भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४४ ]

शीतमासलक्षं रूक्षं पित्तमेदःकफापहम् ।

विभीतकमनुष्णं तु कफपित्तनिवर्हणम् ॥७०॥

त्रीण्यप्यम्लकषायाणि सत्तिकमधुराणि च ।

आँवला—शीतवीर्य, रूक्ष है, पित्त-मेद और कफ का नाशक है । विभीतक ( बहेड़ा ) न तो उष्ण है न शीत तथा कफ-पित्तनाशक है । तीनों ही ( हरड, बहेड़ा और आँवला ) अम्ल, कषाय, तिक्त तथा मधुररस युक्त है ( इनमें कटु तथा लवणरस नहीं है ) ॥७०॥

त्रिफला सर्वरोगद्वनी त्रिभागघृतमूर्च्छिता ॥७१॥

वयसः स्थापनं चापि कुर्यात् संततसेविता ।

तीसरे भाग युक्त घी में मूर्च्छित ( भूनी ) त्रिफला-समूर्ण रोग ( दोष ) नाशक, आयुस्थापक होती है । इसके निरन्तर सेवन से बुढ़ापण शीघ्र नहीं आता ॥७१॥

हरीतकीविधानेन फलाभ्येवं प्रयोजयेत् ॥७२॥

विरेचनानि सर्वाणि—

आँवला आदि सब विरेचक फलों को हरड के समान प्रयोग करना चाहिये ॥७२॥

विशेषाश्चतुरङ्कुलात् ।

फलं काले समुद्भूय सिकतायां निधापयेत् ॥७३॥

सप्ताहमातपे शुष्कमतो मज्जानमुद्भूते ।

तैलं ग्राह्यं जले पक्त्वा तिलवृद्धा प्रपीड्य च ॥७४॥

तस्योपयोगो बालानां यावद्द्वर्षाणि द्वादश ।

लिह्यादेरण्डतैलेन कुष्ठत्रिकटुकान्वितम् ॥७५॥

सुखोदकं चानुपिबेदेष योगो विरेचयेत् ।

खासकर चतुरंगुल (अमलतास) के फल को पकने के समय में तोड़कर रेत में गाड़ देना चाहिये । सात दिन के पीछे इसका धूप में सुखाकर इसकी मज्जा (गूदे) को निकाल लेना चाहिये । इस मज्जा को जल में पकाकर अथवा तिलों के समान कालूह में पीसकर तेल निकालना चाहिये । इस तेल का उपयोग बारह साल की आयु तक के शिशुओं में करना चाहिये । इस तेल को एरण्डतैल कूठ तथा त्रिकटु ( सोंठ, मरिच, पिपल ) के साथ मिलाकर चाटना चाहिये । ऊपर से गरम पानी पीना चाहिये, इससे विरेचन होता है ।

वि० मन्तव्य—अमलतास की मज्जा (गूदा) का ही प्रयोग किया जाता है तेल का नहीं और तेल निकाला भी नहीं जाता उसमें तेल होता भी नहीं । उसके बीजों की गिरी का तैल हो सकता है, परन्तु—चरक कल्पस्थान अ० ८ में कहा है कि—‘ततो मज्जानम् उद्भूय शुचौ भाण्डे निधापयेत्’ अर्थात् अमलतास की फली से मज्जा निकालकर स्वच्छ भाण्ड में धर देवे । और वहाँ सब प्रयोग मज्जा के ही लिये हैं, तैल की चर्चा भी नहीं की गई है । सम्भव है कि उक्त “तैलं ग्राह्यं जले पक्त्वा तिलवृद्धा वा प्रपीड्य च” पाठ के अनुसार अमलतास के बीजों का तैल भी विरेचनार्थ निकालकर प्रयोग में लाया जाता रहा हो ॥७३-७५॥

एरण्डतैलं त्रिफलाकाथेन त्रिगुणेन तु ॥७६॥

युक्तं पीतं तथा शीररसाभ्यां तु विरेचयेन ।

बाल्यवृद्धक्षतक्षीणसुकुमारेषु योजितम् ॥७७॥

एरण्ड तैल को त्रिगुने त्रिफला क्वाथ, अथवा दूध अथवा मांसरस के साथ (अथवा उनमें मिलाकर) पीने से विरेचन हो जाता है । इसका प्रयोग बाल, वृद्ध, क्षत (उरःक्षत) तथा क्षीण (क्षय पीडित) और सुकुमार के लिये उत्तम है । एरण्ड तैल की मात्रा १ से ४ तोला है ॥७६,७७॥

फलाणां विधिरुद्भिः क्षीराणां शृणु सुश्रुत ।

विरेचनानां तीक्ष्णानां पयः सौधं परं मतम् ॥७८॥

अज्रप्रयुक्तं तद्वन्ति विषवत् कर्मविघ्नमात् ।

विज्ञानता प्रयुक्तं तु महान्तमपि संचयम् ॥५९॥

भिनस्याश्चैव दोषाणां रोगान् हन्ति च दुस्तरान् ।

हे सुश्रुत ! फलों की विधि कह दी है, अब दूध की विधि को सुनो । तीक्ष्ण विरेचनां में स्तुही का दूध सबसे उत्तम विरेचन है । यदि इसी विरेचन को मूढ़ मनुष्य कर्म को न जानकर प्रयोग करते हैं, तो यह विष के समान रोगी को मार देता है । जाननेवाले मनुष्य से प्रयुक्त होने पर, बड़े भारी दोष संचय को तथा कठिन रोगों को भी शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥

महत्याः पञ्चमूल्यास्तु बृहत्प्रयुक्तेः कृशः पृथक् ॥८०॥

कषायैः समभागं तु तदङ्कारेषु शोषितम् ।

अम्लादिभिः पूर्ववत् प्रयोज्यं कोलसंमितम् ॥८१॥

बृहत् पञ्चमूल, लघु बृहती (छोटी कटरी) और बड़ी कटरी इनके पृथक् पृथक् कषाय को समान भाग लेना चाहिये । इनके एक भाग के समान स्तुही के दूध को लेकर अङ्कारों पर शुष्क कर लेना चाहिये । इसमें से कोल (आधा कर्ष) परिमित, अम्लादि (दाडिम, आँवला या काझी, सुरा आदि) के साथ दोष विशेषानुसार पीना चाहिये ।

वि० मन्तव्य—सेहुण्ड दूध की आधा तोला मात्रा बहुत अधिक है, सूखे दूध की मात्रा—२-४ रत्ती है और आर्द्र की ८-१० बून्द, इसके ऊपर घृत का हलुवा खाना चाहिये ।

अ० ४५—॥८२,८३॥

महावृक्षपयःपीतैर्यवागृप्तण्डुलैः कृताः ।

पीता विरेचयत्याशु गुडेनोत्कारिका कृता ॥८२॥

लेहो वा साधितः सम्यक् स्तुहीक्षीरपयोघृतैः ।

भावितास्तु स्तुहीक्षीरे पिपल्यो लवणान्विताः ॥८३॥

चूर्ण काप्पिललक्षं वाडपि तत्पीतं गुटिकीकृतम् ।

महावृक्ष (स्तुही) के दूध से भावित, तण्डुलों से बनाई लप्सी अथवा गुड के साथ बनाई उत्कारिका शीघ्र विरेचन करती है । अथवा—स्तुही के दूध, दूध सित्ता एवं घी से सिद्ध लेह विरेचक है । पिपलों को लवण (सैन्धव) से मिलाकर स्तुही के दूध में भावना देकर खाने से