—अवलवन्तो बलवतां वशमायान्तोति । एवमनवस्थितिः, तस्माद् सिद्धान्त एष आगमे हि द्विविध एव पाको मधुरः कटुकश्च । तयोर्मधुराख्यो गुरुः, कटुकाख्यो लघुरिति । तत्र पृथिगप्येत्येजोवाय्वाकाशानां द्वैविध्यं भवति गुणसाधन्याद् गुरुता लघुता च; पृथिग्यापश्च गुर्न्यः शेषाणि लघूनि; तस्माद् द्विविध एव पाक इति ॥१०॥

यह बात ठीक नहीं, विपाक ही प्रधान है—ऐसी चौथे आचार्यों की सम्मति है । कारण—सब भुक्त द्रव्य ही, विपाक द्वारा गुण या दोष को उत्पन्न करते हैं । सम्यक् विपाक होने पर गुण एवं मिथ्याविपाक होने पर दोष उत्पन्न करते हैं । कई आचार्यों का कहना है कि पाक—प्रत्येक रस के अनुसार होता है । (इस प्रकार से छः प्रकार का विपाक है) । कोई तीन प्रकार का विपाक मानते हैं, यथा—मधुर, अम्ल और कटु । यह ठीक नहीं है । क्योंकि—पृथ्वी और अग्नि के गुणों से एवं आम के कारण ‘अम्ल’ विपाक नहीं है—पित्त ही विदग्ध होकर

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४० ]

अम्ल हो जाता है, आग्नेय गुण होने से । यदि अम्ल विपाक को मानने हो तो—'लवण' भी एक पाक होगा, क्योंकि श्लेष्मा विदग्ध होकर 'लवण' हो जाता है। कई आचार्यों का कहना है कि मधुररस का मधुरविपाक, अम्ल रस का अम्लविपाक । इस प्रकार से सब रसों का (प्रतिरस) विपाक होता है । वे अपने इस कथन की पुष्टि में उदाहरण भी देते हैं—जिस प्रकार थाली (कड़ाही) में रक्खा दूध पकने पर भी मधुर ही रहता है, जिस प्रकार शाली (हेमन्तधान्य), जो, मूळ आदि भी भूमि में बोए जाने पर दूसरा फल लगने (पकने) पर भी अपने स्वभाव का परित्याग नहीं कर सकते । इसी प्रकार से रस भी जठराग्नि द्वारा पाक होने पर भी अपने मधुर आदि स्वभाव का परित्याग नहीं कर सकते । कई आचार्यों का कथन है कि—निर्वल रस बलवान् रसों के वश में आ जाते हैं । इसलिये यह निश्चित नहीं, यह अनागम है । अपना पक्ष—शाल्व में दो ही प्रकार का पाक है, यथा—मधुर और कटु । इनमें मधुर विपाक गुरु और कटु विपाक लघु है । इनमें—पृथिवी, अप, तेज, वायु और आकाश, इन पञ्चमहाभूतों के भी गुरु लघु, गुण साधर्म्य के कारण दो भेद हैं । यथा—पृथिवी और जल गुरु, तेज वायु और आकाश लघु हैं । इसलिये पाक भी दो प्रकार का ही है ॥१०॥

भवन्ति चात्र—

द्रव्येषु पञ्चमानेषु येष्वन्वुपृथिवीगुणाः ।

निर्वर्तन्तेऽधिकस्तत्र पाको मधुर उच्यते ॥११॥

तेजोऽनिलाकाशगुणः पञ्चमानेषु येषु तु ।

निर्वर्तन्तेऽधिकस्तत्र पाकः कटुक उच्यते ॥१२॥

कहा भी है—

द्रव्यों के पाककाल में जब पृथ्वी और जल के गुण अधिक प्रबल होते हैं, तब मधुर विपाक होता है । और जिन द्रव्यों के पाककाल में तेज, वायु, आकाश के गुण अधिक प्रबल रहते हैं तब कटुविपाक होता है ॥११,१२॥

पृथक्त्वदग्निनामेव वादिनां वादसंग्रहः ।

चतुर्णामपि सामग्र्यमच्छन्त्यत्र विपक्षितः ॥१३॥

भिन्न-भिन्न रूपसे देखनेवाले वादियों के मत ऊपर दिखा दिये हैं । बुद्धिमान् मनुष्य रस, वीर्य, गुण और विपाक इन चारों की समुदायता को स्वीकार करते हैं ॥१३॥

तद्वद्रव्यमात्मना किंचित्किचिद्वीर्येण सेवितम् ।

किंचिद्रसविपाकाभ्यां दोषं हन्ति करोति वा ॥१४॥

कोई तो द्रव्य अपने द्रव्यत्व से, कोई द्रव्य अपने वीर्य से, कोई अपने रस से और कोई अपने विपाक से दोष को उत्पन्न करता है, या दोष का शमन करता है । यथा—खैर कुछ को, महत्पञ्चमूल वीर्य द्वारा वायु का शमन करता है । तित्त गिलोय

उष्णवीर्य होने पर भी (रस से) पित्त का शमन करती है । गुण्ठी कटु रस होने पर भी (मधुरविपाक के कारण) वायु का शमन करती है ॥१४॥

पाको नास्ति विना वीर्यद्वीर्यं नास्ति विना रसात् । रसो नास्ति विना द्रव्याद् द्रव्यं श्रेष्ठतमं स्मृतम् ॥१५॥

विना वीर्य के तो विपाक नहीं, विना रस के वीर्य नहीं, विना द्रव्य के रस नहीं, इसलिये द्रव्य को श्रेष्ठ कहा है ॥१५॥

जन्म तु द्रव्यरसयोरन्योन्यापेक्षिकं स्मृतम् ।

अन्योन्यापेक्षिकं जन्म यथा स्याद्देहेहिन्तोः ॥१६॥

वीर्यसंज्ञा गुणा येऽष्टौ तेषुि द्रव्याश्रयाः स्मृताः ।

रसेषु न भवन्त्येते निर्गुणास्तु गुणाः स्मृताः ॥१७॥

द्रव्ये द्रव्याणि यस्माद्धि विपञ्च्यन्ते न षड्साः ।

श्रेष्ठं द्रव्यमतो ज्ञेयं, शेषा भावास्तदाश्रयाः ॥१८॥

जिस प्रकार (देह शरीर) और देही (आत्मा) का जन्म परस्पर एक दूसरे की अपेक्षा से है, उसी प्रकार द्रव्य एवं रस की उत्पत्ति अन्योन्याश्रित है । आठों प्रकार का वीर्य भी द्रव्य में ही आश्रित है । यह वीर्य रसों में नहीं हो सकता, क्योंकि गुण तो निर्गुण हैं (गुण में गुण नहीं रहता), गुण द्रव्य में रहते हैं । पञ्चमहाभूतों से बने इस द्रव्य (शरीर) में आहार द्रव्य पकते हैं, गुणों का पाक नहीं होता (मधुर आदि रस नहीं पकते) । इसलिये रस, वीर्य विपाक में द्रव्य को ही श्रेष्ठ समझना चाहिये, ये रसादि उसी के आश्रित हैं ॥१६-१८॥

अमीमांस्थान्यचिन्त्यानि प्रसिद्धानि स्वभावतः ।

आगमेनोपयोव्यानि भेषजानि विचक्षणः ॥१९॥

जो औषधियाँ स्वभाव से ही प्रसिद्ध हैं (यथा—खदिर, तुवरक, रसाञ्जन, हरिद्रादि-कुष्ठनाशक हैं) ।—उनके विषय में विचार करने की आवश्यकता नहीं । क्योंकि इनका स्वभाव (प्रभाव) अचिन्त्य है । इसी प्रकार जो औषधियाँ शाल्व से व्यवहार में आती हैं, वे भी अविचारणीय हैं ॥१९॥

१ किंचिद् रसेन कुष्ठे कमं वीर्येण चापरम् ।

द्रव्यं गुणेन पाकेन प्रभावेण च किञ्चन ॥

रसौ विपाकस्तौ वीर्यं प्रभावस्तानपौहति ।

बलसाम्ये रसादोनामिति नैसर्गिकं बलम् ॥ चरक ।

२ 'रसवीर्यविपाकानां सामान्यं यत्र लक्ष्यते ।

विशेषः कर्मणां चैव प्रभावस्तस्य स स्मृतः ॥

प्रभावोऽचिन्त्य उच्यते ॥'

प्रभाव दो प्रकार का है । यथा—चिन्त्य और अचिन्त्य । चिन्त्य प्रभाव पाठा का संयाही होना, अचिन्त्य प्रभाव—मणि-मुक्ता के धारण से रोगनिवृत्ति, दन्ती—चित्रक के समान रस, वीर्य होने पर भी एक विरेचक है, दूसरा नहीं ।

रस, वीर्य, विपाक प्रभाव के विस्तार के लिये—

अ० ४१ ]

सूत्रस्थानम्

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प्रत्यक्षलक्षणफलाः प्रसिद्धाश्च स्वभावतः । नौषधीर्हंतुभिर्विद्वान् परीक्षेत् कदाचन ॥ २० ॥ सहस्रेणापि हेतूनां नामृषडादिविरेचेयेत् । तस्मात्तिष्ठेत्तु मतिमानागमे न तु हेतुषु ॥ २१ ॥ शास्त्र की प्रधानता—

जिन औषधियों का शास्त्र के कथनानुसार प्रत्यक्ष लक्षण, प्रत्यक्षफल दीखता है, स्वभाव से ही जिनके कार्य प्रसिद्ध हैं, उन औषधियों की तर्क द्वारा परीक्षा नहीं करनी चाहिये। हजारों तर्क से भी अम्बुषा (पाठा) आदि औषधियों से विरेचन कार्य नहीं प्राप्त किया जा सकता। इसलिये बुद्धिमान् को चाहिये कि सदा शास्त्र के अनुसार व्यवहार करे—तर्क से नहीं ॥ २०, २१ ॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यगुणरसवीर्यविपा- कविज्ञानीयो नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४० ॥

एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

अथातो द्रव्यविशेषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे 'द्रव्य-विशेष-विज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥

तत्र पृथिव्यपतेजोवायुत्राकाशानां समुदायाद् द्रव्याभि- निर्धत्तिः, उत्कर्षस्त्वभिपद्यज्ञको भवति—इदं पार्थिवमिद- माप्यमिदं तैजसमिदं वायव्यमिदमाकाशीयमिति ॥ ३ ॥

इनमें, पृथ्वी, अप्, तेज वायु और आकाश के मिलने से द्रव्य की उत्पत्ति होती है। इन पाँचों के समुदाय में से जिस भूत के गुणों की उत्कर्षता होती है, उसी से वह द्रव्य पहिचाना जाता है, यह पार्थिव है, यह जलीय है, यह तेजस है, यह वायवीय है, यह आकाशीय है। "इह हि द्रव्यं पञ्चमहाभूता- त्मकम् । तस्याधिष्ठानं पृथिवी, योनिरुदकं, खानिलानलसमवा- याभिर्वृत्तिविशेषौ ।" (अष्टांगसंग्रहः) ॥ ३ ॥

तत्र स्थूलसारसान्द्रमन्दस्थिरगुरुकठिनं गन्धबहुलमी- षत्कृपायं प्रायशो मधुरमिति पार्थिवं, तत् स्थैर्यबलगीर- वसंघातोपचयकरं विशेषतश्चाधोगतिस्वभावमिति ॥(१)॥

इनमें जो द्रव्य स्थूल, सार (हृद) सान्द्र (घन), मन्द, स्थिर, गुरु, कठिन, गन्धबहुल, थोड़ा कृपाय रस, प्रायः मधुर रस होता है, वह पार्थिव द्रव्य है। यह द्रव्य शरीर में स्थिरता, बल, गुरुता, कठिनता और वृद्धि उत्पन्न करता है। विशेषकर यह पार्थिव द्रव्य अघोगामी (विरेचन गुण) स्वभाववाला होता है ॥(१)॥

“द्रव्यगुण-संग्रह” अवश्य देखिये। अथवा श्रीयादवजी महाराज का “द्रव्य-गुण-विज्ञान” प्रथम भाग देखें।

शीतस्तिमितस्निग्धमन्दगुरुसरसान्द्रमुदुपिच्छिलं र- सबहुलमोषत्कृपायाम्ललवणं मधुररसप्रायमाप्यं; तत् स्नेहनह्लादनकंलेदनबन्धनविष्यनदनकरमिति ॥(२)॥

जो द्रव्य शीत, स्तिमित (जड़), स्निग्ध, मन्द, गुरु, सर (फैलेनेवाला), सान्द्र, मुदु, पिच्छिल, रसबहुल, ईषत्कृपाय, अम्ल-लवणरस, एवं प्रायः मधुर रस होता है, वह आप्य है। यह द्रव्य स्नेहन; प्रह्लादन (सुखोत्पत्ति में हेतु) क्लेदन (आर्द्रता), बन्धन (संहति उत्पन्न करनेवाला), विष्यनदन (द्रव का बहानेवाला) है ॥(२)॥

सष्ठगीदीणसूदमरूक्षखरलघुविशदं रूपबहुलमीषदम्ल- लवणं कटुकरसप्रायं विशेषतश्चोर्ध्वगतिस्वभावमिति तैजसं तदहनपचनदारणतापनप्रकाशनप्रभावर्णकरमिति ॥(३)॥

जो द्रव्य—उष्ण, तीक्ष्ण, सूक्ष्म, रूक्ष, खर, लघु, विशद, एवं रूप-गुण-बहुल थोड़ा अम्ल-लवण रस, प्रायः (अधिकतवा) कटुरस, खासकर ऊर्ध्वभाग (वमन) में जानेवाला तैजस द्रव्य है। यह द्रव्य—बहन (जलाने), पाचन (पकाने), दारण; तापन(शरीरादि सन्तापन), प्रकाशन (अभिव्यक्ति), प्रभा-तेज वर्ण—(गोरादि) करनेवाला है ॥(३)॥

सूदमरूक्षखरशिशिरलघुविशदं स्पर्शबहुलमीषत्तिक्तं विशेषतः कृपायमिति वायवीयं, तद्वैशघलाघवरूपनविरू- क्षणविचारणकरमिति ॥(४)॥

जो द्रव्य—सूक्ष्म, रूक्ष, खर, शिशिर, लघु, विशद, स्पर्श- बहुल, थोड़ा सा तिक्त रस और अधिकतवा कृपाय रसवाला हो, वह वायवीय द्रव्य है। यह द्रव्य—विशदता, लाघव, ग्लपन (हर्ष का नाश), विरूक्षण (रूक्षता), विचारण (मन में अनेक प्रकार के विचार) उत्पन्न करता है ॥(४)॥

ऋदण्णसूदममुदुन्यवायिविशदविविकतमव्यकतरसं अ- द्बबहुलमाकाशोयं, तन्माद्वेशोपिष्यलाघवकरमिति ॥(५)॥

जो द्रव्य—त्रिकना, सूक्ष्म, मुदु, व्यवायी (सम्पूर्ण देह में फैलकर जो पीछे से पक होता है), विभक्त (पृथक् बना हुआ), अव्यक्त रस, शब्दबहुल हाता है, वह आकाशीय द्रव्य है। यह मुदुता, शुभिरता (सन्निद्धता), और लघुताको उत्पन्न करता है।

अनेन निदशनेन नानौषधीभूतं जगति किंचिद् द्रव्य- मस्तीति कृत्वा तं तं युक्तिवांशेपमर्थं चाभिसमीद्वय स्व- वीर्यगुणयुक्तानि द्रव्याणि कामुकाणि भवन्ति। तानि यदा कुर्वन्ति स कालः, यत् कुर्वन्ति तत् कमं, येन कुर्वन्ति तद्वार्यं, यत्र कुर्वन्ति तदधिकरणं, यथा कुर्वन्ति स उपायः, यन्निरूपादयन्ति तत् फलमिति ॥ ५ ॥

इस दृष्टि से इस स्थावर-जङ्गम संसार में ऐसा कोई भी द्रव्य नहीं है, जो कि औषधि-(दोषों का नाश करनेवाला) रूप न हो, (क्योंकि सब वस्तुयें पञ्चमहाभूतों के समुदाय से ही बनी हैं)। इसलिये—जल, अग्नि, संस्कार, भावना आदि

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४१ ]

योजनाओं के कारण एवं नाना प्रकार के रोगों के नाश के प्रयोजन की दृष्टि से, सब द्रव्य अपने वीर्य एवं गुणों के कारण कार्यशील होते हैं। ये द्रव्य जिस समय में क्रिया करते हैं, वह काल है, जो क्रिया (शोधनादि, भेषज द्रव्य व्यापार) करते हैं, वह कर्म है, जिस शक्ति से कार्य करते हैं, वह वीर्य है, जिस स्थान में (पञ्चमहाभूतसमवायी शरीर में) कार्य करते हैं, वह अधिकरण है, जिस प्रकार (स्वरस, श्रुतु; फाण्ट, घृत, तैल आदि) से करते हैं वह उपाय है, जो (स्वास्थ्य या अस्वास्थ्य) उत्पन्न होता है, वह फल है ॥ ५ ॥

