सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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पाँच वस्तुयें ऐसी हैं जिनके ऊपर पानी के बर्त्तन रखे जाते हैं, इस प्रकार करने से भूमि आदि का स्पर्श दोष नहीं लगता। यथा—फलक ( सिम्बल आदि का बना तख्ता ), श्वष्टक ( तिकटि ), मुखवलय ( मुखादि से गोल बने ईण्डचे ), उदकमंचिका ( घड़ौँची आदि ), शिक्य ( छिका आदि ) १८
सप्त जीतीकरणानि भवन्ति; तद्यथा—प्रवातस्थापनम्, उदकप्रक्षेपणं यष्टिकाभ्रामणं, व्यजनं, बक्षोद्दरणं, बालुकाप्रक्षेपणं शिक्यावलम्बनं चेति ॥ १९ ॥
पानी को ठण्डा करने के सात उपाय हैं—प्रवातस्थापन ( वायु में पानी को रखना ), उदकप्रक्षेपण ( पानी से भरे बर्त्तन पर बछ लपेटकर, पानी से तर रखना ); यष्टिकाभ्रामण ( यन्त्र, यष्ट्यादि का धुमाना ), व्यजन ( पंखा चलाना ), बक्षोद्दरणम् ( बछ द्वारा छानना ), बालुकाप्रक्षेपणम् ( पानी के बर्त्तन को रेत में गाड़ना या पानी में रेत डालना ), शिक्यावलम्बनम् ( छींके पर घड़े को लटकाना ) ॥ १९ ॥
निर्गन्धमव्यक्तसं तुष्णाद्यनं शुचि शीतलम् ।
अच्छं लघु च हृद्यं च तोर्य गुणवदुच्यते ॥ २० ॥
भूमि के पानी के गुण—निर्गन्ध, अव्यक्तसं, तुष्णानाशक, शुचि ( अदूषित ), शीतल, स्वच्छ, लघु हृदय के लिये प्रिय पानी गुणवाला कहा जाता है ॥ २० ॥
तत्र नद्यः पश्चिमाभिमुखः पथ्याः, लघूदकत्वात्, पूर्वभिमुखस्तु न प्रशस्यन्ते, गुरुदकत्वात्, दक्षिणाभिमुख नातिदोषलाः, साधारणत्वात् । तत्र सद्यप्रभवाः कुष्ठं जनयन्ति, विन्ध्यप्रभवाः कुष्ठं पाण्डुरोगं च, मलयप्रभवाः क्रमीन, महेन्द्रप्रभवाः श्लीपदोदराणि, हिमवत्प्रभवा हृद्गोत्रशययुशिरोगश्चोपदगलगण्डान्, प्राच्यवन्त्या अपरावन्त्याश्चाशौस्यपजनयन्ति, पारियात्रप्रभवाः पथ्या बलारोग्यकर्म इति ॥ २१ ॥
इनमें पश्चिम समुद्र में गिरनेवाली ( जांगल-प्रदेशस्थ ) नदियाँ पथ्यकारक हैं, हल्का पानी होने से। पूर्व के समुद्र में गिरनेवाली ( आनूप-प्रदेशस्थ ) नदियाँ उत्तम नहीं, भारी पानी होने से। दक्षिण के समुद्र में गिरनेवाली ( मध्य देश में स्थित ) नदियाँ बहुत अधिक दोष युक्त नहीं; क्योंकि इनका पानी साधारण है। इनमें सद्यादि की पर्वतमाला से उत्पन्न होनेवाली नदियाँ कुष्ठरोग को उत्पन्न करती हैं, विन्ध्याचल से उत्पन्न होनेवाली नदियाँ कुष्ठ एवं पाण्डुरोग को उत्पन्न करती हैं, मलय पर्वत से निकलनेवाली ( जिनमें रेत और पत्थर नहीं होता ) नदियाँ क्रमिरोग को उत्पन्न करती हैं ( रेत और पत्थर वाली नदियाँ पथ्यकारी हैं )। महेन्द्र पर्वत से उत्पन्न होनेवाली नदियाँ श्लीपद एवं उदर रोगों को उत्पन्न करती हैं। हिमालय से ( अधोभाग में से ) उत्पन्न होनेवाली नदियाँ हृदयरोग,
