भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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मुश्रतसंहिता

[ अ० ४५ ]

योऽवगाहेत वर्षासु पिबेद्वाऽपि तत्र जलम् ।

स बाह्याभ्यन्तरान् रोगान् प्राप्नुयात् क्षिप्रमेव तु ॥

कीट (विषयुक्त-विच्छू आदि कीड़ों से), सूत्र, मल, अण्डों से, शव के कारण सड़ा एवं दूषित, तिनके एवं पत्तों के समूह के कारण दूषित, मलिन, विषयुक्त, वर्षाश्रु के (आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद) नवीन जल में जो स्नान करता है, या इस पानी को पीता है वह शीघ्र ही बाह्य एवं आभ्यन्तर-जन्य रोगों से आक्रान्त होता है ।

वि० सन्तत्य—प्रथिवी पर आठ मास का कूड़ा करकट एवं गन्दगी आदि मल सञ्चित रहता है और वह सव बरसात के जल में घुल मिल जाता है, फलतः बरसात का जल दूषित-मलिन गन्दा रहता है, बरसात के पश्चात् शरद् ऋतु में प्रथिवी-घुल जाती है—स्वच्छ हो जाती है, फलतः उस काल की वर्षा का जल भी शुद्ध-स्वच्छ रहता है ॥६,१०॥

तत्र यत् पङ्कशैवलहठरुणपद्मपत्रप्रभृतिभिरवच्छन्नं रविशशिकिरणानिलैर्नाभिजुष्टं गन्धवर्णरसोपसृष्टं तद्वा-पत्रमिति विद्यात् । तस्य स्पर्शरूपरसगन्धवीर्यविपाकदोषाः षट् संभवन्ति । तत्र, खरता पैच्छिल्यमौष्ण्यं दन्तग्राहिता च स्पर्शदोषः, पङ्कसिकताशैवालवहवर्णता रूपदोषः, न्यक्तरसता रसदोषः, अनिष्टगन्धता गन्धदोषः, यदुपयुक्तं तृष्णागौरवशूलकफप्रसेकानापाद्ययति स वीर्यदोषः, यदुपयुक्तं चिराद्विपच्यते विष्टम्भयति वा स विपाकदोष इति । त एते आन्तरिच्ये न सन्ति ॥११॥

जो पानी पङ्क (कीचड़), शैवाल (शिवाल काई)-हठ (जल-कुम्भी), तृण, पद्मपत्र (कमलपत्र) आदि से आच्छादित (ढँका) रहता है, चन्द्रमा, सूर्य की किरणें तथा वायु जिस पानी का स्पर्श नहीं करतीं, जिस पानी में गन्ध, वर्ण, रस स्पष्ट हो, उस पानी को दूषित समझना चाहिये । इस पानी में छे प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं, यथा—स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, वीर्य, विपाक, ये छे दोष होते हैं । इनमें—खरता (कर्कशता), पैच्छिल्य (पिच्छलता), मौष्ण्य (उष्णता), दन्तग्राहिता (दान्तों में लगना), ये स्पर्श दोष हैं । पङ्क (कीचड़), सिकता (रेत), शैवाल (सर-वाल), वहवर्णता (बहुत से रङ्ग होना), ये रूप के दोष हैं । रस का स्पष्ट होना रस का दोष है । इष्ट गन्ध का न होना गन्ध का दोष है । यदि सेवन करने से तृष्णा, भारीपन, शूल, लालासाय उत्पन्न हो तो वीर्य का दोष समझना चाहिये । यदि सेवन करने पर देर में जीर्ण होता है, पेट में गुड़-गुड़ शब्द उत्पन्न करता है, तो विपाक दोष समझना चाहिये । ये छे प्रकार के दोष आन्तरीक्ष जल में नहीं हैं ॥११॥

व्यापन्नस्य चान्निकवथनं सूर्यातपप्रतापनं तमायः

पिण्डसिकतालोष्ट्राणां वा निर्वापणं प्रसादनं च कर्तव्यं, नागचम्पकोत्पलपाटलापुष्पप्रभृतिभिश्चाधिवासनमिति ॥ स्वच्छ करने के उपाय—

अतिदूषित पानी को आग पर गरम करने से, अल्प दोष-वाले पानी को सूर्य की धूप में गरम करने से, मध्यम दोष युक्त पानी में लोहे की पिण्डका (गोले) को, रेत को या मिट्टी के ढेले को अग्नि में गरम करके पानी में बुझाने से तथा प्रसादन-नितारने पर निर्मली आदि से निर्मल करने से पानी स्वच्छ हो जाता है । दुर्गन्ध को दूर करने के लिये—नाग (नागकेसर), चम्पक (राजचम्पा), उत्पल (कमल), पाटला आदि (कैतकी, मलिका आदि) वस्तुओं से सुगन्धित करना चाहिये ॥१२॥

सौवर्णे राजते तात्रे कांस्थे मणिमयेऽपि वा ।

पुष्पावर्तसं भौमे वा सुगन्धि सडिलं पिबेत् ॥१३॥

स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य, मणि (स्फटिक एवं चाचमणि-काँच) अथवा मिट्टी के पात्र में जल पीना चाहिये और वह जल जिस पर फूल तेरते हों तथा जो सुगन्धित (गुलाब केवड़ा आदि से) हो । और इन्हीं स्वर्ण आदि के पात्रों में रखना भी चाहिये ॥१३॥

व्यापन्नं वर्जयेन्नित्यं तोयं यच्चाप्यनार्तवम् ।

दोषसंजननं ह्येतन्नाददोताहितं तु तत् ॥१४॥

व्यापन्नमुदकं यस्तु पिवतीहाप्रसादितम् ।

श्रयथुं पाण्डुरोगं च त्वग्दोषमविपाकताम् ॥१५॥

श्वासकासप्रतिशययशूलगुल्मोदराणि च ।

अन्यान्या विषमान् रोगान्प्राप्नुयादचिरेण सः ॥१६॥

दूषित एवं ऋतु के विपरीत (बिना ऋतु में बरसे) पानी का सदा परिश्रम करना चाहिये । इस प्रकार का पानी दोषों को उत्पन्न करता है और अहितकारी है । जो अदमी दूषित पानी को बिना स्वच्छ किये पीता है, उसको श्रयथु, पाण्डुरोग, त्वचा के रोग, अजीर्ण, श्वास, कास, प्रतिशय, शूल, गुल्म, उदररोग एवं अन्य विषम (कठिन) रोग शीघ्र ही उत्पन्न हो जाते हैं ॥१४-१६॥

तत्र सप्त कलुषस्य प्रसादानानि भवन्ति तद्यथा—कतक-गोमेदकबिसग्रन्थिशैवालमूलवस्त्राणि मुक्तामणिश्वेति ॥१७॥

सात वस्तुयें मलिन जल को स्वच्छ करनेवाली है । यथा—कतक (निर्मली), गोमेदक (गोमेद रत्न का तेजपात), बिसग्रन्थि (पद्ममूल), शैवालमूल (काई की जड़), वस्त्र, मुक्ता (मोती) मणि (फिटकारी आदि) ये वस्तुयें पानी को स्वच्छ करती हैं ॥१७॥

पञ्च निचेषणानि भवन्ति । तद्यथा—फलकं, ज्यघ्रकं, मुखवलयं, उदकमञ्जिका, शिक्यं चेति ॥१८॥