तत्र, विरेचनद्रव्याणि पृथिव्यन्मुखगुणभूयिष्टानि पृथिव्यापो गुर्ध्वः, तानि गुस्स्वादधोगच्छन्ति, तस्माद्विरेचनसधोगुणभूयिष्टमनुमानात्। वसनद्रव्याण्यग्निवायुगुणभूयिष्टानि, अग्निवायु हि लघु, लघुत्वाच्च तान्युर्ध्वमुत्तिष्ठन्ति, तस्माद्वसनसप्युर्ध्वगुणभूयिष्टम्। उभयगुणभूयिष्टमुभयतोभागम्, आकाशगुणभूयिष्टं संशमनं सांप्राहिकमानल्लगुणभूयिष्टम्, आनलस्य शाषणात्मकत्वात्, दीपनमग्निगुणभूयिष्टं, तत्समानत्वात्, लेखनमनिलानल्लगुणभूयिष्टं, बृहण् प्राथव्यन्मुखगुणभूयिष्टम्, एवमौषधकर्मप्यनुमानात् साधयेत् ॥ ६ ॥

विरचनद्रव्यां स पृथिवी एवं जल के गुणों की अधिकता रहती है। पृथिवी और जल भारी हैं, इसलिये भारी होने से नीचे जात है। इसलिये अनुमान द्वारा यह जाना जा सकता है कि विरेचनद्रव्य प्रायः अधागामी होते हैं। वसनद्रव्यों में—अग्नि एवं वायु के गुणों की अधिकता रहती है। अग्नि और वायु लघु हैं—इसलिये लघु होने से ऊपर जाते हैं। इसलिये वसन द्रव्य मा ऊपर का जात है। दोनों प्रकार के गुणवाले [अधामागों और ऊर्ध्वमागों] द्रव्य दोनों मागों से जाते हैं। आकाशगुण की अधिकतावाले द्रव्य संशमन गुणवाले हैं। सांप्राहक द्रव्यों में वायु के गुणों की अधिकता रहती है। चूंकि वायु शाषक है। दीपन गुणवाले द्रव्यों में अग्निगुणों की अधिकता रहती है। चूंकि ये आग्नेय द्रव्य—जाटगान के समान होते हैं। लेखनद्रव्यां में—वायु एवं अग्नि के गुणों की अधिकता होती है। बृहण्द्रव्यों में—पृथिवी एवं जल के गुणों की अधिकता रहती है। इस प्रकार से औषध के कार्यों को अनुमान से जानना चाहिये ॥ ६ ॥

भवान्त चात्र—

भूतजावागजद्रव्यैः शमं याति समीरणः।

भूयन्मुखवायुजः पित्तं क्षप्रमाप्नोति निर्धृतिम् ॥ ७ ॥

खेतजानल्लजः श्लेष्मा शममेति शरीरिणाम्।

वियत्पवनजाताभ्यां वृद्धिमभ्यति मारुतः ॥ ८ ॥

१ संशमन का लक्षण—

‘न शोषयति यद्वाणं समाबोदीरयत्यपि।

समीकरोतिविषमान् तत् संशमनमुच्यते ॥’

आग्नेयमेव यद्द्रव्यं तेन पित्तमुदीर्यते।

वसुधाजलजाताभ्यां बलासः परिवर्धते ॥ ९ ॥

कहा भी है—

पुरुषों में वायु—पृथिवी, अग्नि और वायु के द्रव्यों से, पित्त—पृथिवी, वायु और जलीय द्रव्यों से, कफ—आकाश, अग्नि और वायवीय द्रव्यों से वायु शान्त होते हैं। आकाश एवं वायवीय द्रव्यों से वायु, आग्नेय द्रव्यों से पित्त, पृथिवी एवं जलीय से कफ बढ़ता है ॥ ७-९ ॥

एवमेतद्गुणाधिक्यं द्रव्ये द्रव्ये विनिश्चितम्।

द्विशो वा बहुशो वापि ज्ञात्वा दोषेषु चाचरेत् ॥ १० ॥

इस प्रकार गुणों की प्रधानता प्रत्येक द्रव्यों में निश्चित है। इस प्रधानता को देखकर; (एक दोष की), दो दोषों अथवा बहुत दोषों की अधिकता में (चिकित्सा में) उन तत्वों का उपयोग करना चाहिये ॥ १० ॥

तत्र य इमे गुणा वीर्यसंज्ञकाः शीतोष्णस्तिग्धरूपः मृदुतीक्ष्णपिच्छलविशदस्तेषां तीक्ष्णोष्णावान्नेयोः शीतपिच्छलवाक्मुखगुणभूयिष्टाः, पृथिव्यन्मुखगुणभूयिष्टाः स्नेहः, तोयाकाशगुणभूयिष्टाः मृदुत्वं, वायुगुणभूयिष्टाः रौद्र्यं, क्षिप्तसमरगुणभूयिष्टाः वैशर्यं; विपाकावुक्तगुणौ। तत्र, उष्णस्तिग्धो वातघ्नो, शीतमृदुपिच्छलाः पित्तघ्नाः, तीक्ष्णरूक्षविशदाः श्लेष्मघ्नाः, गुरुपाको वातपित्तघ्नाः, लघुपाकः श्लेष्मघ्नः। तेषां मृदुशीताष्णाः स्पशोप्राहाः, पिच्छलविशदौ चतुःस्पशोभ्या, स्तिग्धरूक्षौ चतुष्पा, तीक्ष्णो मुखे दुःखोत्पादनात्। गुरुपाकः मृदुविष्मृन्नतया कफोत्कलेशनं च, लघुबद्धविष्मृन्नतया मारुतकापनं च। तत्र तुल्यगुणेषु भूतेषु रसवैशज्यमुपलक्षयत्, तद्यथा—मधुरो गुरुश्च पाथवः, मधुरः स्तिग्धश्चाप्य इति ॥ ११ ॥

यह जो वीर्य संज्ञक गुण है। यथा—शीत, उष्ण, स्तिग्ध, रूक्ष, मृदु, तीक्ष्ण, पिच्छल और विशद। इनमें तीक्ष्ण और उष्ण गुण आग्नेय हैं, शीत और पिच्छल, जलगुण—बहुत होते हैं; स्नेह में प्राथवों एवं जलाय गुण की अधिकता रहता है, रूक्ष में वायवीय गुणों की अधिकता, वैशर्य में प्राथवी, वायु के गुण की अधिकता रहती है। गुरु एवं लघु विपाक (मधुर एवं कटु विपाक) के गुण पहले कह चुक हैं। इनमें—उष्ण एवं स्तिग्ध वातनाशक, शीत, मृदु और पिच्छल पित्तनाशक, तीक्ष्ण, रूक्ष और विशद गुण श्लेष्मानाशक हैं। गुरु (मधुर) विपाक वातपित्तनाशक, लघु (कटु) कफनाशक हैं। इनमें से मृदु-शीत और उष्णगुण स्पशोन्द्रिय-प्राहा हैं। पिच्छल एवं विशद गुण आँख और स्पशोन्द्रिय द्वारा, स्तिग्ध और रूक्ष आँख द्वारा, तीक्ष्ण गुण-मुख में दुःख उत्पन्न होने से, गुरुपाक (मधुरविपाक) मल—मूत्र की प्रवृत्ति से एवं कफ से जनित वमनेच्छा होने से; लघुपाक (कटुविपाक)—मल मूत्र के अवरोध

ॐ ४१ ]

सूत्रस्थानम्

१४६

से ( विबन्ध होने से ) और वायु के प्रकोप द्वारा जाना जाता है । इस प्रकार से—पञ्चमहामृतों के समान गुणवाले द्रव्यों में—रस की विलक्षणता को जानना चाहिये । यथा—पायिष द्रव्य-मधुर एवं गुरु, जलीयद्रव्य मधुर एवं स्निग्ध होते हैं ॥ ११ ॥

भवति चात्र—

गुणा य उक्ता द्रव्येषु शरीरेष्वपि ते यथा ।

स्थानद्विद्विषयास्तस्मादेहिनां द्रव्यहेतुकाः ॥१२॥

कहा भी है—

द्रव्यों में जो ये बीस ( या इनसे अधिक ) गुण कहे हैं, ये गुण इसी प्रकार से शरीरों ( प्राणियों के देहों ) में भी हैं । इसलिये प्राणियों के शरीर में दोष, घातु, मल का अपने स्थान में रहना इनका बढ़ना अथवा इनका क्षीण होना, द्रव्यों के कारण से ही होता है ॥ १२ ॥

इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने द्रव्यविशेषविज्ञानीयो

नामैकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४१ ॥

—:—

द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

अथातो रसविशेषविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे 'रसविशेषविज्ञान' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १,२ ॥

आकाशपवनदहनतोयभूमिषु यथासङ्ख्यमेकोत्तरपरिदृष्टाः शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः, तस्मादाभ्यां रसः । परस्परसंसागतिं परस्परानुग्रहात् परस्परानुप्रवेशाच्च सर्वेषु सर्वेषां सान्निध्यमस्ति, उत्कर्षापकर्षात्तु ग्रहणम् । स खल्वान्यो रसः शेषभूतसंसर्गाद्विदग्धः षोढा विभज्यते; तथाथा—मधुरोऽम्लो लवणः कटुकस्तित्तकः कषाय इति । ते च भयः परस्परसंसर्गात्त्रिषष्टिधा भिद्यन्ते । तत्र, भूम्यन्मुगुणबाहुल्यादम्लः, तोयान्गुणबाहुल्यात्लवणः, वायवगुणबाहुल्यात् कटुकः वायवाकागुणबाहुल्यात्तित्तकः, पृथिव्यन्तिलगुणबाहुल्यात् कषाय इति ॥ ३ ॥

आकाश, वायु, अग्नि, जल और भूमि, इनमें क्रमशः एक-एक गुण की उत्तरोत्तर वृद्धि से शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये गुण होते हैं । यथा—आकाश में केवल शब्द, वायु में—शब्द और स्पर्श, अग्नि में—शब्द, स्पर्श और रूप, जल में—शब्द, स्पर्श, रूप और रस, पृथिवी में—शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध हैं, ( परस्पर एक दूसरे में प्रविष्ट हुए हैं ) । इसलिये—रस जल से उत्पन्न होता है । इन सब मृतों में परस्पर सम्बन्ध है । क्योंकि—एक दूसरों में मिले हैं, एक दूसरों का उपकार करते हैं, एक दूसरों में प्रविष्ट हुए हैं । इसलिये सब

मृतों के गुण मिलते हैं, परन्तु उत्कर्ष ( वृद्धि ) एवं अपकर्ष ( ह्रास ) द्वारा इनका ग्रहण होता है, ( वायु में स्पर्श अधिक है, आकाश में शब्द गुण अधिक है । ) यह जलीय रस अन्य मृतों के संसर्ग के कारण परिपक्व होकर छे प्रकार का हो जाता है । यथा—मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तित्तक और कषाय । और ये रस परस्पर—एक दूसरे में मिलकर तिरसठ ( ६३ ) प्रकार के हो जाते हैं । इनमें—मधुर-रस-पृथ्वी और जल गुण की अधिकता से अम्लरस-पृथ्वी और अग्नि गुण की अधिकता से, लवण रस-जल और अग्नि गुण की अधिकता से, कटुरस-वायु और अग्नि की अधिकता से, तित्तक-वायु और आकाश गुण की अधिकता से, कषाय-पृथिवी, वायु की अधिकता से उत्पन्न होता है ॥ ३ ॥

तत्र मधुराम्ललवणा वातदन्ताः, मधुरतित्तकषायाः पित्तदन्ताः, कटुतित्तकषायाः श्लेष्मदन्ताः ॥ ४ ॥

इनमें मधुर-अम्ल और लवण वायु का, मधुर, तित्तक, और कषाय पित्त का; कटु तित्तक और कषाय कफ का नाश करते हैं ॥

तत्र, वायोरारत्नैवात्मा पित्तमाग्नेयं श्लेष्मा सौम्य इति ॥ ५ ॥

इनमें वायु-वायु से ही उत्पन्न होता है, पित्त-अग्नि, से, और कफ-सोम ( जल ) से उत्पन्न होता है ॥ ५ ॥

त एते रसाः स्वयोनिवर्धना अन्ययोनिप्रशमनाश्च ॥ इनमें जो रस जिस कारण ( दोष ) से उत्पन्न होते हैं, वे उसको बढ़ाते हैं ( अपनी योनि को बढ़ाते हैं ) । और दूसरों को शान्त करते हैं ॥ ६ ॥

केचिदाहुः—अग्नीषोमीयत्वाज्जगतो रसा द्विविधाः सौम्या आग्नेयाश्च । मधुरतित्तकषायाः सौम्याः, कटुवम्ललवणा आग्नेयाः । तत्र मधुराम्ललवणाः—स्निग्धा गुरुवश्च, कटुतित्तकषाया रुक्षा लघवश्च, सौम्याः शीताः, आग्नेया उष्णाः ॥ ७ ॥

कई आचार्यों का कहना है कि—रस दो ही प्रकार के हैं, क्योंकि ( स्थावर जङ्गमात्मक ) जगत, आग्नेय और सौम्य इन दो तत्त्वों से उत्पन्न होता है, इसलिये रस भी दो ही हैं । यथा—सौम्य और आग्नेय ( स्निग्ध, गुरु, लघु, शीत, रुक्ष, उष्ण ) इनका समावेश इन्हीं दोनों में हो जाता है । इनमें—मधुर, तित्तक और कषाय सौम्य कटु अम्ल, लवण, आग्नेय, मधुर, अम्ल, लवण स्निग्ध और गुरु हैं, कटु, तित्तक कषाय रुक्ष और लघु हैं । सौम्य रस शीतवीर्य और आग्नेय रस उष्णवीर्य हैं ॥ ७ ॥

तत्र शैत्यरौद्व्यलाघववैद्यवैद्यैष्टम्यगुणलक्षणो वायुः, तस्य समानयोनः कषायो रसः सोऽस्य शैत्याच्छैत्यं वर्धयति, रौद्व्याद्रौद्व्यं लाघवालाघवं, वैश्याद् वैशर्यं, वैष्टम्यात् वैष्टम्यमिति ॥ (१) ॥

१५०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४२ ]

इनमें वायु-शीतल, रूक्ष, लघु, विशद, विष्टम्भी गुणोंवाला है। इस वायु के समान योनि ( उत्पत्तिस्थान ) वाला कषाय रस है। यह कषाय रस शीतल होने से वायु के शीत गुण को बढ़ाता है, अपनी रूक्षता से रूक्ष गुण को, अपनी लघुता से लघु गुण को, विशदता से विशदता को, विष्टम्भी होने से विष्टम्भी गुण को बढ़ाता है ॥ १ ॥

औषध्यतैश्चण्यलाघववैशद्यगुणलक्षणं पित्तं, तस्य समानयोनिः कटुको रसः सोऽस्य औषण्यादौषण्यं वर्धयति, तैश्चण्यतैश्चण्यं, रौद्याद्गौरव्यं, लाघवालाघवं वैशद्याद्देश्यमिति ॥ (२) ॥

पित्त—उष्ण, तीक्ष्ण, रूक्ष, लघु, विशद गुणवाला है। इस पित्त के समान योनिवाला 'कटु' रस है। यह रस अपनी उष्णता से उष्ण गुण को, तीक्ष्णता से तीक्ष्ण गुण को, रूक्षता से रूक्ष गुण को, लघुता से लघु गुण को, विशदता से विशद गुण को बढ़ाता है ॥ २ ॥

माधुर्यस्नेहगौरवशैत्यपैच्छिल्यगुणलक्षणः रूलेष्मणः, तस्य समानयोनिर्मधुरो रसः सोऽस्य माधुर्यान्माधुर्यं वर्धयति, स्नेहात् स्नेहं, गौरवाद् गौरव्यं, शैत्याच्छैत्यं, पैच्छिल्यात् पैच्छिल्यमिति ॥ (३) ॥

कफ—मधुर, स्नेह, गुरु, शीतल, पिच्छिल गुणवाला है। इस कफ के समान योनिवाला रस 'मधुर' रस है। यह रस अपनी मधुरता से कफ के मधुर गुण को, स्नेह से स्नेह को गौरव से गुरुता को शीतलता से शीत को और पिच्छिलता से पिच्छिल गुण को बढ़ाता है ॥ ३ ॥

तस्य पुनरन्ययोनिः कटुको रसः, स रूलेष्मणः प्रत्यनीकत्वात् कटुकत्वान्माधुर्यमभिभवति, रौद्यात् स्नेहं, लाघवाद् गौरवम्, औषण्याच्छैत्यं वैशद्यात् पैच्छिल्यमिति। तदेतन्निदर्शनमात्रमुक्तं भवति ॥३॥