शययु, शिरोरोग, श्लीपद, गलगण्ड रोग को उत्पन्न करती हैं ( हिमाचल के ऊपर के भाग से उत्पन्न होनेवाली नदियाँ पथ्यकारी हैं )। अवन्ती (उज्जयनी) प्रदेश के पूर्व भागों से उत्पन्न ( प्राच्यवन्त्या ), अवन्ती के पश्चिम भाग से उत्पन्न नदियाँ अशौरोग को उत्पन्न करती हैं। पारियात्र पर्वत से उत्पन्न ( तडागजन्म-मानसरोवर आदि से ) नदियाँ पथ्यकारक, बलकारक और आरोग्यकारक हैं। ( गुहाओं में उत्पन्न नदियाँ दोषयुक्त हैं )।
वि० मन्तव्य—भारत के पश्चिम समुद्र की ओर मुखवाली या उसमें गिरनेवाली पथ्य-हित होती है, यथा शतलुज, व्यास, आदि फलतः वहाँ के निवासी अधिक स्वस्थ होते हैं। पूर्व समुद्र की ओर मुखवाली या उसमें गिरनेवाली नदियाँ यथा—गङ्गा, यमुना एवं सरजू आदि प्रशस्त—पथ्य नहीं है, फलतः उनके समीप रहनेवाले अधिक स्वस्थ नहीं होते। यद्यपि-हिमालय से दोनों प्रकार की नदियाँ निकलती हैं, तथापि उनका प्रभाव भिन्न २ होता है, पाठक ध्यान दें। इसी प्रकार अन्य नदियों का प्रभाव भी वहाँ के निवासियों पर पड़ता है ॥ २१ ॥
नद्यः शीघ्रवहा लक्ष्यः प्रोक्ता याश्चागमलोदकाः ।
गुर्ज्यः शैवालसंछन्नाः कलुषा मन्दगाश्च याः ॥ २२ ॥
प्रायेण नद्यो मरुषु सतिक्ता लवणान्विताः ।
लक्ष्यः समधुराश्चैव पौरुषेया बले हिताः ॥ २३ ॥
जो नदियाँ तीव्र गति से बहती हैं, और जिनका पानी स्वच्छ है, वे लघु गुणवाली होती हैं। जो नदियाँ शैवाल से ढँपी रहती हैं, धीरे २ बहती हैं, जिनका पानी गंदला रहता है, वे गुरु होती हैं। मरु-रेतीले मैदान की नदियाँ तिक एवं लवण रसवाली प्रायः होती हैं, इनमें थोड़ा कषाय रस भी होता है, मधुर लघु-विपाकवाली बलकारक एवं हितकारी हैं।
वि० मन्तव्य—विश्वभर की नदियों के सम्बन्ध में यह दोनों श्लोक लागू होते हैं—इस विधि में दो नदियाँ दो भागों में विभक्त की गई हैं, १—शीघ्रवहा—शीघ्रगामी प्रवाहवाली और २—मन्दगा—मन्द प्रवाहवाली। भारतीय पुराण गाथाओं के अनुसार—शीघ्रवहा नदियाँ “गङ्गा” कही जा सकती हैं और गङ्गा विष्णुपदी है और विष्णु—पालन के अधिष्ठात्री देवता हैं। और मन्दगा नदियाँ “यमुना” कही जा सकती हैं और यमुना यमकी भगिनी हैं और यम संहार (मृत्यु) का अधिष्ठात्री देवता हैं, फलतः मन्दगा नदियों के समीपवासी अधिक स्वस्थ नहीं होते। एक और बात है—एक ही नदी कहीं पर शीघ्रवहा रहती है, जैसे हरिद्वार में गङ्गा और कहीं पर मन्दगा रहती है जैसे—काशी में गङ्गा। एक और जल की विकृति का कारण है ‘अमीरा’ नामक जन्तु से, जो सन्तान बढ़ि करके जल में पिछल जाला का रूप धारण कर लेता है,