भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सूधस्थानम्

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उसी प्रकार रहता है, तो समझना चाहिये कि गांग जल बरस रहा है। यदि रङ्ग बदल जाये, कोथ या गँदलापन दिखाई देवे तो समझना चाहिये कि 'सामुद्र' जल बरस रहा है। यह सामुद्र जल ग्रहण करने योग्य नहीं। सामुद्र जल को भी आदि आश्विन मास में ग्रहण किया जाये, तो यह भी गांग जल की भाँति हो जाता है। गांग जल श्रेष्ठ है, इसको आश्विन मास में जो शुद्ध-स्वच्छ-सफेद-फैले वख्त के एक भाग में गिरा हो उसे अथवा ईट आदि से बने महल की छत पर से या किन्हीं अन्य स्वच्छ पात्रों में इकट्ठा करके स्वर्ण चाँदी या मिट्टी के पात्र में रखना चाहिये। इस पानी का सब समय में उपयोग करना चाहिये, इसके न मिलने पर भूमि का पानी बरतना चाहिये। इस भूमि के पानी में आकाशगुण की अधिकता रहती है। यह पानी सात प्रकार का है। यथा—कौप (कुण्ड का), नादेय (नदी का), सारस (सरोवर का) ताङ्गा (तङ्गा का), प्रास्वण (झरने का), औद्विद (ओगल का), चौण्ध्य (बिना चिने कुण्ड का)।

वि० मन्तव्य—सामुद्र—सागर में सर्वदा नदियों, नदों द्वारा जल पड़ता—भरता रहता है, परन्तु वह उछलता नहीं, भरकर इधर उधर नहीं बहता—वेला का उल्लेखन नहीं करता, कारण यह है कि उसमें से बाह्य अग्नि के प्रभाव से तथा सूर्य के सन्ताप से सर्वदा वाष्प-भाप उड़ती रहती है, जो आजकल की भाषा में "मानसून" कही जाती है। इस मानसून के बादलों (मेघों) से जो जल बरसता है वह "सामुद्र" (समुद्र का) कहलाता है। और जो गंगा (गच्छति इति गंगा) अर्थात् चलती नदियों का जल भाप बनकर उड़ता है और फिर बरसता है वह "गाङ्ग" जल कहलाता है। विश्वास कीजिये कि—गंगा केवल भागीरथी नामक भारतीय एक नदी का नाम नहीं है, अपितु विश्व की समस्त गतिशील छोटी बड़ी नदियों का नाम है। वर्षा ऋतु में प्रायः मानसून का जल बरसता है और उसके व्यतीत होने के अनन्तर अगस्त्य का उदय होने पर—शरद् ऋतु में गाङ्ग जल बरसता है, तथापि उसकी उक्त विधि से परीक्षा कर लेनी चाहिये। सम्भव है शरद् ऋतु में भी सामुद्र जल बरस रहा हो और उसका सञ्चय करना व्यर्थ और पान हानिकर है। मले ही वह बरसात के जल की अपेक्षा शुद्ध—स्वच्छ होता है।

धार जल कभी कभी वर्षा होने पर गिरता है अथवा यों कहिये कि वर्षाजल का नाम "धार" है। करका ओलों का नाम है, ओले कुछ समय के पश्चात् जल रूप में परिणत हो जाते हैं उस जल का नाम "कार" है। तुषार "ओस" का नाम है उसके जल का नाम "तौषार" है, ओस सर्वदा पड़ती रहती है, परन्तु—प्रातःकाल में वास आदि पर दिखाई पड़ती

है। हिम नाम वर्षा का है, इसके जल का नाम "हेम" है। यह हिमालय को ऊँची चोटियों पर सर्वदा पड़ती रहती है और निम्नले प्रदेशों में कभी २ पड़ती है, उत्तरी तथा दक्षिणी भुव प्रदेशों में सर्वदा गिरती रहती है, परन्तु सर्वदा वाष्परूप में उड़ती भी रहती है। दोपहर का भात चाँदी के ही नहीं, किसी भी पात्र में रखने पर सायंकाल क्लेद युक्त हो जाता है, वह परीक्षार्थ वर्षा में नहीं—अभितु छाया में सिकहर पर घरा हुआ क्लेद युक्त हो जाता है। वस्तुतः समस्त वातावरण में उस समय सामुद्र जल व्याप्त रहता है। शरद् आदि ऋतु में वर्षा होती रहने पर भी भात में क्लेद (गीलापन) नहीं होता। शुचि.....निदध्यात्—स्वच्छ कपड़ा कुछ ढीला तान दिया जाता है, जब वर्षा होती है तब उस चौड़े-लम्बे कपड़ा पर गिरा वर्षा जल निचले पात्र में गिरता रहता है। अथवा पक्कों छत का जल सञ्चित कर लिया जाता है। इस प्रकार के जल के लिये गुजरात एवं सिन्धु देश में बड़ी २ टंकियाँ बना ली जाती हैं। वहाँ के निवासी उसी का पान करते हैं ॥७॥

तत्र वर्षास्वान्तरिक्षमौद्वभिदं वा सेवेत, महागुणस्वात्, शरदि सर्व, प्रसन्नस्वात्, हेमन्ते सारसं ताङ्गां वा, वसन्ते कौपं प्रास्वणं वा, ग्रीष्मेऽप्येवं, प्रावृषि चोण्ध्य-मनभिवृष्टं सर्वं चेति ॥८॥

वर्षा ऋतु में (आश्विन मास में, भाद्रपद में नहीं), आन्तरिक्ष या औद्वभिद जल सेवन करना चाहिये, (भाद्रपद में पानी को गरम करके या आकाशगुणबहुल भूमि में संचित पानी को पीना चाहिये)। क्योंकि ये दोनों प्रकार के पानी महान् गुणवाले हैं। शरद् ऋतु में सब प्रकार का पानी पीना चाहिये, क्योंकि अगस्त्य के उदय होने से सब प्रकार का पानी स्वच्छ हो जाता है। हेमन्त ऋतु में सरोवर या तङ्गाओं का पानी पीना चाहिये। वसन्त ऋतु में कुण्ड या झरनों का पानी पीना चाहिये। ग्रीष्म में भी कुण्ड या झरने का पानी बरतना चाहिये। प्रावृष्ट ऋतु में चोण्ध्य, (सरोवर या तङ्गा का या कुण्ड का पानी) बरसात का नहीं पीना चाहिये, परन्तु यदि बादल बरस रहा हो तो सब प्रकार का पानी पीना चाहिये।

वि० मन्तव्य—प्रावृषि.....चेति = प्रावृष्ट ऋतु में चोण्ध्य जल अथवा वर्षाजल के अतिरिक्त सब प्रकार का जल पीने तथा नहाने योग्य होता है ॥८॥

कीटमूत्रपुरोषाण्डशवकोथप्रदूषितम्।

तृणपणींस्करयुतं कलुषं विषसंयुतम् ॥९॥

१ वर्षा ऋतु में पानी दूषित होता है। यथा — "बलाहाकाद्याः समदाः कीटा लूनारुव खेवराः। तद्विषोत्सर्गसर्गादि न प्राह्यं ततदा जलम् ॥"