अन्य योनि ( विरोधी गुण ) वाला कटु रस है और वह इस कफ के विरुद्ध गुणोंवाला है। इसलिये—कटुरस होने से मधुरता का तिरस्कार करता है। अपने रूक्ष गुण के कारण स्नेह का; लघुता से गौरव गुण का; उष्णता से शीत गुण का; विशदता से पिच्छिलता का नाश करता है। यह तो केवल उदाहरण मात्र है। इसी प्रकार पित्त की योनि के विपरीत मधुर रस पित्त का शमन करता है। "रसदोषसन्निपाते तु ये रसा येदोषैः समानगुणाः समानगुणभूमिष्व वा भवन्ति" ते तान्निवर्धयन्ति विपरीतगुणा विपरीतगुणभूमिष्व वा शमयन्ति अन्यस्यमानाः। एतद् हि व्यवस्थाहेतोः षट्वत्समुपदिश्यते रसानां त्रित्वं च दोषाणाम् ॥ चरक ॥ ८ ॥

रसलक्षणमत ऊर्ध्वं वद्यामः—तत्र, यः परितोषमुत्पादयति। तर्पयति जीवयति मुखोपलेपं जनयति रूलेष्मणं चाभिवर्धयति स मधुरः, यो दन्तहर्षमुत्पादयति मुखान्

घ्राणं जनयति श्रद्धां चोत्पादयति सोम्लः, यो भक्तुरुचिमुत्पादयति कफप्रसेकं जनयति मार्दवं चापादयति स लवणः, यो जिह्वाग्रं बाधते उद्वेगं जनयति शिरो गुह्यते नासिकां च स्नाययति मुखवैशद्यं जनयति भक्तुरुचि चापादयति हर्षं च स तिक्तः, यो वक्रं परिशोषयति जिह्वां स्तम्भयति कण्ठं बध्नाति हृदयं कर्षति पीडयति च स कषाय इति ॥ ६ ॥

इसके आगे रस के लक्षणों को कहते हैं—इनमें जो रस परितोष ( तुष्टि ) को उत्पन्न करता है, मुख उत्पन्न करता है, तृप्ति करता है, प्राणों को धारण करता है, मुख को मल से लित करता है और कफ को बढ़ाता है, वह मधुर रस है। जो रस दांतों में हर्ष ( कुण्ठता ) उत्पन्न करता है, मुख से लाला का स्नाय उत्पन्न करता है, भोजन में श्रद्धा को उत्पन्न करता है, वह अम्ल रस है और जो भोजन में रुचि उत्पन्न करता है, कफ का प्रसेक तथा मृदुता का आपादक है वह लवण रस है। जो रस जीभ के अगले भाग को पीडित करता है, नासिका से स्नाय बहाता है, वह कटु रस है। जो रस गले में खिचाव ( चूसने की तरह पीड़ा ) उत्पन्न करता है, वह तिक्त रस है। जो रस मुख को शुष्क कर देता है, जिह्वा को जड़ बना देता है, गले को रोक देता है, हृदय ( आमाशय ) को खींचता है और पीडित करता है, वह कषाय रस है ॥ ६ ॥

रसगुणान्त ऊर्ध्वं वद्यामः—तत्र, मधुरो रसो रस-रक्तमांसमेदोऽस्थिमज्जजौजःशुक्रस्तन्यवर्धनश्रद्धाध्वः केश्यो वण्यो बलकृत्सनध्यानः शोणितरसप्रसादनो बालवृद्धक्षतक्षोणहितः षट्पदपिपौलिकातामिष्टतमस्तृष्णामूर्च्छादाहश्रमनः षडिन्द्रियप्रसादनः क्रमिकफकरश्चेति; स एवं गुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेग्यमानः कासश्चासालसकवमशुश्रुद-नमाधुर्यस्वरोपघातक्रमिगलगण्डानापादयति तथाऽशुश्रुद-श्लीपदवस्तिगुदोपलेपाभिष्यन्दप्रभृतीजनयति ॥ (१) ॥

इसके आगे रस के गुणों को कहते हैं—इनमें—

मधुर रस-रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, ओज, शुक्र स्तन्य ( दूध स्त्रियों में ) को बढ़ानेवाला, आँखों वालों तथा शरीर के वर्ण के लिये—हितकारी है, बलकारक, जोड़नेवाला, रक्त-रस को स्वच्छ करनेवाला, बालक वृद्ध और क्षतक्षोण रोगों के लिये हितकारी, भौरे और चिज्जिटियों के लिये प्रियतर, तृष्णा मूर्च्छा-बाह को शान्त करनेवाला, मन समेत पाँवों जानेन्द्रियों को प्रसन्न करने वाला और क्रमियों तथा कफ को उत्पन्न करता है। यह मधुर रस उपयुक्त गुणोंवाला होने पर भी अकेला ही अधिक मात्रा में सेवन करने से—कास, श्वास, अलसक, वमन; मुख की मधुरता, स्वरमञ्ज, क्रमि, गलगण्ड रोगों को एवं अशुश्रुद, श्लीपद, वस्ती-गुदा में उपलेप ( चिप-चिपापन ) अभिष्यन्द ( नेत्र दुखना ) आदि रोगों को उत्पन्न करता है ॥ १ ॥

अ० ४२ ]

सूत्रस्थानम्

१५१

अम्लो जरणः पाचनो दीपनः पवननिग्रहणोऽनुलोमनः कोष्ठविदाही बहिःशीतः क्लेदनः प्रायशो हृद्यश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो दन्तहर्षनयन-संसीलनरोमसंवेजनकफविलयनशरीरशैथिल्यान्यापादयति तथा क्षताभिहतदग्धदृष्टभग्नरुग्णशून्यप्रच्युतावमूत्रितवि-सर्पितच्छिन्नविद्रोत्पिष्टादीनि पाचयत्याग्नेयस्वभावात् परिदहति कण्ठसुरो हृदयं चेति ॥(२)॥

अम्ल रस—आहार का पाचन करनेवाला; दोष एवं आम का पाचक, अग्निदीपक, वायु को शान्त करनेवाला, वायु-मलमूत्र का अनुलोमक, कोष्ठ में विदाह करनेवाला, बाह्य उप-चार में शीतल; क्लेदक और प्रायः हृदय के लिये हित होता है। इन गुणोंवाला होने पर भी अकेला अम्लरस ही अधिक मात्रा में सेवन करने से—दौर्ता में जड़ता, आँखों का संकोच, रोमहर्ष, कफ का विलयन ( पतलापन ) और शरीर की शिथिलता को उत्पन्न करता है। क्षत-अभिहत (चोट युक्त), दग्ध (जला हुआ), दृष्ट (डसा हुआ), भग्न, शून्य, रुग्ण, प्रच्युत (स्वलिप्त), अवमूत्रित (मूत्र विष से दूषित को), विसर्प, छिन्न-भिन्न विद्र-उत्पिष्ट आदि व्रणों को—आग्नेय स्वभाव होने से पका देता है, गला छाती और हृदय को जलाता है ॥(२)॥

लवणः संशोधनः पाचनो विश्लेषणः शैथिल्यकृदुग्गः सर्वरसप्रत्यनीको मार्गविशोधनः सर्वशरीरावयवमार्दवकरश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमासेव्यमानो गात्रकण्ठकोटशोफवैवर्ण्यपुंस्त्वोपघातेन्द्रियोपतापमुखाक्षिपाकर-कपित्तावातशोणिताम्लिकाप्रभृतीनापादयति ॥(३)॥

लवणरस—वमन-विरेचन द्वारा संशोधक, अन्न का पाचक, रस एवं मल का विश्लेषक, आहार का क्लेदक तथा शिथिल-ताकारक, उष्ण, सब रसों से विपरीत, विशेषक शरीर के सब अवयवों को कोमल करता है। इन गुणोंवाला होने पर भी अकेला लवणरस ही अधिक मात्रा में सेवन करने से—शरीर में कण्ठ, कोठ, शोफ, विवर्णता, शुक्लक्षय, इन्द्रियों—नेत्रादि का उपताप (अपने कर्मों की हानि अर्थात् शक्तिनाश), मुख-आँख का पाक; रक्तपित्त, वातरक्त, अम्लिका ( अम्लोद्गार ) को उत्पन्न करता है ॥(३)॥

कटुको दीपनः पाचनो रोचनः शोधनः स्थौल्यालस्य-कफकृमिविषकुष्ठकण्ठप्रशमनः सन्धिबन्धविच्छेदोऽवसा-दनः स्तन्यशुक्लमेदसासुपहन्ता चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो भ्रममदगलताल्लेष्ठशोषदाहसंता-पवलविघातकम्पतोदभेदकृत् करचरणपारश्वग्रभतिषु च वातशूलानापादयति ॥(४)॥

कटुरस—अग्निदीपक, आहार का पाचक, रोचक, शोधक, स्थूलता आलस्य कफ-कृमि-विष कुष्ठ-कण्ठ को शान्त करनेवाला, सन्धिबन्धों का विच्छेदक, अनुत्साह उत्पन्न करनेवाला, दूध-

शुक्ल एवं मेद को नष्ट करनेवाला है। इन गुणोंवाला होने पर भी अकेला कटुरस अधिक मात्रा में सेवन करने से—भ्रम, मद, गला तालु-ओठ की शुष्कता; गात्रसंताप बल का ह्रास कम्प-तोद भेद उत्पन्न करता है, हाथ-पाँख पार्श्व-पीठ आदि अव-यवों में वातजन्य शूलों को उत्पन्न करता है ॥(४)॥

तिक्तच्छेदो रोचनो दीपनः शोधनः कण्ठकोठतृष्णा-मूर्च्छाश्वरप्रशमनः संतन्यशोधनो विण्मूत्रक्लेदमेदोवसा-पूयोपशोषणश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्य-मानो गात्रमन्यास्तम्भाक्षेपकादितिशिरःशूलभ्रमतोदभेदच्छे-दास्यवैरस्यान्यापादयति ॥(५)॥

तिक्तरस—( कफ का ) छेदक, रोचक ( स्वयं रुचिकर न होकर भी दूसरों में रुचि उत्पन्न करनेवाला), कण्ठ कोठ-प्यास-मूर्च्छा-श्वर को शान्त करनेवाला, दूध का शोधक, मल-मूत्र-आर्द्रता-मेद-वसा-पूय को सुखानेवाला भी यह रस अकेला अधिक मात्रा में सेवन करने से—शरीर-मन्या (श्रीवा की दो शिरायें) का स्तम्भ, आक्षेप, आर्द्रित, शिरःशूल, भ्रम, तोद, मेद, छेद (विचित्र प्रकार की पीड़ा), मुख की विरसता को उत्पन्न करता है ॥(५)॥

कषायः संग्राहको रोपणः स्तम्भनः शोधनो लेखनः शोषणः पीडनः क्लेदोपशोषणश्चेति, स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपसेव्यमानो हृत्पीडास्यशोषोदराभमानवाक्यग्र-हमन्यास्तम्भागात्रस्फुरणचुमुचुमायनाकुञ्चनाक्षेपणप्रभृती -ञ्जनयति ॥१०॥

कषायरस—संग्राही, व्रणरोपक, स्तम्भक, व्रणशोधक, लेखक, शोधक, पीडक, क्लेद (आर्द्रता) को सुखानेवाला है। यही रस इन गुणों के होने पर भी अकेला अधिक मात्रा में सेवन करने पर—हृदय की पीड़ा, मुख की शुष्कता, उदर में आभमान, वाक्यग्रह (वाणी की जड़ता), मन्यास्तम्भ गात्रों में स्फुरण, चुमुचुमायन (राई के लेप की भाँति), आकुञ्चन, आक्षेप आदि उत्पन्न करता है। (वायु के विकार उत्पन्न करता है) ॥१०॥

अतः सर्वेषामेव द्रव्यण्युपदेद्यमः। तद्यथा—काको-ल्यादिः क्षीरघृतवसासज्जगालिपुष्पिकयवगोधूममाषश्चूला-दककसेरुकत्रपुसैर्वारुकर्कराकालाबूकालिन्दकतकगिलोड्य-प्रियालपुष्करबीजकाश्मर्यमधुकद्राक्षासर्जूरराजान्दन्ताल -नालिकैरेवुविकारबलातिबलात्मगुमाविदारोपयस्यागोक्षुर-कक्षीरमोरटमधूलिकाकृष्माण्डप्रभृतीनि समासेन मधुरो वर्गः। दाडिमामलकमातुलुङ्गाश्रातककपित्थकरमर्दवदरको-लप्राचीनामलकतिन्तिडीककोशाग्रकभण्यपारावतवेत्रफल्ल-कुचाम्लवेतसदनतशठदधितकसुराशुक्तसौवीरकतुषोदकधा-न्याम्लप्रभृतीनि समासेनाम्लो वर्गः। सैन्धवसौवर्चलवि-डपाक्यरोमकसासुद्रकपित्रमयवक्षारोपरप्रसृतमुवत्रिका-

१५२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४१ ]

प्रभूतीनि समासेन लवणो वर्गः । पिप्पल्यादिः सुरसादिः शिघ्रमघुशिघ्रमूलकलजन्मुखशीतजिवकृष्टदेवदारुहरेण - कावलजुजफलचण्डागुग्गलुमुस्तलाङ्गलकीशुकनासापीलुप्रभू- तीनि सालसारादिश्च प्रायजः कटुको वर्गः, अररवधादि- गर्दूच्यादिर्मण्डकपर्णीवैत्रकरीरहरिद्राद्वेन्द्रयवचरणस्वा- दुकण्टकसमप्रणबृहतीद्वयशङ्खिनीद्वयन्तीत्रिवृक्तवैधनककों- टककारवेल्लवार्ताकुकीरकरवीरसुमनःशङ्खपुष्पपामार्गज्रा- यमाणशोकरोहिणीवैजयन्तीसुवर्चलापुनर्नवावृश्चिकाली - ज्योतिष्मतीप्रभूतीनि समासेन तित्तो वर्गः । न्यग्रोधादिर- म्बष्ठादिः प्रियङ्गुवादी रोधादिच्छिफलाशल्लकीजम्बाश्र- बकुलतिन्दुकफलानि कतकजाकफलपाषाणभेदकवनस्पति- फलानि सालसारादिश्च प्रायजः कुरुवककोविदारकजीव- न्तीचिल्लीपालङ्क्यासुनिषणकप्रभूतीनि वरकादयो सुद्- गादयश्च समासेन कषायो वर्गः ॥११॥

इसके आगे सम्पूर्ण रसों के द्रव्यों को कहते हैं । यथा—

मधुरवर्ग—काकोल्यादिगण, दूध, घी, वसा, मज्जा, शालि, शाठी, जी, गेहूँ, सिंघाड़ा, कसेव, खीरा, ककड़ी, कर्करक (खरबूजा), अलाबु (तुम्बी), कालिन्द (तरबूज), कतक (निर्मली) का बीज, पियाल, पुष्करबीज (कमलगट्टा), काश्मरी (गम्भारी), मधूक (महुवा), मुनका, खजूर, राजादन (खिरनी), ताड़, नारियल, गन्ना और गन्ने के रस से बनी बस्तुयें, खरेंटी, अति- बला. कौंच के बीज, बिदारीकन्द, पयस्या (विदारीभेद), गोखरू, खीरमोरट (तुरन्त प्रसूता गाय का सात दिन तक अशुद्ध दूध अर्थात् खीस अथवा इन्तुमूल), मधुलिका (मूर्वा), कृष्माण्ड (पेठा) आदि संक्षेप में मधुरवर्ग है ।

अम्लवर्ग—अनार, आँवला, बिजौरा, आम्रतक (आमड़ा), कैय, करौंदा, वृक्ष का बेर, झाड़ी का बेर, प्राचीन आमलक (सूखा आँवला), तित्तिडीक (हमली), कोशाम्र (आम का भेद), भय्य (कमरख), पारावत (कामरूप में मधुर-अम्लरस फल), (वैत्रफल वेत का फल), लकुच (बड़हल), अम्लवेतस, दन्तशठ (निम्बु), दही, छाछ, सुरा, शुक्त, सीवीरक (काजी), तुषोदक- धान्याम्ल आदि—संक्षेप में अम्लवर्ग है ।

लवणवर्ग—सेन्धव, सोवर्चल, विड़, पाक्य (उद्भिद), रोमक (साम्भर), सामुद्रक (समुद्रजल से निष्पन्न) पक्त्रम (पाक द्वारा बनाया), यवक्षार, ऊषरप्रसूत (ऊषरलवण), सुव- चिका (सज्जीक्षार) आदि संक्षेप में लवणवर्ग है । (आदि शब्द से टक्कणक्षार तथा अन्य खारों का ग्रहण होता है) ।

कटुरस—पिप्पल्यादि, सुरसादिगण; सहजन, लालफूल का मीठा सहजन, मूली, लहसुन, सुमुख (तुलसीभेद), शीतशिव (कूर्म), कूठ, देवदारु, हरेणुका (मेथी), अवलुजाबीज, (बावची बीज) चण्डा (अजवायन के आकार का सुगन्धित द्रव्य या शङ्खपुष्पी

