सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम
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अथवा कामिरुल (कमिले) को स्तुही के दूध में मिलाकर गोली बनाकर खाने से विरेचन होता है ॥ ८२, ८३ ॥
सप्तला शल्लिनी दन्ती त्रिघुद्वारग्वधं गवाम् ॥८४॥
मूत्रेणाप्लाव्य सप्ताहं स्तुहीक्षीरे ततः परम् ।
कीर्णं तेनैव चूर्णेन माल्यं वसनमेव च ॥८५॥
आप्रायावृत्य वा सम्यङ्भुदुकोष्ठो विरिच्यते ।
सप्तला, शल्लिनी (यवतिका), दन्ती, निशोथ, आरग्वध (अमलतास), इनको गाय के मूत्र में सात दिन तक मिश्रोकर, पीछे स्तुही के दूध से भावित करना चाहिये । इस चूर्ण को माला, वस्त्र आदि पर छिड़कर सूँघने या धारण करने से मुटु कोष्ठवाले व्यक्ति को शीघ्र विरेचन होता है ॥ ८४, ८५ ॥
क्षीरस्वक्फलमूलाणां विधानैः परिकीर्तितैः ।
अवेक्ष्य सम्यग्प्रोगादीन् यथावदुपयोजयेत् ॥८६॥
त्रिघुच्छाणमितास्तिस्सस्तिस्सश्च त्रिफलात्स्वचः ।
विडङ्गपिप्पलीक्षारज्जाणस्तिस्सश्च चूर्णिताः ॥८७॥
लिह्यात् सर्पिर्मधुभ्यां च मोदकं वा गुडंन वा ।
भक्षयेन्निरुपरीहारमेतच्छृष्टं विरेचनम् ॥८८॥
गुल्मं प्लीहोदरं कासं हलीमकमरोचकम् ।
कफवातकृतांश्चान्यान् न्याधीनेतद्व्यपोहति ॥ ८९ ॥
क्षीर, स्तुहा, फल और मूल इनके वर्णित प्रयोगों को रोग आदि के अनुसार उचित विधि में व्यवहार करना चाहिये । निशोथ तीन शाण (नौ मासे), त्रिफला (हरक, बहेड़ा और आँवले) की स्तुहा तीन शाण, वायविडङ्ग, पिप्पली, क्षार (यव-क्षार) एक एक शाण, इन सबके चूर्ण को घी और शहद के साथ मिलाकर चाटने से या गुड के साथ लड्डू बनाकर खाने से विरेचन होता है । यह उत्तम अन्यर्थ विरेचन है । इसमें परिहार की आवश्यकता नहीं है । गुल्म, प्लीहोदर, कास, हलीमक, अरुचि, कफ वातजन्य रोगों को नष्ट करता है ॥
घृतेषु तैलेषु पयःसु चापि
मद्येषु मूत्रेषु तथा रसेषु ।
भक्ष्यान्नलेह्येषु च तेषु तेषु
विरेचनान्यग्रमतिर्विदध्यात् ॥९०॥
अग्रमति (अतिप्रधान बुद्धि) वैद्य को चाहिये कि—घी, तैल, दूध, मद्य, मूत्र, रस (मांसरस), भक्ष्य (मोदकादि), अन्न (चावल आदि) तथा मिश्र-भिक्ष चाटनों के रूप में विरेचन देवे ॥
क्षीरं रसः कलकमथो कषायः
श्रुतश्च शीतश्च तथैव चूर्णम् ।
कल्पाः षष्ठेते खलु भेषजानां
यथोत्तरं ते लघवः प्रतिष्ठाः ॥९१॥
औषधियों की कल्पनाविधि छे प्रकार की है । यथा—क्षीर, स्वरस, कलक, श्रुत-कषाय, शीत-कषाय, और चूर्ण, इनमें
उत्तरोत्तर लघु है । यथा—क्षीर से रस, रस से कलक, कलक से कषाय आदि१ (चूर्ण के स्थान पर फाण्ट भी पाठ है) ॥९१॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने विरेचनद्रव्यविकल्प विज्ञानीयो नाम चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥४४॥
पञ्चचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
अथातो द्रवद्रव्यविधिर्मध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
इसके आगे द्रवद्रव्यविधि की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, २॥
पानोयमान्तरीक्षमनिर्देशयरसममृतं सौम्यं तर्पणं धारणसमाश्वासजननं श्रमकलमपिपासामदमूर्च्छातिन्द्रानिद्राद-हप्रशमनमेकान्ततः पश्यतमं च ॥३॥
अन्तरिक्ष का जल—(वहाँ उत्पन्न नहीं होता, अपितु वाष्प से बन जाता है) अनिर्देश्य रस (अन्यत्क रस-अत्यल्प रस होने के कारण अप्रकटित रसवाला है, यह बात नहीं कि जल में रस नहीं) । अमृत (अमृत के समान है, चूँकि दोनों का प्रकोप नहीं करता, इसलिये पानी का कहीं भी निषेध नहीं है) । जीवन (प्राण धारण करनेवाला), सौम्य (धातुओं की ओज बुद्धि करनेवाला है), तर्पण (तुसिकाकर), धारण (शस्त्रजन्य व्यथा के कारण या अन्य कारणों से शरीर में मूर्च्छा उत्पन्न होने पर धारण करता है), आश्वासजनक (मार्ग चलने से थक जाने पर प्राणों को सहारा देता है) । श्रम (थकान), कलम (मानसिक शान्ति), प्यास, मद, मूर्च्छा, तन्द्रा, निद्रा, दाह को शान्त करता है, अत्यन्त पश्य है, इसलिये रुग्ण एवं स्वस्थ दोनों के लिये हितकारी है ।
वि० मन्तव्य—आन्तरिक्ष = द्यौ एवं पृथिवी के मध्य का अवकाश है अन्तरिक्ष और अन्तरिक्ष में वर्त्तमान जल का नाम है आन्तरिक्ष जल और यह जल पानीय (पीने योग्य—हित) है । इस जल को सब प्राणी सर्वदा पीते रहते हैं और इसमें किसी भी मधुर आदि रस का निर्देश नहीं किया जा सकता । यह
१ इनके लक्षण—
“यन्त्रादिपोहितद्रव्यरसः स्वरस उच्यते ।
यः पिण्डश्चार्द्रपिष्टानां स कलकः परिकीर्तितः ॥
वह्नी तु क्वथितं द्रव्यं श्रुतमाहुर्विश्वकिसकाः ।
उपोषितं निशायां तु तोयस्थं शीतमुच्यते ॥
चूर्णमुण्णनं संयुक्तं तत् फाण्टमभिधीयते ।
अभिभूयाम्बुनोण्णनं क्षणात् पूतमितिोतरे ॥”
चरक ने कलक के अन्दर चूर्ण का अन्तर्भाव किया है । इस पाँचवी कल्पना से फाण्ट अभिप्रेत है ।