भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४५ ]

वह उदक है जो प्रत्येक श्वास में पिया जाता है। अतः यह अमृत है, जिसके पान से प्राणी मृत (मुर्दा) नहीं होता। यह आकाश में सर्वदा व्याप्त रहता है, अतः इसका नाम वेद में अप् है और इसी को पीने की प्रार्थना की जाती है “आपो भवन्तु पीतये” हमारे पीतये पीने के लिये, अप् हों—वर्त्तमान विद्यमान रहें। विश्वास कीजिये यह कटोरा में भरकर पीने का जल नहीं है। यह शीतकाल में अधिक तथा उष्णकाल में स्वल्प हो जाता है। इस प्रकरण में अन्तरिक्ष से गिरनेवाला जल सभी “आन्तरिक्ष” माना है, यथा वर्षा, ओले, वर्षा आदि। इसका संग्रह करने आदि का विधान सू० ७ में देखिये। चरक (सू० अ० २६) में उक्त अप् को सौम्य माना है, क्योंकि भाप शीत पाकर ही जल का रूप धारण करती है, फिर वह चाहे वर्षा आदि किसी रूप में परिणत हो जाती है ॥३॥

तदेवावनपितितमन्यतमं रसमुपलभते स्थानविशेषा- न्नदीनदसरस्तडागवापीकूपचुण्टीप्रस्त्रवणोद्भिदविकिरकेद। रप्लवलादिषु स्थानेष्ववस्थितमिति ॥४॥

यही अन्तरिक्ष का जल भूमि पर गिरकर स्थान विशेष के कारण मधुर आदि किसी एक रस को प्राप्त कर लेता है। स्थान-विशेष-नदी (गंगादि), नद (सिन्धु, शोण आदि), सर (सरोवर), तडाग (तालाब), वापी (वावली), कूप (कुंवा), चुण्टी (विना चिना कुंवा), प्रस्त्रवण (क्षरना), उद्भिद (भूमि में से पानी का निकलना), विकिर (रेत को हटाकर निकाला पानी, फलु नदी आदि), केदार (आलवाळ द्वारा बांधा खेत), प्लव (छोटासर) आदि शब्द से हृद आदि स्थानों में स्थित रहता है।

वि० मन्तव्य—पृथ्वी पर से वाष्प बनकर जल आकाश में जाता है, वह वर्षा आदि के रूप में पुनः पृथ्वी पर गिरता है और वहाँ शोषित या चूर्षित होकर पृथ्वी में प्रविष्ट हो जाता है, वही कूप आदि में उपलब्ध होता है ॥४॥

तत्र, ‘लोहितकपिलपाण्डुनीलपीतशुक्लदेववनप्रदेसेषु मधुराम्ललवणकटुतिक्तकषायणि यथासङ्ख्यमुदकानि संभवन्ति’ इत्येके भाषन्ते ॥५॥

कई आचार्यों का कहना है कि—लोहित (लाल), कपिल, पाण्डु, नीला, शुक्ल भूमिप्रदेशों में—क्रमशः मधुर, अम्ल, लवण, कटु, तिक्त, कषाय रसवाले जल होते हैं ॥५॥

तत्तु न सम्यक्, पृथिव्यादीनामन्योन्यानुप्रवेगकृतः सलिलरसो भवत्युत्कर्षोत्कर्षणं। तत्र, स्वलक्षणभूमिष्टायां भूमावरुलं, लवणं च, अम्लगुणभूमिष्टायां मधुरं, तेजोगुणभूमिष्टायां कटुकं तिक्तं च, वायुगुणभूमिष्टायां कषायम्, आकाशगुणभूमिष्टायांमन्यकरसम्, अन्यत्कं

द्याकाशमित्यतः, तत् प्रधानमन्यकरसत्वात्, तत्पेयमान्तरीक्षात्भाषे ॥६॥

यह कहना ठीक नहीं—पृथ्वी आदि पञ्चभूतों के परस्पर प्रविष्ट होने से सलिलरस उत्कर्ष (वृद्धि) एवं अपकर्ष (हास) के कारण छे गुणोंवाला (रसोंवाला) हो जाता है। इनमें पृथ्वीगुणबहुल भूमि में अम्ल एवं लवण रस, जलगुणबहुल भूमि में मधुर, तेजोगुणबहुल भूमि में कषाय रस, आकाशगुणबहुल भूमि में अन्यत्क रस होता है, क्योंकि आकाश-अन्यत्क है। आकाशगुण-बहुल भूमि में गिरा हुआ जल, अन्य स्थानों की भूमि की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि यह अन्यत्क रस है। अन्तरिक्ष के जल न मिलने पर आकाशगुणबहुल भूमि का जल पीना चाहिये ॥६॥

तत्रान्तरीक्षं चतुर्विधम्। तद्यथा—धारं कारं तौषारं हैममिति। तेषां धारं प्रधानं लघुत्वात्; तत् पुनर्द्विविधं-गाङ्गं, सामुद्रं चेति। तत्र गाङ्गमाश्वयुजे मासि प्रायशो वर्षति। तयोर्द्वयोरपि परीक्षणं कुर्वीत-शाल्योदनपिण्ड-मकुथितविदग्धं रजतभाजनोपहितं वर्षति देवे बहिष्कृर्वीत, स यदि मुहूर्तं स्थितस्ताह्नग एव भवति तदा गाङ्गं पततीत्यवगन्तव्यं, वर्णान्यस्ते सिक्यप्रकल्लेदे च सामुद्रमिति विद्यात्, तन्तोपादेयम्। सामुद्रमप्यश्वयुजे मासि गृहीतं गाङ्गवद् भवति। गाङ्गं पुनः प्रधानं, तदुपाद्वीताश्वयुजे मासि। शुचिशुक्लविततपटैकदेअच्युतमथवा हर्म्यंतलपरिग्रहमन्यैवाशुचिभिर्भोजनेगृहीतं सौवण राजते मृणमये वा पात्रे निदध्यात्। तत् सर्वकालमुपयुञ्जीत, तस्यात्भाषे भौमम्। तच्चाकाशगुणबहुलम्। तत् पुनः समविधम्। तद्यथा—कौपं, नादेयं, सारसं, ताडागं, प्रास्त्रवणम्, औद्भिदं, चौण्टचमिति ॥७॥

यह आन्तरिक्ष जल चार प्रकार का है। यथा—धार (धारा वर्षा के रूप में गिरा हुआ)—कार, वर्षा में गिरे ओले, तुषार (ओस का पानी), हैम (हम का पानी), इन चारों प्रकार के पानी में धार-पानी प्रधान है, लघु होने से। यह धार जल फिर दो प्रकार का है—एक गांग और दूसरा सामुद्र। इनमें गांग जल प्रायः आश्विन मास में बरसता है। इन दोनों प्रकार के पानी की परीक्षा करनी चाहिये। जिस समय बादल बरस रहा हो, उस समय प्रकाये चावलों के न गले हुए अविर्ण एक पिण्ड को चांदी के पात्र में रखना चाहिये। इस प्रकार कुल देर तक (४, ५ घण्टे तक) रखने पर भी यदि पिण्ड

१ अन्य आचार्यों दो भूतों के संसर्ग से रसोपत्ति मानते हैं—पृथ्वी जलगुणभूमिष्ट-भूमि में मधुर, भूमिअनिलगुण भूमिष्ट में अम्ल, जल अनिलगुणभूमिष्ट में लवण, वायु-अनिलगुणभूमिष्ट में कटु, पृथ्वी-अनिलगुणभूमिष्ट में कषाय रस उत्पन्न होता है।