का भेद), गुग्गुल, नागरमोथा, लींगली (कलिहारी), शुकनासा (श्यानक), पीलु आदि, द्रव्य एवं सालसारादिगण ( प्रायः करके) कटुवर्ग है ।

तित्तकवर्ग—आरवध आदिगण, उड्डची आदिगण, मण्ड- कपर्णी, वैत्रकरीर (वैत्रांकुर), हल्दी, दासहल्दी, इन्द्रजी, वरण (वरना), स्वादुकण्टक (विकङ्कृत), सप्तर्ण (सतवन) बृहतीद्वय (छोटी-बड़ी कटेरी), शङ्खिनी (यवतिका का भेद) द्रवन्ती, त्रिवृत् (निशोथ), कृतवेधन (तुरई), ककोंटक (ककोंडा), कार- वेल्ल (करेला), वार्ताक (बैंगन), करीर, करवीर (कनेर), सुमन (जाती चमेली), शङ्खपुष्प, अपामार्ग, त्रायमाण, अशोक, रोहिणी (कटुकी), वैजयन्ती, (तर्कारी), सुवर्चला (डुल्लुलु), पुनर्नवा, वृश्चिकालि (बिच्छूटी), ज्योतिष्मती (मालकङ्कनी) आदि द्रव्य संक्षेप में तित्तकवर्ग है ।

कषायवर्ग—न्यग्रोधादि, अम्बष्ठादि, प्रियङ्गुवादि, रोधादि, त्रिफला, शल्लकी (गजभक्ष्या), जामुन, आम, मौलसरी, तिन्दुक—इन सब वृक्षों के फल, कतक (निर्मली), शाक (सहगुन), पाषाणभेद, वनस्पतियों के फल, सालसारादिगण, प्रायः कुरुवक (लालझिण्टो-कण्टसेलायक), कोविदार (कच- नार), जीवन्ती, चिल्ली (बथुवा), पालंक्या (पालक), सुनि- षणक (सूणी) आदि, नीवारक आदि कुधान्य, मूळ आदि वैदलिक (दाले)—संक्षेप में कषायवर्ग है ॥१२॥

तत्रैतेषां रसानां संयोगाच्छिषष्टिभवन्ति । तथाथा— पञ्चदश द्विकाः, विशतिच्छिकाः, पञ्चदश चतुष्काः, षट् प्रयोजनानि वक्ष्यामः ॥१३॥

इन छे रसों के परस्पर संयोग से तिरसठ (६३) भेद बन जाते हैं । यथा—दो रसों की प्रधानता से १५, तीन रसों से २०, चार रसों से १५, पाँच रसों से ६, छे रसों से एक, और एक-एक रस से छे रस । इन ६३ रसों का प्रयोजन अन्यत्र कहेंगे१ । (उत्तरतन्त्र ६३ अध्याय में इस विषय का वर्णन दिया जायगा) ॥१३॥

भवति चात्र—

जग्धाः षडधिगच्छन्ति बलिनो वश्यतां रसाः । यथा प्रकृपिता दोषा वशं यान्ति बलीयसः ॥१३॥

कहा भी है—

मधुर आदि छः ही रस खा लेने पर बलवान् (छः में जो अधिक हो) रस के 'वस—अधीन (तदनुसार कार्य करनेवाले) हो जाते हैं, जैसे प्रकृपित दोष (बलवान्

१ दोषों के परस्पर संयोग से ६३ भेद होते हैं, रसों के ये ६३ भेद भी इन भेदों के अनुसार दोषों को शान्त करते हैं। स्वस्थ अवस्था में—मिलित छे रस ही स्वास्थ्यवर्धक—उपयोगी हैं। विस्तार के लिये तथा स्पष्टीकरण के लिये, चरक में रसों का प्रकरण "यज्जपुरुषीय अध्याय" में देखिये ।

चरक सूत्र अ० २६ ।

अ० ४३ ]

२०

सूत्रस्थानम्

१५३

वांतादि दोष) वलीयान् (अधिक बलवान् = अधिक कुपित) दोष के अधीन हो जाते हैं। तात्पर्य या सचाई यह है कि संसार का कोई भी द्रव्य-(प्राकृतिक पदार्थ हरीतकी आदि) एक रस-केवल एक रसवाला नहीं है और न ज्वर आदि रोग एक दोषज-केवल बात आदि किसी भी एक (अकेले) दोष से उत्पन्न होता है, यथा-'द्रव्यमेकरसं नास्ति न रोगोऽप्येकदोषजः, संसृष्टरसभूषिष्टत्वात् द्रव्याणाम्' (च० वि० अ० ८ सू० १४२)। 'तत्र खलु अनेकरसेषु द्रव्येषु अनेकदोषात्मकेषु च। विकारेषु (रोगेषु)' (चरक वि० अ० १ सू० ६)। "तस्मान्नैकरसं द्रव्यं भूतसंघातमभवत्। नैकदोषास्ततो रोगाः तत्र व्यक्तो रसः स्मृतः॥ अव्यक्तोऽनुरसः किञ्चित्-अन्ते व्यक्तोऽपि ज्ञेयते" (अनुरसः)। (अ० ८ सू० अ० ६) तथापि—द्रव्यों को मधुर अम्ल कहा ही जाता है और वातज्वर, पितात्सार, कफकास आदि नामकरण किये ही जाते हैं। यह सब इसलिये कि-रस प्रधान या व्यक्त रस के और दोष प्रधान या बलवान् दोष के अधीन हो जाते हैं। बों समझिये कि—यदि मधुर रस का अधिक सेवन होता है तो अन्य रस अपना गुण दोष नहीं उत्पन्न कर पाते। एवमेव अन्य रसों के विषय में भी समझ लें। अलमति विस्तरेण ॥१३॥

इति श्रीशुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने रसविशेषविज्ञानीयो नाम द्वित्वारिशत्तमोऽध्यायः ॥४२॥

त्रित्वारिशत्तमोऽध्यायः

अथातो वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानिनीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे 'वमनद्रव्यविकल्पविज्ञानीय' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने मुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

वमनद्रव्याणां फलादीनां मदनफलानि श्रेष्ठतमानि भवन्ति। अथ मदनपुष्पाणामातपपरिशुष्काणां चूर्णप्रकृच्छं प्रत्यकपुष्पीसदापुष्पीनिम्बकषायानामन्यतमेनालोड्यमधु-सैन्धवयुक्तां पुष्पचूर्णमात्रां पाययित्वा वामयेत् मदनश-छादुचूर्णान्येवं वा बकुलरम्यकोपयुक्तानि मधुलवणयुक्ता-न्यभिपतमानि, मदनशछादुचूर्णसिद्धां वा तिलतण्डुल्य-वागूम्। निर्वृत्तानां वा नातिहरितपाण्डुनां कुगगृढावव-द्वमृदोमयप्रल्लिप्तानां यववृ (तु) षमुद्रमाषगाल्यादिधान्यरा-ग्रावष्टरात्रोषितकिन्नभिन्नानां फलानां फलपिपळीरूदधु-त्यातपे शोषयेत्, तासां दधिमधुपल्लविसृदितपरिशु-ष्काणां सुभाजनस्थानान्मन्तर्नखमुष्टिमुष्णे यष्टिमधुककषाये कोविदारादीनामन्यतमे वा कषाये प्रमूद्य रात्रिपर्युषितं मधुसैन्धवयुक्तमाशीर्भिरभिमन्त्रितमुदङ्मुखः प्राङ्मुखमा-तुरं पाययेद्देनं मन्त्रेणाभिमन्त्र्य—

"ब्रह्मदक्षाभिस्त्रेन्द्रभूचन्द्रार्कान्तठानिलाः। ऋषयः सोषधिप्रामा भूतसंवाश्च पान्तु ते ॥१॥ रमायनमिवर्षाणां देवानाममृतं यथा। सुषेवोत्तमतागानां भैषज्यमिदमस्तु ते ॥२॥"

विशेषेण श्लेषमज्वरप्रतिशयान्तविद्रधिषु, अप्रवर्त-माने वा दोषे पिपळीवचागौरसर्षपकलकोनिमश्रैः सलवणे-रुष्णाभ्युधिः पुनः पुनः प्रवर्त्तयेदासभ्यग्वान्तलक्षणान्नि। सदनफलमज्जचूर्णं वा तत्कषाथपरिभावितां मदनफलकषा-येण, मदनफलमज्जसिद्धस्य वा पयसः सन्तानिकां श्वोद्व-युक्तां, मदनफलमज्जसिद्धं वा पयः, मदनफलमज्जसिद्धेन वा पयसा यवागूम्, अधोभागासूक्ष्पितहृद्वाहयोः, मदनफ-लमज्जसिद्धस्य वा पयसो दधिभावसुपगतस्य दध्युत्तरं दधि वा कफप्रसेकच्छदिर्मूलात्मकेषु मदनफलमज्जरसं स्नेहं वा भक्ष्यातकस्नेहवदादाय फाणितीभूतं लेहयेत्, आतपपरिशुष्कं वा तमेव जीवन्तीकषायेण, पित्ते कफ-स्थानगते, मदनफलमज्जकषाथं वा पिपल्यदादिप्रतीवापं, तच्छूर्णं वा निम्बरूपिकाकषाययोरन्यतरेण संतर्पणकफज-व्याधिहरं मदनफलमज्जचूर्णं वा मधुककार्मर्यद्राक्षाकषा-येण। मदनफलविधानमुक्तम् ॥३॥

मदनफल, कुटज, जीमूतक, इच्चाकु आदि वमनद्रव्यों में मैनफल सब से श्रेष्ठ है। मैनफल के फूलों को धूप में सुखाकर इनका चूर्ण कर लेना चाहिये। इसके चूर्ण की उपयुक्त मात्रा को प्रत्यकपुष्पी (अपामार्ग), या सदापुष्पी (आक), या नीम के कषाय में घोलकर तथा मधु और सैन्धव नमक मिलाकर (मैन-फल के चूर्ण की उपयुक्त मात्रा) पिलाकर वमन करना चाहिये। मैनफल के कच्चे फल के चूर्ण को भी इस प्रकार अथवा बकुल (मौलसरी), महानिम्ब (बकायन) के चारगुना कषाय में घोल-कर, मधु और सैन्धव-(नतुथीरा) मिलाकर; गरम करके पिलाना चाहिये। मैनफल के कच्चे फल के चूर्ण में सिद्ध की हुई तिल एवं चावलों की यवागू (लप्सी) पिलानी चाहिये। और जो मैनफल के फल बिल्कुल पक गये हों, बहुत हरे या पीले न हों, उनको कुशा से बने सम्पुटों में—बन्द करके ऊपर से मिट्टी या गोबर का लेप कर देना चाहिये। इनको अब जो, तुष, मूक, माष, शालि आदि धान्यों के ढेर के अन्दर आठ दिनों तक रखना चाहिये। जब फल नरम होकर फूट जायें, तब इनके बीजों को (फल-पिपळी) निकालकर धूप में सुखाना चाहिये। इन बीजों को दधि, शहद, पल्ल (तिल का चूर्ण), इनके साथ मलकर सुखाना चाहिये। इनको एक उत्तम पात्र में रखना चाहिये। इनमें से एक सुडी भर (नखों को अन्दर रखकर सुडी में जितने आ जायें), चूर्ण को मुलहठी के उष्ण कषाय में अथवा कोविदारादि (संशोधनसंशयनीय ग्यारह कषायों में से)

१५४

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४३ ]

किसी एक कषाय में मिलाकर (मथकर) रात भर भिगोकर—प्रातःकाल इसमें मधु तथा सैन्यवनमक मिलाकर आशीर्वाद-परक मन्त्रों से अभिमन्त्रित करके वैद्य उत्तर दिशा में अपना मुख करके, रोगी का मुख पूर्व दिशा की ओर करके औषध पिलाये। अभिमन्त्रित करने का मन्त्र (मूल में है) का अर्थ यह है।

“ब्रह्मा-दक्ष-अश्विनी-रुद्र इन्द्र-पृथ्वी-चन्द्र-सूर्य-अग्नि एवं वायु, औषधिसमूह ऋषि-लोग, भूतसमूह तेरी रक्षा करें। जिस प्रकार ऋषियों के लिये रसायन, देवताओं के लिये अमृत, नागों के लिये जिस प्रकार सुधा है, उसी प्रकार वह औषध तेरे लिये हो।”

विशेष करके उपयुक्त योग कफज्वर, जुकाम और अन्तर्विद्रधि इनमें देने चाहिये।

इन योगों से यदि दोष प्रवृत्त (बाहर) न हों, तब-पिप्पली, वज्र, श्वेत सरसों इनके कल्क को नमक-मिश्रित तुषोदक के साथ बार-बार पिलाना चाहिये। यह कार्य तबतक करते रहना चाहिये, जब तक वमन भली प्रकार से न हो, भली प्रकार से वमन होने के लक्षण स्पष्ट न हों, मैनफल की मज्जा के चूर्ण को मैनफल के क्वाथ से भावना देकर मैनफल के कषाय के साथ पिलाना चाहिये। मैनफल की मज्जा द्वारा सिद्ध दूध की मलाई को शहद में मिलाकर देना चाहिये। मैनफल की मज्जा द्वारा सिद्ध दूध देना चाहिये। मैनफल की मज्जा द्वारा सिद्ध दूध में बनी यवागू (लप्सी) को अधोगामी रक्त-पित्त में हृदय के दाह में देना चाहिये। मैनफल को मज्जा द्वारा सिद्ध दूध से दही जमाकर, दही की मलाई को अथवा दही को ही, कफखाव, वमन, मूर्च्छा, तमक (शवास) में पिलाना चाहिये। मैनफल की मज्जा के रस को अथवा स्नेह (तेल) को, मिलावे के तैल के समान निकालकर; पकाने से रात्रि की भांति होने पर चटाना चाहिये। (मिलावे के तैल की विधि ‘द्विब्रणीय’ अध्याय में कही है) जब पित्त कफ के स्थान में पहुँचा हो तो मैनफल की मज्जा के चूर्ण को धूप में सुखाकर जीवन्तीकषाय के साथ पिलाना चाहिये। मैनफल की मज्जा के क्वाथ में पिप्पल्यादिगण की औषधियों का प्रक्षेप देकर मदनफलमज्जा के चूर्ण को नीम, रूपिका (आक), इनमें से किसी एक के कषाय के साथ संतर्पण एवं ककजन्त्य रोगों में देना चाहिये। अथवा मैनफल की मज्जा के चूर्ण को सुलहटी, गाभारी, द्राक्षा के कषाय के साथ देना चाहिये। मदनफल के ये इकतीस प्रयोग कह दिये हैं ॥३॥

१ वमन में मधु का गरम बस्तुओं से निषेध नहीं। यथा—सर्वेषु तु मधु सैन्धवं कफबिलयनच्छेदायं वमनेषु विदध्यात्। न चोष्णविरोधो मधुनः छर्दनयोगयुक्तस्य, अविष्ववप्रत्यागमनात् दोष-निर्हरणाच्च ॥ चरक।

जीमूतककुसुमचूर्ण पूर्ववदेव क्षीरेण, निर्वृत्तेषु क्षीर-यवागू, रोमशेषु सन्तानिकां, अरोमशेषु दध्युत्तरं हरित-पाण्डुषु दधि, तत्कषायसंमृद्धा वा सुरां कफारोचककास-श्वासपाण्डुरोगयदमसु. पर्यागतेषु मदनफलमज्जवदुपयोगः।

जीमूतक (देवदाली) के फूलों का चूर्ण पूर्व की भांति (अपमार्ग-आक के रस में भिगोकर) या दूध के साथ पिलाना चाहिये। निर्वृत्त (जात मात्र-छोटी अवस्था के) फलों को दूध की लप्सी के साथ, रोमश (कठिनावस्था) के फलों को दूध मलाई के साथ, अरोमश (बहुत बड़े उत्तम), फलों को दही की मलाई के साथ, हरे पीले फलों को दही के साथ, जीमूतक कषाय के साथ सुरा को मिलाकर, कफ, अरोचक, कास, शवास, पाण्डुरोग, यदमा रोग में देना चाहिये। हरे-पीले जीमूतक के फूल न मिलने पर मदनफल की मज्जा के समान जीमूतकफल की मज्जा का उपयोग करना चाहिये ॥४॥

तद्वदेव कुटजफलावधानम् ॥४॥

जीमूतक की भांति कूड़े के फलों का भी उपयोग करना चाहिये ॥५॥

कृतवेधनानामप्येष एव कल्पः ॥६॥

कुटजफल की भांति कृतवेधन (कड़वी तुरई) की भी यही विधि बरतनी चाहिये ॥६॥

इत्वाकुकुसुमचूर्णं वा पूर्ववत्, एवं क्षीरेण, कास-श्वासच्छर्दिकफारोगेपूपयोगः ॥७॥

इत्वाकु (कड़वी तुम्भी) के फूलों को दूध के साथ तथा मैनफल की भांति—(कुटज और कृतवेधन की भांति नहीं), कास, शवास, छर्दि, कफ रोगों में बरतना चाहिये ॥७॥

धामार्गवस्यापि मदनफलमज्जवदुपयोगः विशेषतस्तु गरगुल्मोदरकासश्वासस्नेहसामयेषु वायौ च कफस्थानगते॥

धामार्गव (पीले फूल की कड़वी तोरी) का भी मदनफल की मज्जा के समान ही (पुष्प, शलाट, क्षीर, सुरा) उपयोग करना चाहिये। विशेषतया-गर, गुल्म, उदर, कास, शवास, कफरोगों में अथवा कफ-स्थान में वायु के पहुँचने पर प्रयोग करना चाहिये ॥

कृतवेधनफलपिप्पलीनां वमनद्रव्यकषायपरिपीतानां बहुगुञ्जूर्णमुत्पलादिषु दत्तमाघ्रातं वामयति, तत्त्वनवबद्ध

१ सुरा-विधान—जीमूत के क्वाथ में उड़द पकाना चाहिये, जीमूत के क्वाथ से ही घात्य—चावल का प्रक्षालन करना चाहिये, माष और घात्य-चावलों को कूटकर मिला देना चाहिये। इनकी सुखाकर, दूसरे घात्य-चावलों को जीमूत-क्वाथ के साथ पीसकर थोड़ा-सा गरम कर लेना चाहिये। इन सब के तीन भाग, किंश भाग चौथा, सन्धान के लिये भाङ्गीक्वाथ-इन सब को एक पात्र में रखने से सुरा बन जाती है। यह पैंष्टिक सुरा है, इसलिये इसमें व तो गुड़ पड़ता है और न मधु। कई वैद्य गुड़ डालते हैं।

३० ४४ ]

सूत्रस्थानम्

१५५

दोषेषु यवागूमाकण्ठाप्तीतवस्तु च विदध्यात् । वमनविरेचनशिरोविरेचनद्रव्याण्येवं वा प्रधानतमानि भवन्ति ॥

कृतवेषन ( कडुवी तुरई ) के बीजों को वमनद्रव्यों के कषाय से कई बार भावना देकर उत्पल ( कुमुद, पुण्डरीक सौगन्धिक ) आदि कमलों पर फैलाकर सूँघने से वमन होता है । यह क्रिया उस समय करनी चाहिये, जब कि दोष बहुत अधिक बढे हों, उस समय गले तक ( पेट भरकर ) यवागू पिलाकर वमन कराना चाहिये । वमन, विरेचन, शिरोविरेचन आदि द्रव्य इस प्रकार से ( द्रव्य वमनादि कषायों से ) भावना देने पर अधिक वीर्यशाली हो जाते हैं । यहाँ पर कषाय की जगह ( स्वरस ) द्वारा भावना देने से अधिक गुण होता है ॥

भवतश्चात्र—

वमनद्रव्ययोगानां दिगिंयं संप्रक्रीतिता ।

तान् विभेद्य यथाव्याधि कालशक्तिविनिश्चयात् १०

कषायैः स्वरसैः कल्केक्षुण्णैरपि च बुद्धिमान् ।

पेयलेद्याद्यभोज्येषु वमनान्युपकल्पयेत् ॥ ११ ॥

कहा भी है—

वमन, द्रव्यों के योगों का निर्देश मात्र यहाँ कर दिया है । समय एवं शक्ति का विचार करके वमनद्रव्यों का विभाग करके प्रयोग करना चाहिए । कषाय ( श्रुत, शीत, फाण्ट ) से स्वरस ( यंत्रादि द्वारा पीड़ित स्वरस ) से, कल्क ( पत्थर पर पीसकर ), चूर्णों से, पेय, लेद्य, पूरी आदि वस्तुयें बनाकर वमनार्थ खाने को देनी चाहिये ॥ १०, ११ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने वमनद्रव्यविकल्पविज्ञा-

नीयो नाम चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः ॥ ४३ ॥

चतुश्चत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

अथातो विरेचनद्रव्यविकल्पविज्ञानौन्यमध्यायं ऽध्या- ख्यामः ॥ १ ॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

इसके आगे 'विरेचन-द्रव्य-विकल्प-विज्ञानौन्य' नामक अध्याय की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥

अरुणाभं त्रिवृन्मूलं श्रेष्ठं मूलविरेचने ।

प्रधानं तिल्वकस्त्वन्तु फलेष्वपि हरीतकी ॥ ३ ॥

तैलेष्वेरण्डजं तैलं स्वरसे कारवेक्षिका ।

सुधापयः पयःसूक्तमिति प्राधान्यसंग्रहः ।

तेषां विधानं वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ॥ ४ ॥

मूलविरेचनों में लाल रंग की ( थोड़ी लाल ) निशोथ की जड़ श्रेष्ठ है । त्वचों में तिल्वक की छाल श्रेष्ठ है । फलविरेचनों

में हरीतकी का फल श्रेष्ठ है । तैलों में एरण्डतैल श्रेष्ठ है । स्वरसों में कारवेल्क ( करेला ) का स्वरस श्रेष्ठ है । दूधों में स्तुही का दूध उत्तम है, ये श्रेष्ठ द्रव्य हैं । इन निशोथ आदि द्रव्यों की विधि क्रमशः यथाविधि कहते हैं ॥ ३, ४ ॥

वैरेचनद्रव्यरसानुपीतं मूलं महत्त्रैवृतमस्तदोषम् ।

चूर्णाकृतं सैन्धवनागराख्यमस्तैः पिबेन्मारुतरोगजुष्टः ॥

त्रिवृत को महान् एवं कृमि आदि दोष रहित चिकनी जड़ की त्रिवृत आदि विरेचन द्रव्यों के रस से भावना देकर, इसका चूर्ण करा लेना चाहिये । इस चूर्ण में चतुर्थांश सैन्धव नमक और सोंठ मिलाकर—अनारदाना या बिजोरे निम्बू आदि खट्टे द्रवों के साथ, वायुरोग से पीड़ित मनुष्य को ( छै मासे ) पिलाना चाहिये ॥ ५ ॥

इक्षोर्विकारैर्भुंरै रसैस्तत् पैंते गदे क्षीरयुतं पिबेच्च ।

गुड्च्यरिष्टत्रिफलाख्येन सन्धोषमूत्रं कंकजे पिबेत्तत् ॥ ६ ॥

पैतिक रोग में—विरेचनार्थ—निशोत के चूर्ण को—खण्ड, गुड् आदि के पानक ( शर्बत ) अथवा दाख, मुनका आदि के मीठे रसों अथवा दूध के साथ पीना चाहिये अर्थात् चूर्ण फाँककर ऊपर से उक्त द्रव पीना चाहिये । कंकज रोग में—विरेचनार्थ—गिलोय, नीम अथवा त्रिफला के रस के साथ अथवा त्रिकुट चूर्ण मिश्रित गोमूत्र के साथ पीवे ॥ ६ ॥

त्रिवर्णकञ्च्युषण्युक्तमेतद् गुडेन लिह्यादनधेन चूर्णम् ।

प्रस्थे च तन्मूलरसस्य दत्त्वा तन्मूलकल्कं कुड्वभ्रमाणम् ॥

कर्षोन्मिते सन्धवनागरे च विपाच्य कल्काकृतमेतद्वात् ।

तत्कल्कभागः समहौषधार्धः ससैन्धवो मूत्रयुतश्च पेयः ८

विरेचनार्थ—दालचीनी, बड़ी इलायची, तंजपत्ता, सोंठ, मरिच पीपल १-१ तोला, निशोत का चूर्ण ६ तो० सबको मिलाकर रख लो, मा० ४-८-१२-१६ आना भर, पुराना गुड् चूर्ण से दुगुना मिलाकर चाट लेवे । अथवा चूर्ण से द्विगुण गुड् की चासनी में उक्त चूर्ण मिला अवलेह बनाकर १ तोला खावे अथवा निशोत की जड़ ( की छाल ) का स्वरस १ प्रस्थ ( ६४ तो० ), निशोत का कल्क १ कुड्व ( १६ तो० ) सैन्धव लवण तथा सोंठ १-१ तोला सब को एक साथ पकाकर कल्क जैसा हो जाने पर उचित मात्रा में खावे । अथवा—निशोत का कल्क १ भाग, सोंठ आधा भाग और लवण आधा भाग मिलाकर—गोमूत्र के साथ पीवे ॥ ७, ८ ॥

समाखिबुत्रागरकाभ्याः स्थुर्भागाधर्कं पूगफलं सुपकम् । विडङ्गसारो मरिचं सदार्ण्योगः ससिन्धुद्रवमूत्रयुक्तः ॥ ९ ॥

१ अस्तदोष का अर्थ—कविराज हाराणचन्द्र जी ने, 'कार्क' श्यादि दोष रहित' किया है । महत् का अर्थ—गम्भीर किया है । जैसा कि चरक में पाठ है—'गम्भीरानुगतं रक्षणम्' ।

१५६

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४४ ]

निशोथ, सोंठ, हरङ्ग ये तीनों परस्पर समान भाग, भली प्रकार पकी सुगारी का फल आधा भाग ( निशोथ का ), वाय-विडङ्ग के बीज; मरिच; देवदारु और सैन्धानमक; इनमें प्रत्येक द्रव्य सोंठ के बराबर मिलाकर गोमूत्र के साथ पीना चाहिये ॥ विरेचनद्रव्यभवं तु चूर्ण रसेन तेषां भिषजा विमृद्य । तन्मूलसिद्धेन च सर्पिषाऽऽक्तं सेव्यं तदाज्ये गुटिकीकृतं वा

विरेचन द्रव्यों के चूर्ण को ( त्रिहृतादि के चूर्ण को ), इन्हीं त्रिहृतादि विरेचनद्रव्यों के रस के साथ पीसकर, त्रिहृत-मूल द्वारा सिद्ध घृत के साथ गोली बनाकर खाना चाहिये । बलवान् पुरुष में मात्रा एक कर्ष ( १ तोला ) है ॥ १० ॥

गुडे च पाकाभिमुखे निधाय चूर्णाकृतं सम्यगिदं विपाच्य ।

शीतं त्रिजाताक्तमथो विमृद्य योगानुरुपा गुटिकाः प्रयोज्याः ॥ ११ ॥

मोदकपाक की विधि से चूर्ण से दुगुने गुड़ का पाक करना चाहिये, जब गुड़पाक के करीब हो तब इसमें निशोथ का चूर्ण ( गुड़ से आधा ) मिलाना चाहिये । जब ठण्डा हो जाये तो सुगन्ध के लिये त्रिजातक ( दालचीनी, इलायची, तेजपत्ता ) मिलाकर, गोलियाँ बना लेनी चाहिये । मात्रा—उचितमात्रा में देनी चाहिये ॥ ११ ॥

वैरेकीयद्रव्यचूर्णस्य भागं

सिद्धं साधं क्वाथभागेक्षतुभिः ।

आमृदनीयात् सर्पिषा तच्छुतेन

तत्क्वाथोष्मस्वेदितं सामितं च ॥ १२ ॥

पाकप्राप्ते फाणिते चूर्णितं तत्

क्षिप्तं पक्वं चावतार्य प्रयत्नात् ।

शीतीभूता मोदका हृद्यगन्धाः

कार्यास्त्वेते भक्ष्यकल्पाः समाप्तात् ॥ १३ ॥

निशोत का चूर्ण १ भाग, निशोत का क्वाथ ४ भाग, दोनों को एक साथ पकाओ और निशोत के कल्क एवं क्वाथ के योग से सिद्ध घृत का मोहन डालकर रोहूँ के मैदा को मलो, फिर निशोत के क्वाथ में स्वेदित कर लो, फिर दोनों को राव (खण्ड) की परिपक्व चासनी में मिलाकर तत्काल अनि पर से उतार लो और शीतल होने पर उसमें सुगन्ध के लिये दालचीनी; इलायची तथा तेजपत्ता का चूर्ण थोड़ा सा मिलाकर मोदक बनालो । यह मोदक एक प्रकार की मिठाई ( भक्ष्य ) जैसे होते हैं—खाने में स्वाद । रोहूँ के मैदा का नाम “समिता” है और समिता से बना पदार्थ “सामित” कहलाता है उदा-हरण—मैदा का हलुवा आदि पदार्थ “सामित” होता है ॥

रसेन तेषां परिभाष्य मुद्गान्

यूषः ससिन्धूद्रवसर्पिरिष्टः ।

वैरेचनेऽन्यैरपि वैदलेः श्या-

देवं विदध्यद्भ्रमनौषधैश्च ॥ १४ ॥

यूषविधि—मूँग को त्रिहृत आदि विरेचन द्रव्यों के रस की भावना देकर, इसमें घी और सैन्धानमक मिलाकर यूष तैयार करना चाहिये । इस प्रकार से मखर आदि अन्य विदलों से भी यूष बनाना चाहिये । इसी प्रकार वमनादि औषधियों से भी यूष तैयार करना चाहिये ॥ १४ ॥

भिरूवा द्विषेभ्यं परिलिप्य कल्कैच्छि-

भण्डिजातैः प्रतिबध्य रञ्ज्वा ।

पक्वं च सम्यक् पुटपाकयुक्त्या

खादेत्तं तं पित्तगदी सुशीतम् ॥ १५ ॥

एक गन्ने को बीच से चीरकर इसमें त्रिभण्डी ( निशोथ ) के कल्क को भरकर पुनः एक रस्सी से बाँध देना चाहिये । इसके ऊपर निशोथ आदि के पत्ते लपेटकर ऊपर से कीचक का लेप करके अङ्गारों में पुटपाक—विधि से पकाना चाहिये । जब कीचक पक जाये तब इसको निकालकर, ठण्डा होने पर, पित्तरोगी को खाने के लिये देना चाहिये ॥ १५ ॥

सिताजगन्धात्क्कक्षीरीविदारीत्रिहृतः समाः ।

लिहोन्मधुघृताभ्यां तु रुद्वदाहव्वरशान्तयोः ॥ १६ ॥

सिता ( शर्करा ), अजगन्धा ( वनयवानी ), त्वक्क्षीरी ( वंशलोचन ), विदारीकन्द, और निशोथ इनको समान मात्रा में मिलाकर, घी और शहद के साथ ( असमान अनुपात से ) चाटना चाहिये । इससे प्यास, दाह और ज्वर शान्त होता है ॥

शर्कराक्षौद्रसंयुक्तं त्रिवृच्छूर्णावचूर्णितम् ।

रेचनं सुकुमारोणां त्वक्पत्रमरिचार्शकम् ॥ १७ ॥

पचेल्लेहं सितार्क्षौद्रपलार्धकुडवान्वितम् ।

त्रिवृच्छूर्णयुतं शीतं पित्तधनं तद्विरेचनम् ॥ १८ ॥

त्रिहृत के चूर्ण को शर्करा और शहद में त्वक ( दालचीनी ), पत्र ( तेजपत्ता ), मरिच इनको चतुर्थांश मिलाकर चटाने से कोमल प्रकृतिबालों को विरेचन हो जाता है । शर्करा एक पल ( चार तोले ), मधु आधा कुडव ( ८ तोले ) लेकर उसमें त्रिहृतचूर्ण चतुर्थांश ( ५ तोले ) डालें, ( शर्करा की पानी में मिलाकर चास बनाकर इसमें निशोथ का चूर्ण मिलाया चाहिये । पाकाभिमुख होने पर इसमें दालचीनी आदि आर्यशयकतानुसार मिलाया चाहिये । शीतल होने पर शहद मिलाया चाहिये ) । यह लेह विरेचक एवं पित्तनाशक है ॥ १७, १८ ॥

त्रिवृच्छयामांक्षारशुण्ठीपिप्पलीमधुनाऽऽनुयात् ।

सर्वश्लेष्मविकारोणां श्रेष्ठमेतद्विरेचनम् ॥ १९ ॥

त्रिहृत ( निशोथ ), श्यामा ( विधारा ), क्षार ( यवक्षार), सोंठ और पिप्पली, इनके चूर्ण को शहद से तर करके

अ० ४४ ]

सूत्रस्थानम्

१५७

चाटना चाहिये । सब प्रकार के कफरोंगों में यह उत्तम विरेचन है ॥१९॥

बीजाक्षपथ्याकाइमर्थधात्रीदाडिमकोलजान् ।

तैलभृष्टान् रसानम्लफलैरावाप्य साधयेत् ॥२०॥

घनोभूतं त्रिसौगन्ध्यत्रिवृक्षौद्रसमन्वितम् ।

लेह्यमेतत्कफप्रार्थैः सुकुमारैर्विरेचनम् ॥२१॥

बीजाक्षपथ्या (पकी बीजवाली हरड), कारमरी (गम्भारी),

धात्री, (आईवला), दाडिम (अनार) कोल (बेर) इनको एरण्ड-तैल में मूनकर, बिजौर आदि खड़े फलों के रस में इनको पकाना चाहिये । जब कफ हो जाये तब इनमें दालचीनी, इलायची, तेजपात सुगन्धि के लिये तथा निशोथ एवं शहद मिलाकर चाटना चाहिये । तैलमात्रा इतनी होनी चाहिये, जिसमें सुन जाये । क्वाथ के लिये जल हरड से सोलह गुणा, बिजौर का रस क्वाथ से चतुर्थीश, त्रिवृत्त और शहद प्रत्येक लेह का चतुर्थीश । यह लेह कफबहुल सुकुमार रोगियों के लिये विरेचन है ॥२०, २१॥

नीलीतुल्यं त्वगेलं च तैछिद्युत्ससितोपला ।

चूर्णं संतर्पणं क्षौद्रफलांम्लं सन्निपातनुत् ॥२२॥

नीली (नील की जड़ की त्वचा) के समान मिलित दालचीनी और इलायची, इनके वराबर शर्करामिश्रित निशोथ का चूर्ण मिलाकर इसमें मधु और अनार का रस मिलाकर बनाया संतर्पणं सन्निपातनाशक है । सन्निपात रोग अच्छा होने पर उपद्रव शान्ति के लिये देना उत्तम है ॥२२॥

त्रिवृच्छ्यामासिताकृष्णात्रिफलामाक्षिकैः समैः ।

मोदकाः सन्निपातोऽर्ध्वरक्तपित्तव्यरापहाः ॥२३॥

निशोथ, श्यामा (विधारा), खिता (मिश्री), कृष्णा (पिप्ली), त्रिफला और माक्षिक (मधु), इनको समान भाग लेकर लड्डू बना लेने चाहिये । ये विरेचन लड्डू—सन्निपात, ऊर्ध्वरक्तपित्त तथा खरनाशक है ॥२३॥

त्रिवृद्धागाख्यः प्रोक्ताक्षिफला तत्समा तथा ।

क्षारकृष्णाविडङ्गानि संचूर्ण्यै मधुसर्पिषा ॥२४॥

लिह्याद् गुडेन गुटिकाः कृत्वा वाऽप्यथ भक्षयेत् ।

कफवातक्रुतान् गुल्मान् प्लीहोदरहलीमकान् ॥२५॥

हन्त्यन्यानपि चाप्येतत्त्रिरपायं विरेचनम् ।

निशोथ तीन भाग, त्रिफला (हरड, बहेडा, आईवला) तीन भाग, क्षार (यवक्षार), कृष्णा (पिप्ली), विडङ्ग (वायविडङ्ग), इनका चूर्ण भी तीन भाग लेकर घी और शहद में मिलाकर अथवा गुड में गोली बॉधकर खाना चाहिये । इससे कफ एवं वायुजन्य गुल्मरोग, प्लीहा, उदर, हलीमक रोग नष्ट होते हैं । यह उपद्रवरहित विरेचन है ॥२४, २५॥

चूर्णं श्यामा त्रिवन्नीली कटुवी मुस्ता दुरालभामा ॥२६॥

चक्ष्येन्द्रवीजं त्रिफला सर्पिर्मांसरसान्बुभिः ।

पीतं विरेचनं तद्धि रूक्षाणामपि अक्ष्यते ॥२७॥

श्यामा (विधारा), त्रिवृत्त (निशोथ), नील, कटुवी (कटुकी), मुस्ता (मोथा), दुरालभामा (धमासा), चक्ष्य (चविका), इन्द्रवीज (इन्द्रजौ), त्रिफला, घी, इनको मांसरस के साथ साथ देने से रूक्ष शरीरवाले पुरुष को भी विरेचन होता है । (स्निग्ध पुरुषों को त्रिफला तक औषधियों का चूर्ण पानी के साथ देना चाहिये) ॥

वैरेचनिकनिःकाथभागः शीताख्यो मताः ।

द्वौ फाणितस्य तच्चापि पुनरननावधिश्चयेत् ॥२८॥

तत् साधुसिद्धं विज्ञाय शीतं कृत्वा निधापयेत् ।

कलसे क्रुतसंस्कारे विभज्यतु हिमाहिमौ ॥२९॥

मासादूर्ध्वं जातरसं मधुगन्धं वरासवम् ।

पिवेदसावेव विधिः क्षारमूत्रासवेष्टवपि ॥३०॥

वैरेचनिक (निशोथादि) के शीतल क्वाथ के तीन भाग, फाणित (राब) के दो भाग, इनको मिलाकर फिर आग पर रखना चाहिये । जिस समय भली प्रकार पक जाये (आधा रह जाये) तब शीतल करके, अन्दर से घुले एवं मधु-पिप्ली से लिप्त तथा अगुह से धूपित मटके में डालकर, उष्ण श्रुतु में एक पक्ष, शीत श्रुतु में एक मास तक धान्यराशि में रख देना चाहिये । जब एक मास बीत जाये, रस निकल आये और मद्य की सी गन्ध आने लगे तब इस आसव को पीना चाहिये । क्षार, मूत्र आदि आसवों में भी यही विधि बरतनी चाहिये ॥

वैरेचनिकमूलांनां काथे माषान् सुभावितान् ।

सुधौतांतस्तकपायेण शालीनां चापि तण्डुलान् ॥३१॥

अवबुधैकतः पिण्डान् कृत्वा शुष्कान् सुचूर्णितान् ।

शालितण्डुलचूर्णं च तत्काषायोऽभसाधितम् ॥३२॥

तस्य पिष्टस्य भागांशोन् किण्वभागविमिश्रितान् ।

मण्डोदकार्थं कार्यं च दद्यात्तस्सर्वमेकतः ॥३३॥

निदध्यात्कलसे तां तु सुरां जातरसां पिवेत् ।

एष एव सुराकल्पो वमनेष्वपि कीर्तितः ॥३४॥

वैरेचनिक निशोथादि द्रव्यों के क्वाथ में उड्डव (की दाल) को अच्छी प्रकार से भावना देनी चाहिये । शालिधान्यों के चावलों को भी वैरेचनिक द्रव्यों के क्वाथ से भली प्रकार धोना चाहिये । इन दोनों को मिलाकर कूटना चाहिये । गीले होने से जब गोला-पिण्ड-सा बन जाये, तब इनको सुखाना चाहिये । वैरेचनिक द्रव्यों के क्वाथ की उष्णमा से धान्य के चावलों को पूथक पकाना चाहिये । उपर्युक्त चूर्ण के तीन भाग और किण्व का एक भाग, इनको मिलाकर, मण्ड पानी के लिये विरेचनद्रव्यों का क्वाथ मिलाना चाहिये । इनको एक पात्र में रख देना चाहिये । जब रस उत्पन्न हो जाय तब इस

१ "हिवा दिवातपे शुष्कं रात्री रात्री निवासयेत् ॥"

१५८

मुमुक्षुसहिता

[ अ० ४५ ]

सुरा को पीना चाहिये । यही सुराकल्पविधि वमन औषधियों में भी बरतनी चाहिये ॥३१-३४॥

मूलाणि त्रिवृदादीनां प्रथमस्य गणस्य च ।

महतः पञ्चमूलस्य मूर्वाशाङ्कघ्योरपि ॥३५॥

सुधां हैमवतीं चैव त्रिफलातिविषे वचाम् ।

संहृत्यैतानि भागौ द्वौ कारयेदेकमेतयोः ॥३६॥

कुर्यान्निरःकाथमेकस्मिन्नेकस्मिन्धूर्णमेव तु ।

लुण्णांस्तस्मिंस्तु निःकाथे भावयेद्द्वहुग्रो यवान् ॥३७॥

शुष्काणां मृदुभृष्टानां तेषां भागाद्ययो सताः ।

चतुर्थं भागमावाप्य चूर्णानामत्र कीर्तितम् ॥३८॥

प्रक्षिप्य कलशे सम्यक् ततस्तं तदनन्तरम् ।

तेषामेव कषायेण शीतलेन सुयोजितम् ॥३९॥

पूर्ववत् सन्नन्दध्यात्तु ज्ञेयं सौवीरकं हि तत् ॥

त्रिद्वत आदि संशोधनयोगण में कही औषधियाँ, प्रथमगण (विदारीगन्धादि), महापञ्चमूल, मूर्वा (चोरस्नायु), शाङ्कधा (नाटकारज), सुधा (स्तुही का दूध), हैमवती (रक्तवच अथवा अन्य मत से उधार रेबन्द), त्रिफला, अतीस, वच, इनको परस्पर समान भाग लेकर दो भाग करने चाहिये । एक भाग से क्वाथ सिद्ध करना चाहिये और दूसरे भाग का चूर्ण बनाना चाहिये । जो को कूट करके इस क्वाथ से बार-बार भावना देनी चाहिये । इनको सुखाकर मधुर आँच पर धीमे २ मूत्र लेना चाहिये । इन जीओं के तीन भाग लेने चाहिये । उपर्युक्त चूर्ण का चौथा भाग मिलाकर इस समस्त चूर्ण को एक पात्र में रखकर ऊपर से वैरेचनिक द्रव्यों का शीतल कषाय डालकर पूर्व की भाँति बन्द करके रख देना चाहिये । इस प्रकार से उत्तम हितकारी सौवीरक (काड़ी) बन जाती है ॥३५-३९॥

पूर्वोक्तं वर्गमाहृत्य द्विधा कृत्वैकमेतयोः ॥४०॥

भागं संख्यु ससृज्य यवैः स्थाल्यामधिश्येत् ।

अजशृङ्ग्याः कषायेण तमभ्यासिच्य साधयेत् ॥४१॥

सुसिद्धाश्चावतायंतानौषधिभ्यो विवेचेयेत् ।

विमृद्य सतुषान् सम्यक् ततस्तान् पूर्ववन्मिदान् ॥४२॥

पूर्वोक्तौषधभागस्य चूर्णं दत्त्वा तु पूर्ववत् ।

तेनैव सह यूषेण कलशे पूर्ववत् क्षिपेत् ॥४३॥

ज्ञात्वा जातरसं चापि तत्तुषादकमादिशेत् ।

तुषाम्बुसौवीरकयोविधिरेष प्रकीर्तितः ॥४४॥

षड्ग्रात्रात् सप्तग्रात्राद्वा ते च पेये प्रकीर्तिते ।

पूर्वोक्त (त्रिद्वतादिमूल, विदारीगन्धादि) महापञ्चमूल (मूर्वा, शाङ्कधा आदि) वर्ग के दो भाग करके इनमें से एक भाग को कूटना चाहिये । इसमें जो मिलाकर थाली में रखना चाहिये । इनको अजशृङ्गी (काकशाशृङ्गी) के कषाय से आर्द्र करके पकाना चाहिये । और जब भली प्रकार से पक जावे तब इन तृषयुक्त जो को औषधि से पुष्क कर लेना चाहिये । इन तृष

युक्त जो को भली प्रकार से पीसकर दो भाग परिमित लेना चाहिये । इसमें पूर्वोक्त औषधियों के चूर्ण का एक भाग पूर्व की भाँति (चतुर्थ भाग) मिलाना चाहिये । इस चूर्ण को तथा पूर्वोक्त अजशृङ्गी के यूष को पात्र में भरकर पूर्व की भाँति रख देना चाहिये । जब अम्लता उत्पन्न हो जाये, तब 'तृषोदक' बन गया, ऐसा समझना चाहिये । तुषाम्बु और सौवीरक की यह विधि कह दी है । लै या सात दिन में (अत्यन्त उष्णकाल में लै दिन के अन्दर) ये पीने के योग्य हो जाते हैं ॥४०-४४॥

वैरेचनेषु सर्वेषु त्रिवृन्मूलविधिः स्मृतः ॥४५॥

शेष अवशिष्ट श्यामा, दन्ती, द्रवन्ती, सतला आदि विरेचन द्रव्यों में त्रिद्वतमूल के समान विधि का प्रयोग करना चाहिये ॥४५॥

दन्तीद्रवन्त्योर्मूलाणि विशेषान्मृत्कुशान्तरे ।

पिपप्लोक्षौद्रयुक्तानि सिवन्तान्युद्ग्रुत्य शोषयेत् ॥४६॥

ततस्त्रिद्विधानेन योजयेच्छल्लेखमपित्तयोः ।

दन्ती और द्रवन्ती की जड़ों को मिट्टी एवं कुशा के अन्दर रखकर पुटपाक विधि से पकाना चाहिए । जब भली प्रकार से सिवन्न हो जायें तब पिपप्लो और शहद में मिलाकर, त्रिद्वत की विधि से कफ-पित्त रोगियों में प्रयोग करना चाहिये ॥४६॥

तयोः कलकषायाभ्यां चक्रतैलं विपाचयेत् ॥४७॥

सर्पिश्च पक्वं वीसर्पकक्षाद्वाहालजीर्जयेत् ।

मेहगुल्मानिलश्लेखमविबन्धास्तैलमेव च ॥४८॥

चतुःस्नेहं शकृच्छ्लुक्वातसंरोधजा रुजः ।

दन्ती और द्रवन्ती के कलक एवं कषाय से चक्रतैल (तिल-तैल-कोल्हू में पिरा हुआ) सिद्ध करना चाहिये । तैल ३२ पल-दन्ती द्रवन्ती कलक ८ पल, दन्ती द्रवन्ती क्वाथ १२८ पल लेना चाहिये । इसी प्रकार दन्ती-द्रवन्ती के मूल के कलक एवं कषाय से सिद्ध घृत, वीसर्प, कक्षा-दाह, अलजी को जीर्तता है । तथा इसी प्रकार सिद्ध तैल, प्रमेह, गुल्म, वायु, कफ, विबन्ध को नष्ट करता है । इनसे सिद्ध चतुःस्नेह (वसा, वी, तैल, मज्जा), मल, शुक्र, वायु के अवरोधजन्य उदावत्त की पीड़ा को नष्ट करता है ॥४७, ४८॥

दन्तीद्रवन्तीमरिचकनकाहृत्यवासकैः ॥४९॥

विश्वमेषजम्बूद्वीकाचित्रकैर्मूत्रभावितम् ।

समाहं सर्पिषा चूर्णं योज्यमेतद्विरेचनम् ॥५०॥

जीर्णं संतर्पणं क्षौद्रं पित्तश्लेखमरुजापहम् ।

अजीर्णपार्श्वरूपपाण्डुप्लीहोदरनिर्बर्हणम् ॥५१॥

दन्ती, द्रवन्ती, मरिच, कनकाहवा (नागकेसर) यवार्त (दुरालमा), विश्वमेषज (सोठ), मूद्वीका (किसमिस)

१ वृद्ध वैद्य—दशमूल क्वाथ भी मिलाते हैं । २ कनकाहवा का अर्थ कंकुष्ठ (सत्यानाशी) भी करते हैं । आजकल वैद्य समाज में कंकुष्ठ अभी अनिश्चित द्रव्य है ।

अ० ४४ ]

सूत्रस्थानम्

११६

चित्रक—इनको सताह तक मूत्रों द्वारा भावना देकर चूर्ण करना चाहिये। इस चूर्ण को घी के साथ मिलाकर चाटने से विरेचन होता है। इसके जीर्ण होने पर लाजा-सक्तुमिश्रित शहद सन्तर्पण के लिये देना चाहिये। इससे पित्त-कफ-जन्म-रोग, अजीर्ण, पार्वशूल, पाण्डु, प्लीहा और उदररोग नष्ट हो जाते हैं ॥४६-५१॥

गुडस्याष्टपले पथ्या विजतिः स्युः पलं पलम् ।

दन्तीचित्रकयोः कर्षौ पिप्पलीत्रिवृतोर्दश ॥५१॥

कृत्स्नैतन्मोदकानेकं दशमे दशमेऽहनि ।

ततः खादेदुष्णतोयसेवी निर्यन्त्रगास्त्रिबमे ॥५३॥

दोषऽन्ता ग्रहणीपाण्डुरोगार्शःकुष्ठनाशनाः ।

गुड आठ पल, पथ्या (हरड) बीस पल, दन्तीमूलचूर्ण एक पल, चित्रकमूलचूर्ण एक पल, पिप्पली एक कर्ष, त्रिवृत एक कर्ष, इनको परस्पर मिलाकर इनसे दस मोदक (लड्डू) बनाने चाहिये। एक एक लड्डू को दसवें दिन खाना चाहिये। लड्डू खाकर गरम पानी पीना चाहिये, तथा वायु, धूप आदि के निर्यन्त्रण की आवश्यकता नहीं है। ये मोदक दोषनाशक, ग्रहणी, पाण्डुरोग, अर्श एवं कुष्ठ नाशक हैं ॥५२,५३॥

व्योषं त्रिजातकं सुस्ता विडङ्गामलके तथा ॥५४॥

नवैतानि समंशानि त्रिवृदष्टगुणानि चै ।

शूलचूर्णांकृतानोह दन्तीभागद्वयं तथा ॥५५॥

(सर्वाणि चूर्णितानोह गालितानि विमिश्रयेत् ॥)

षड्भिश्च शर्कराभागैरोषत्सैन्धवमादिकैः ॥५६॥

पिण्डितं भक्षयित्वा तु ततः शीताम्वु पाययेत् ।

बस्तिरुक्तुड्वरुच्छर्दिशोषपाण्डुभ्रमापहम् ॥५७॥

निर्यन्त्रणमिव सर्वविषद्वं तु विरेचनम् ।

त्रिवृदष्टकसंज्ञोऽयं प्रशस्तः पित्तरोणिणाम् ॥५८॥

भक्ष्यः क्षीरानुपानो वा पित्तश्लेष्मातुरनरैः ।

भक्ष्यरूपसधर्मत्वादाह्वेऽन्धेव विधीयते ॥५९॥

व्योष (सौंठ, मरिच, पिप्पली), त्रिजातक (बालचीनी, इलायची, तेजपात); नागरमोथा, वायविडङ्ग और आँवला एक एक भाग और त्रिवृत आठ भाग, इनको बारीक चूर्ण करके कपड़े में छान लेना चाहिये। इनको मिलाकर इसमें शर्करा छै भाग और सैन्धव तथा शहद थोड़ा मिलाकर लड्डू बना लेने चाहिये। इनमें से एक लड्डू को खाकर ऊपर से शीतल जल पीना चाहिये। इससे बस्तिशूल, प्यास, ज्वर, वमन, शोष, पाण्डु, भ्रम (चक्कर आना) रोग नष्ट होता है। वायु, धूप से बचने की आवश्यकता नहीं है। विषनाशक विरेचन है। इस विरेचन को 'त्रिवृदष्टक' कहते हैं, यह पित्तरोगियों के लिये उत्तम है। पित्त-कफ रोगियों को चाहिये कि इसको खाकर ऊपर से दूध पीयें। भक्ष्य रूप होने के कारण धनी पुत्रों के लिये भी उत्तम है। (इसके अगुप आदि भी बना सकते हैं) ॥

तिल्वकस्य त्वचं बाह्यमन्तर्वलकविवर्जिताम् ।

चूर्णयित्वा तु द्वौ भागौ तत्कषायेण गालयेत् ॥६०॥

एतौ त्वचं भावितं तेन भागं युक्तं तु भावितम् ।

दग्धमूलीकषायेण त्रिवृदष्टसंप्रयोजयेत् ॥६१॥

तिल्वक (लोभ्र की जड़) के अन्दर की त्वचा को छोड़कर, बाहर की त्वचा को लेकर इसका चूर्ण करना चाहिये। इस चूर्ण के दो भागों को तिल्वक के कषाय से पकाना चाहिये, इन्कीस बार छानना चाहिये। चूर्ण के तीसरे भाग को इस कषाय से भावना देकर चूर्ण बनायें। इसका दशमूल के कषाय से त्रिवृत के समान प्रयोग करना चाहिये ॥६०,६१॥

विधानं त्वच्चु निर्दिष्टं फलानामथ वक्ष्यते ।

हरीतक्याः फलं त्वस्थिविमुक्तं दोषवर्जितम् ॥६२॥

योष्यं त्रिवृद्धिधानेन सर्वव्याधिनिवर्हणम् ।

रसायनं परं श्रेष्ठं दुष्टान्तर्ब्रणशोधनम् ॥६३॥

त्वचाओं की विधि को कहकर अब फलों की विधि को कहते हैं। अस्थि (गुठली) से रहित, दोषरहित हरड के फल को लेकर त्रिवृत की विधि से प्रयोग करना चाहिये। यह सब रोग-नाशक, रसायन, अतिशय-मेधा-वर्धक, दुष्ट तथा अन्तर्ब्रण-शोधक है ॥६२,६३॥

हरीतकी विडङ्गानि सैन्धवं नागरं त्रिवृत् ।

मरिचानि च तत्सर्वं गोमूत्रेण विरेचनम् ॥६४॥

हरीतकी भद्रदारु कुष्ठं पूगफलं तथा ।

सैन्धवं श्रृङ्गवैरं च गोमूत्रेण विरेचनम् ॥६६॥

नीलिनीफलचूर्णं तु नागराभययोस्तथा ।

लिह्वाद् गुडेन सलिलं पश्चादुष्णं पिबेन्नरः ॥६५॥

पिप्पल्यादिकषायैर्णं पिबेत्पिष्टां हरीतकीम् ।

सैन्धवोपहितां सद्य एष योगो विरेचयेत् ॥६७॥

हरीतकी भक्ष्यमाणा नागरेण गुडेन वा ।

सैन्धवोपहिता वाऽपि सातत्येनाग्निदीपनी ॥६८॥

वातानुपलोमनी वृष्या चेन्द्रियाणां प्रसादनी ।

संतपणकृनान् रोगान् प्रायो हन्ति हरीतकी ॥६९॥

हरड, विडङ्ग, सैन्धव, सौंठ, निशोथ, मरिच, इनको गोमूत्र के साथ लेने से विरेचन होता है। हरड, देवदारु, कूठ, पूगफल (सुगारी), सैन्धव और सौंठ यह गोमूत्र के साथ लेने से विरेचन हैं।

नीलीफल के चूर्ण को सौंठ तथा हरड के चूर्ण को गुड़ के साथ मिलाकर खाना चाहिये। ऊपर से गरम पानी पीना चाहिये। हरड को पिप्पल्यादिगण के कषाय के साथ पीसकर तथा सैन्धानमक मिलाकर खाने से शीघ्र विरेचन होता है। सौंठ या गुड़ के साथ हरड को खाने से, या सैन्धव के साथ निरन्तर खानेसे अग्नि बढ़ती है, हरड, वायु की अनुलोमक, वृष्य (शुक्रवर्धक) इन्द्रियों को प्रसन्न करनेवाली, तथा सन्तर्पणजन्म रोगों को नष्ट करती है ॥६४-६९॥

१६०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४४ ]

शीतमासलक्षं रूक्षं पित्तमेदःकफापहम् ।

विभीतकमनुष्णं तु कफपित्तनिवर्हणम् ॥७०॥

त्रीण्यप्यम्लकषायाणि सत्तिकमधुराणि च ।

आँवला—शीतवीर्य, रूक्ष है, पित्त-मेद और कफ का नाशक है । विभीतक ( बहेड़ा ) न तो उष्ण है न शीत तथा कफ-पित्तनाशक है । तीनों ही ( हरड, बहेड़ा और आँवला ) अम्ल, कषाय, तिक्त तथा मधुररस युक्त है ( इनमें कटु तथा लवणरस नहीं है ) ॥७०॥

त्रिफला सर्वरोगद्वनी त्रिभागघृतमूर्च्छिता ॥७१॥

वयसः स्थापनं चापि कुर्यात् संततसेविता ।

तीसरे भाग युक्त घी में मूर्च्छित ( भूनी ) त्रिफला-समूर्ण रोग ( दोष ) नाशक, आयुस्थापक होती है । इसके निरन्तर सेवन से बुढ़ापण शीघ्र नहीं आता ॥७१॥

हरीतकीविधानेन फलाभ्येवं प्रयोजयेत् ॥७२॥

विरेचनानि सर्वाणि—

आँवला आदि सब विरेचक फलों को हरड के समान प्रयोग करना चाहिये ॥७२॥

विशेषाश्चतुरङ्कुलात् ।

फलं काले समुद्भूय सिकतायां निधापयेत् ॥७३॥

सप्ताहमातपे शुष्कमतो मज्जानमुद्भूते ।

तैलं ग्राह्यं जले पक्त्वा तिलवृद्धा प्रपीड्य च ॥७४॥

तस्योपयोगो बालानां यावद्द्वर्षाणि द्वादश ।

लिह्यादेरण्डतैलेन कुष्ठत्रिकटुकान्वितम् ॥७५॥

सुखोदकं चानुपिबेदेष योगो विरेचयेत् ।

खासकर चतुरंगुल (अमलतास) के फल को पकने के समय में तोड़कर रेत में गाड़ देना चाहिये । सात दिन के पीछे इसका धूप में सुखाकर इसकी मज्जा (गूदे) को निकाल लेना चाहिये । इस मज्जा को जल में पकाकर अथवा तिलों के समान कालूह में पीसकर तेल निकालना चाहिये । इस तेल का उपयोग बारह साल की आयु तक के शिशुओं में करना चाहिये । इस तेल को एरण्डतैल कूठ तथा त्रिकटु ( सोंठ, मरिच, पिपल ) के साथ मिलाकर चाटना चाहिये । ऊपर से गरम पानी पीना चाहिये, इससे विरेचन होता है ।

वि० मन्तव्य—अमलतास की मज्जा (गूदा) का ही प्रयोग किया जाता है तेल का नहीं और तेल निकाला भी नहीं जाता उसमें तेल होता भी नहीं । उसके बीजों की गिरी का तैल हो सकता है, परन्तु—चरक कल्पस्थान अ० ८ में कहा है कि—‘ततो मज्जानम् उद्भूय शुचौ भाण्डे निधापयेत्’ अर्थात् अमलतास की फली से मज्जा निकालकर स्वच्छ भाण्ड में धर देवे । और वहाँ सब प्रयोग मज्जा के ही लिये हैं, तैल की चर्चा भी नहीं की गई है । सम्भव है कि उक्त “तैलं ग्राह्यं जले पक्त्वा तिलवृद्धा वा प्रपीड्य च” पाठ के अनुसार अमलतास के बीजों का तैल भी विरेचनार्थ निकालकर प्रयोग में लाया जाता रहा हो ॥७३-७५॥

एरण्डतैलं त्रिफलाकाथेन त्रिगुणेन तु ॥७६॥

युक्तं पीतं तथा शीररसाभ्यां तु विरेचयेन ।

बाल्यवृद्धक्षतक्षीणसुकुमारेषु योजितम् ॥७७॥

एरण्ड तैल को त्रिगुने त्रिफला क्वाथ, अथवा दूध अथवा मांसरस के साथ (अथवा उनमें मिलाकर) पीने से विरेचन हो जाता है । इसका प्रयोग बाल, वृद्ध, क्षत (उरःक्षत) तथा क्षीण (क्षय पीडित) और सुकुमार के लिये उत्तम है । एरण्ड तैल की मात्रा १ से ४ तोला है ॥७६,७७॥

फलाणां विधिरुद्भिः क्षीराणां शृणु सुश्रुत ।

विरेचनानां तीक्ष्णानां पयः सौधं परं मतम् ॥७८॥

अज्रप्रयुक्तं तद्वन्ति विषवत् कर्मविघ्नमात् ।

विज्ञानता प्रयुक्तं तु महान्तमपि संचयम् ॥५९॥

भिनस्याश्चैव दोषाणां रोगान् हन्ति च दुस्तरान् ।

हे सुश्रुत ! फलों की विधि कह दी है, अब दूध की विधि को सुनो । तीक्ष्ण विरेचनां में स्तुही का दूध सबसे उत्तम विरेचन है । यदि इसी विरेचन को मूढ़ मनुष्य कर्म को न जानकर प्रयोग करते हैं, तो यह विष के समान रोगी को मार देता है । जाननेवाले मनुष्य से प्रयुक्त होने पर, बड़े भारी दोष संचय को तथा कठिन रोगों को भी शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥

महत्याः पञ्चमूल्यास्तु बृहत्प्रयुक्तेः कृशः पृथक् ॥८०॥

कषायैः समभागं तु तदङ्कारेषु शोषितम् ।

अम्लादिभिः पूर्ववत् प्रयोज्यं कोलसंमितम् ॥८१॥

बृहत् पञ्चमूल, लघु बृहती (छोटी कटरी) और बड़ी कटरी इनके पृथक् पृथक् कषाय को समान भाग लेना चाहिये । इनके एक भाग के समान स्तुही के दूध को लेकर अङ्कारों पर शुष्क कर लेना चाहिये । इसमें से कोल (आधा कर्ष) परिमित, अम्लादि (दाडिम, आँवला या काझी, सुरा आदि) के साथ दोष विशेषानुसार पीना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—सेहुण्ड दूध की आधा तोला मात्रा बहुत अधिक है, सूखे दूध की मात्रा—२-४ रत्ती है और आर्द्र की ८-१० बून्द, इसके ऊपर घृत का हलुवा खाना चाहिये ।

अ० ४५—॥८२,८३॥

महावृक्षपयःपीतैर्यवागृप्तण्डुलैः कृताः ।

पीता विरेचयत्याशु गुडेनोत्कारिका कृता ॥८२॥

लेहो वा साधितः सम्यक् स्तुहीक्षीरपयोघृतैः ।

भावितास्तु स्तुहीक्षीरे पिपल्यो लवणान्विताः ॥८३॥

चूर्ण काप्पिललक्षं वाडपि तत्पीतं गुटिकीकृतम् ।

महावृक्ष (स्तुही) के दूध से भावित, तण्डुलों से बनाई लप्सी अथवा गुड के साथ बनाई उत्कारिका शीघ्र विरेचन करती है । अथवा—स्तुही के दूध, दूध सित्ता एवं घी से सिद्ध लेह विरेचक है । पिपलों को लवण (सैन्धव) से मिलाकर स्तुही के दूध में भावना देकर खाने से

अ० ४५ ]

२१

सूत्रस्थानम

३६१

अथवा कामिरुल (कमिले) को स्तुही के दूध में मिलाकर गोली बनाकर खाने से विरेचन होता है ॥ ८२, ८३ ॥

सप्तला शल्लिनी दन्ती त्रिघुद्वारग्वधं गवाम् ॥८४॥

मूत्रेणाप्लाव्य सप्ताहं स्तुहीक्षीरे ततः परम् ।

कीर्णं तेनैव चूर्णेन माल्यं वसनमेव च ॥८५॥

आप्रायावृत्य वा सम्यङ्भुदुकोष्ठो विरिच्यते ।

सप्तला, शल्लिनी (यवतिका), दन्ती, निशोथ, आरग्वध (अमलतास), इनको गाय के मूत्र में सात दिन तक मिश्रोकर, पीछे स्तुही के दूध से भावित करना चाहिये । इस चूर्ण को माला, वस्त्र आदि पर छिड़कर सूँघने या धारण करने से मुटु कोष्ठवाले व्यक्ति को शीघ्र विरेचन होता है ॥ ८४, ८५ ॥

क्षीरस्वक्फलमूलाणां विधानैः परिकीर्तितैः ।

अवेक्ष्य सम्यग्प्रोगादीन् यथावदुपयोजयेत् ॥८६॥

त्रिघुच्छाणमितास्तिस्सस्तिस्सश्च त्रिफलात्स्वचः ।

विडङ्गपिप्पलीक्षारज्जाणस्तिस्सश्च चूर्णिताः ॥८७॥

लिह्यात् सर्पिर्मधुभ्यां च मोदकं वा गुडंन वा ।

भक्षयेन्निरुपरीहारमेतच्छृष्टं विरेचनम् ॥८८॥

गुल्मं प्लीहोदरं कासं हलीमकमरोचकम् ।

कफवातकृतांश्चान्यान् न्याधीनेतद्व्यपोहति ॥ ८९ ॥

क्षीर, स्तुहा, फल और मूल इनके वर्णित प्रयोगों को रोग आदि के अनुसार उचित विधि में व्यवहार करना चाहिये । निशोथ तीन शाण (नौ मासे), त्रिफला (हरक, बहेड़ा और आँवले) की स्तुहा तीन शाण, वायविडङ्ग, पिप्पली, क्षार (यव-क्षार) एक एक शाण, इन सबके चूर्ण को घी और शहद के साथ मिलाकर चाटने से या गुड के साथ लड्डू बनाकर खाने से विरेचन होता है । यह उत्तम अन्यर्थ विरेचन है । इसमें परिहार की आवश्यकता नहीं है । गुल्म, प्लीहोदर, कास, हलीमक, अरुचि, कफ वातजन्य रोगों को नष्ट करता है ॥

घृतेषु तैलेषु पयःसु चापि

मद्येषु मूत्रेषु तथा रसेषु ।

भक्ष्यान्नलेह्येषु च तेषु तेषु

विरेचनान्यग्रमतिर्विदध्यात् ॥९०॥

अग्रमति (अतिप्रधान बुद्धि) वैद्य को चाहिये कि—घी, तैल, दूध, मद्य, मूत्र, रस (मांसरस), भक्ष्य (मोदकादि), अन्न (चावल आदि) तथा मिश्र-भिक्ष चाटनों के रूप में विरेचन देवे ॥

क्षीरं रसः कलकमथो कषायः

श्रुतश्च शीतश्च तथैव चूर्णम् ।

कल्पाः षष्ठेते खलु भेषजानां

यथोत्तरं ते लघवः प्रतिष्ठाः ॥९१॥

औषधियों की कल्पनाविधि छे प्रकार की है । यथा—क्षीर, स्वरस, कलक, श्रुत-कषाय, शीत-कषाय, और चूर्ण, इनमें

उत्तरोत्तर लघु है । यथा—क्षीर से रस, रस से कलक, कलक से कषाय आदि१ (चूर्ण के स्थान पर फाण्ट भी पाठ है) ॥९१॥

इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विरेचनद्रव्यविकल्प विज्ञानीयो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४४॥

पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः

अथातो द्रवद्रव्यविधिर्मध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

इसके आगे द्रवद्रव्यविधि की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, २॥

पानोयमान्तरीक्षमनिर्देशयरसममृतं सौम्यं तर्पणं धारणसमाश्वासजननं श्रमकलमपिपासामदमूर्च्छातिन्द्रानिद्राद-हप्रशमनमेकान्ततः पश्यतमं च ॥३॥

अन्तरिक्ष का जल—(वहाँ उत्पन्न नहीं होता, अपितु वाष्प से बन जाता है) अनिर्देश्य रस (अन्यत्क रस-अत्यल्प रस होने के कारण अप्रकटित रसवाला है, यह बात नहीं कि जल में रस नहीं) । अमृत (अमृत के समान है, चूँकि दोनों का प्रकोप नहीं करता, इसलिये पानी का कहीं भी निषेध नहीं है) । जीवन (प्राण धारण करनेवाला), सौम्य (धातुओं की ओज बुद्धि करनेवाला है), तर्पण (तुसिकाकर), धारण (शस्त्रजन्य व्यथा के कारण या अन्य कारणों से शरीर में मूर्च्छा उत्पन्न होने पर धारण करता है), आश्वासजनक (मार्ग चलने से थक जाने पर प्राणों को सहारा देता है) । श्रम (थकान), कलम (मानसिक शान्ति), प्यास, मद, मूर्च्छा, तन्द्रा, निद्रा, दाह को शान्त करता है, अत्यन्त पश्य है, इसलिये रुग्ण एवं स्वस्थ दोनों के लिये हितकारी है ।

वि० मन्तव्य—आन्तरिक्ष = द्यौ एवं पृथिवी के मध्य का अवकाश है अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष में वर्त्तमान जल का नाम है आन्तरिक्ष जल और यह जल पानीय (पीने योग्य—हित) है । इस जल को सब प्राणी सर्वदा पीते रहते हैं और इसमें किसी भी मधुर आदि रस का निर्देश नहीं किया जा सकता । यह

१ इनके लक्षण—

“यन्त्रादिपोहितद्रव्यरसः स्वरस उच्यते ।

यः पिण्डश्चार्द्रपिष्टानां स कलकः परिकीर्तितः ॥

वह्नी तु क्वथितं द्रव्यं श्रुतमाहुर्विश्वकिसकाः ।

उपोषितं निशायां तु तोयस्थं शीतमुच्यते ॥

चूर्णमुण्णनं संयुक्तं तत् फाण्टमभिधीयते ।

अभिभूयाम्बुनोण्णनं क्षणात् पूतमितिोतरे ॥”

चरक ने कलक के अन्दर चूर्ण का अन्तर्भाव किया है । इस पाँचवी कल्पना से फाण्ट अभिप्रेत है ।

१६२

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४५ ]

वह उदक है जो प्रत्येक श्वास में पिया जाता है। अतः यह अमृत है, जिसके पान से प्राणी मृत (मुर्दा) नहीं होता। यह आकाश में सर्वदा व्याप्त रहता है, अतः इसका नाम वेद में अप् है और इसी को पीने की प्रार्थना की जाती है “आपो भवन्तु पीतये” हमारे पीतये पीने के लिये, अप् हों—वर्त्तमान विद्यमान रहें। विश्वास कीजिये यह कटोरा में भरकर पीने का जल नहीं है। यह शीतकाल में अधिक तथा उष्णकाल में स्वल्प हो जाता है। इस प्रकरण में अन्तरिक्ष से गिरनेवाला जल सभी “आन्तरिक्ष” माना है, यथा वर्षा, ओले, वर्षा आदि। इसका संग्रह करने आदि का विधान सू० ७ में देखिये। चरक (सू० अ० २६) में उक्त अप् को सौम्य माना है, क्योंकि भाप शीत पाकर ही जल का रूप धारण करती है, फिर वह चाहे वर्षा आदि किसी रूप में परिणत हो जाती है ॥३॥

तदेवावनपितितमन्यतमं रसमुपलभते स्थानविशेषा- न्नदीनदसरस्तडागवापीकूपचुण्टीप्रस्त्रवणोद्भिदविकिरकेद। रप्लवलादिषु स्थानेष्ववस्थितमिति ॥४॥

यही अन्तरिक्ष का जल भूमि पर गिरकर स्थान विशेष के कारण मधुर आदि किसी एक रस को प्राप्त कर लेता है। स्थान-विशेष-नदी (गंगादि), नद (सिन्धु, शोण आदि), सर (सरोवर), तडाग (तालाब), वापी (वावली), कूप (कुंवा), चुण्टी (विना चिना कुंवा), प्रस्त्रवण (क्षरना), उद्भिद (भूमि में से पानी का निकलना), विकिर (रेत को हटाकर निकाला पानी, फलु नदी आदि), केदार (आलवाळ द्वारा बांधा खेत), प्लव (छोटासर) आदि शब्द से हृद आदि स्थानों में स्थित रहता है।

वि० मन्तव्य—पृथ्वी पर से वाष्प बनकर जल आकाश में जाता है, वह वर्षा आदि के रूप में पुनः पृथ्वी पर गिरता है और वहाँ शोषित या चूर्षित होकर पृथ्वी में प्रविष्ट हो जाता है, वही कूप आदि में उपलब्ध होता है ॥४॥

तत्र, ‘लोहितकपिलपाण्डुनीलपीतशुक्लदेववनप्रदेसेषु मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायणि यथासङ्ख्यमुदकानि संभवन्ति’ इत्येके भाषन्ते ॥५॥

कई आचार्यों का कहना है कि—लोहित (लाल), कपिल, पाण्डु, नीला, शुक्ल भूमिप्रदेशों में—क्रमशः मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय रसवाले जल होते हैं ॥५॥

तत्तु न सम्यक्, पृथिव्यादीनामन्योन्यानुप्रवेगकृतः सलिलरसो भवत्युत्कर्षोत्कर्षणं। तत्र, स्वलक्षणभूमिष्टायां भूमावरुलं, लवणं च, अम्लगुणभूमिष्टायां मधुरं, तेजोगुणभूमिष्टायां कटुकं तिक्तं च, वायुगुणभूमिष्टायां कषायम्, आकाशगुणभूमिष्टायांमन्यकरसम्, अन्यत्कं

द्याकाशमित्यतः, तत् प्रधानमन्यकरसत्वात्, तत्पेयमान्तरीक्षात्भाषे ॥६॥

यह कहना ठीक नहीं—पृथ्वी आदि पञ्चभूतों के परस्पर प्रविष्ट होने से सलिलरस उत्कर्ष (वृद्धि) एवं अपकर्ष (हास) के कारण छे गुणोंवाला (रसोंवाला) हो जाता है। इनमें पृथ्वीगुणबहुल भूमि में अम्ल एवं लवण रस, जलगुणबहुल भूमि में मधुर, तेजोगुणबहुल भूमि में कषाय रस, आकाशगुणबहुल भूमि में अन्यत्क रस होता है, क्योंकि आकाश-अन्यत्क है। आकाशगुण-बहुल भूमि में गिरा हुआ जल, अन्य स्थानों की भूमि की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि यह अन्यत्क रस है। अन्तरिक्ष के जल न मिलने पर आकाशगुणबहुल भूमि का जल पीना चाहिये ॥६॥

तत्रान्तरीक्षं चतुर्विधम्। तद्यथा—धारं कारं तौषारं हैममिति। तेषां धारं प्रधानं लघुत्वात्; तत् पुनर्द्विविधं-गाङ्गं, सामुद्रं चेति। तत्र गाङ्गमाश्वयुजे मासि प्रायशो वर्षति। तयोर्द्वयोरपि परीक्षणं कुर्वीत-शाल्योदनपिण्ड-मकुथितविदग्धं रजतभाजनोपहितं वर्षति देवे बहिष्कृर्वीत, स यदि मुहूर्तं स्थितस्ताह्नग एव भवति तदा गाङ्गं पततीत्यवगन्तव्यं, वर्णान्यस्ते सिक्यप्रकल्लेदे च सामुद्रमिति विद्यात्, तन्तोपादेयम्। सामुद्रमप्यश्वयुजे मासि गृहीतं गाङ्गवद् भवति। गाङ्गं पुनः प्रधानं, तदुपाद्वीताश्वयुजे मासि। शुचिशुक्लविततपटैकदेअच्युतमथवा हर्म्यंतलपरिग्रहमन्यैवाशुचिभिर्भोजनेगृहीतं सौवण राजते मृणमये वा पात्रे निदध्यात्। तत् सर्वकालमुपयुञ्जीत, तस्यात्भाषे भौमम्। तच्चाकाशगुणबहुलम्। तत् पुनः समविधम्। तद्यथा—कौपं, नादेयं, सारसं, ताडागं, प्रास्त्रवणम्, औद्भिदं, चौण्टचमिति ॥७॥

यह आन्तरिक्ष जल चार प्रकार का है। यथा—धार (धारा वर्षा के रूप में गिरा हुआ)—कार, वर्षा में गिरे ओले, तुषार (ओस का पानी), हैम (हम का पानी), इन चारों प्रकार के पानी में धार-पानी प्रधान है, लघु होने से। यह धार जल फिर दो प्रकार का है—एक गांग और दूसरा सामुद्र। इनमें गांग जल प्रायः आश्विन मास में बरसता है। इन दोनों प्रकार के पानी की परीक्षा करनी चाहिये। जिस समय बादल बरस रहा हो, उस समय प्रकाये चावलों के न गले हुए अविर्ण एक पिण्ड को चांदी के पात्र में रखना चाहिये। इस प्रकार कुल देर तक (४, ५ घण्टे तक) रखने पर भी यदि पिण्ड

१ अन्य आचार्यों दो भूतों के संसर्ग से रसोपत्ति मानते हैं—पृथ्वी जलगुणभूमिष्ट-भूमि में मधुर, भूमिअनिलगुण भूमिष्ट में अम्ल, जल अनिलगुणभूमिष्ट में लवण, वायु-अनिलगुणभूमिष्ट में कटु, पृथ्वी-अनिलगुणभूमिष्ट में कषाय रस उत्पन्न होता है।

अ० ४५ ]

सूधस्थानम्

१६३

उसी प्रकार रहता है, तो समझना चाहिये कि गांग जल बरस रहा है। यदि रङ्ग बदल जाये, कोथ या गँदलापन दिखाई देवे तो समझना चाहिये कि 'सामुद्र' जल बरस रहा है। यह सामुद्र जल ग्रहण करने योग्य नहीं। सामुद्र जल को भी आदि आश्विन मास में ग्रहण किया जाये, तो यह भी गांग जल की भाँति हो जाता है। गांग जल श्रेष्ठ है, इसको आश्विन मास में जो शुद्ध-स्वच्छ-सफेद-फैले वख्त के एक भाग में गिरा हो उसे अथवा ईट आदि से बने महल की छत पर से या किन्हीं अन्य स्वच्छ पात्रों में इकट्ठा करके स्वर्ण चाँदी या मिट्टी के पात्र में रखना चाहिये। इस पानी का सब समय में उपयोग करना चाहिये, इसके न मिलने पर भूमि का पानी बरतना चाहिये। इस भूमि के पानी में आकाशगुण की अधिकता रहती है। यह पानी सात प्रकार का है। यथा—कौप (कुण्ड का), नादेय (नदी का), सारस (सरोवर का) ताङ्गा (तङ्गा का), प्रास्वण (झरने का), औद्विद (ओगल का), चौण्ध्य (बिना चिने कुण्ड का)।

वि० मन्तव्य—सामुद्र—सागर में सर्वदा नदियों, नदों द्वारा जल पड़ता—भरता रहता है, परन्तु वह उछलता नहीं, भरकर इधर उधर नहीं बहता—वेला का उल्लेखन नहीं करता, कारण यह है कि उसमें से बाह्य अग्नि के प्रभाव से तथा सूर्य के सन्ताप से सर्वदा वाष्प-भाप उड़ती रहती है, जो आजकल की भाषा में "मानसून" कही जाती है। इस मानसून के बादलों (मेघों) से जो जल बरसता है वह "सामुद्र" (समुद्र का) कहलाता है। और जो गंगा (गच्छति इति गंगा) अर्थात् चलती नदियों का जल भाप बनकर उड़ता है और फिर बरसता है वह "गाङ्ग" जल कहलाता है। विश्वास कीजिये कि—गंगा केवल भागीरथी नामक भारतीय एक नदी का नाम नहीं है, अपितु विश्व की समस्त गतिशील छोटी बड़ी नदियों का नाम है। वर्षा ऋतु में प्रायः मानसून का जल बरसता है और उसके व्यतीत होने के अनन्तर अगस्त्य का उदय होने पर—शरद् ऋतु में गाङ्ग जल बरसता है, तथापि उसकी उक्त विधि से परीक्षा कर लेनी चाहिये। सम्भव है शरद् ऋतु में भी सामुद्र जल बरस रहा हो और उसका सञ्चय करना व्यर्थ और पान हानिकर है। मले ही वह बरसात के जल की अपेक्षा शुद्ध—स्वच्छ होता है।

धार जल कभी कभी वर्षा होने पर गिरता है अथवा यों कहिये कि वर्षाजल का नाम "धार" है। करका ओलों का नाम है, ओले कुछ समय के पश्चात् जल रूप में परिणत हो जाते हैं उस जल का नाम "कार" है। तुषार "ओस" का नाम है उसके जल का नाम "तौषार" है, ओस सर्वदा पड़ती रहती है, परन्तु—प्रातःकाल में वास आदि पर दिखाई पड़ती

है। हिम नाम वर्षा का है, इसके जल का नाम "हेम" है। यह हिमालय को ऊँची चोटियों पर सर्वदा पड़ती रहती है और निम्नले प्रदेशों में कभी २ पड़ती है, उत्तरी तथा दक्षिणी भुव प्रदेशों में सर्वदा गिरती रहती है, परन्तु सर्वदा वाष्परूप में उड़ती भी रहती है। दोपहर का भात चाँदी के ही नहीं, किसी भी पात्र में रखने पर सायंकाल क्लेद युक्त हो जाता है, वह परीक्षार्थ वर्षा में नहीं—अभितु छाया में सिकहर पर घरा हुआ क्लेद युक्त हो जाता है। वस्तुतः समस्त वातावरण में उस समय सामुद्र जल व्याप्त रहता है। शरद् आदि ऋतु में वर्षा होती रहने पर भी भात में क्लेद (गीलापन) नहीं होता। शुचि.....निदध्यात्—स्वच्छ कपड़ा कुछ ढीला तान दिया जाता है, जब वर्षा होती है तब उस चौड़े-लम्बे कपड़ा पर गिरा वर्षा जल निचले पात्र में गिरता रहता है। अथवा पक्कों छत का जल सञ्चित कर लिया जाता है। इस प्रकार के जल के लिये गुजरात एवं सिन्धु देश में बड़ी २ टंकियाँ बना ली जाती हैं। वहाँ के निवासी उसी का पान करते हैं ॥७॥

तत्र वर्षास्वान्तरिक्षमौद्वभिदं वा सेवेत, महागुणस्वात्, शरदि सर्व, प्रसन्नस्वात्, हेमन्ते सारसं ताङ्गां वा, वसन्ते कौपं प्रास्वणं वा, ग्रीष्मेऽप्येवं, प्रावृषि चोण्ध्य-मनभिवृष्टं सर्वं चेति ॥८॥

वर्षा ऋतु में (आश्विन मास में, भाद्रपद में नहीं), आन्तरिक्ष या औद्वभिद जल सेवन करना चाहिये, (भाद्रपद में पानी को गरम करके या आकाशगुणबहुल भूमि में संचित पानी को पीना चाहिये)। क्योंकि ये दोनों प्रकार के पानी महान् गुणवाले हैं। शरद् ऋतु में सब प्रकार का पानी पीना चाहिये, क्योंकि अगस्त्य के उदय होने से सब प्रकार का पानी स्वच्छ हो जाता है। हेमन्त ऋतु में सरोवर या तङ्गाओं का पानी पीना चाहिये। वसन्त ऋतु में कुण्ड या झरनों का पानी पीना चाहिये। ग्रीष्म में भी कुण्ड या झरने का पानी बरतना चाहिये। प्रावृष्ट ऋतु में चोण्ध्य, (सरोवर या तङ्गा का या कुण्ड का पानी) बरसात का नहीं पीना चाहिये, परन्तु यदि बादल बरस रहा हो तो सब प्रकार का पानी पीना चाहिये।

वि० मन्तव्य—प्रावृषि.....चेति = प्रावृष्ट ऋतु में चोण्ध्य जल अथवा वर्षाजल के अतिरिक्त सब प्रकार का जल पीने तथा नहाने योग्य होता है ॥८॥

कीटमूत्रपुरोषाण्डशवकोथप्रदूषितम्।

तृणपणींस्करयुतं कलुषं विषसंयुतम् ॥९॥

१ वर्षा ऋतु में पानी दूषित होता है। यथा — "बलाहाकाद्याः समदाः कीटा लूनारुव खेवराः। तद्विषोत्सर्गसर्गादि न प्राह्यं ततदा जलम् ॥"