सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
[ अ० ४५ ]
फलतः जल विकृत हो जाता है। अतएव यजुर्वेद में 'अनमीवा' अमीवारहित जल के लिये प्रार्थना की गई है। देखिये—'अप-मीवां वाधते (अमीवां अपवाधते)' सूर्य अमीवा को नष्ट करता है (यजु० अ० २४—मं० २५)। श्राव्यः वीता भवत युय आपोऽस्माकं अन्तः उदरे सुशेषाः। 'ताऽस्मभ्यं अयद्भ्या अन-मीवा' और शीघ्रवहा नदियों के जल पत्थरों पर टकराते हैं, फलतः अमीवा मर जाता है और जल विकृत नहीं होता—जैसे हरिद्वार की गङ्गा का जल। शीघ्रवहा का जल लघु और मन्दगा का जल गुरु होता है। 'अनागसः स्वदन्तु देवीः अमृता मृतो मृधः' यजु० अ० ४—१२ ॥ २२, २३ ॥
तत्र सर्वेषामेव भौमानां ग्रहणं प्रत्युषसि, तत्र ह्यम-लत्वं शैत्यं चाधिकं भवति, स एव चापां परो गुण इति ॥ सब प्रकार के भूमि जलों को प्रातःकाल (उषःकाल) में संग्रह करना चाहिये। इस समय पानी के अन्दर निर्मलता और शीतलता सब समयों से अधिक रहती है। ये ही दोनों गुण जल के श्रेष्ठ गुण हैं ॥ २४ ॥
दिवार्ककिरणेर्जुष्टं निशायामिन्दुरशिमभिः। अरुह्यमन्मिष्यन्दि तत्तुल्यं गगानाम्बुना ॥ २५ ॥
दिन भर सूर्य की किरणों से व्याप्त और रात में चन्द्रमा की किरणों से शीतल किया हुआ पानी आकाश के पानी के समान रूक्षतारहित (स्नेह-युक्त), अनमिष्यन्दि (रोगों को न उत्पन्न करनेवाला) होता है।
वि० मन्तव्य—इसको चरक एवं वाग्भट ने 'हंसोदक' कहा है ॥ २५ ॥
गगानाम्बु त्रिदोषघ्नं गृहीतं यत् सुभाजने।
वलयं रसायनं मेध्यं पात्रापेक्षि ततः परम ॥ २६ ॥
उत्तम पात्र में यदि नरसात का पानी इकट्ठा किया जाये तो यह त्रिदोषनाशक, बलकारक, रसायन पवित्र होता है। अधिक श्रेष्ठ (स्वर्ण आदि के) पात्र में इकट्ठा करने से और अधिक गुणशाली होता है ॥ २६ ॥
रक्षोघ्नं शीतलं ह्लादि ज्वरदाहविषापहम्।
चन्द्रकान्तोद्भवं वारि पित्तघ्नं विमलं स्मृतम् ॥ २७ ॥
चन्द्रकान्त मणि से उत्पन्न जल राक्षसभय को दूर करनेवाला, शीतल, सुखदायक, ज्वरदाह-विष का नाश करनेवाला, पित्तनाशक और स्वच्छ होता है। चन्द्रमा की किरणों के प्रविष्ट होने से नामस, मणिसे उत्पन्न होने के कारण भोग है।
वि० मन्तव्य—जैसे सूर्यकान्त (अतसी शीशा इसी का प्रतिनिधि है) में सूर्य की किरण पड़ने पर अग्नि उत्पन्न हो जाती है, वैसे ही चन्द्रकान्त मणि पर चन्द्रमा की किरण पड़ने से जल चूने लगता है—यथा शीशा के पात्र में बर्फ रखने से पात्र के बाह्य घुट्ट पर जल के कण बैठ जाते हैं, वह वस्तुतः
आकाश जल के कण होते हैं। आकाश का आन्तरिज जल जो अब तक बाष्परूप में था वही बर्फ की शीतता से जल रूप होकर बर्फ के पात्र पर बैठ गया है ॥ २७ ॥
मूच्छांपित्तोष्णदाहेषु विषे रक्ते सदात्यये।
भ्रमकमपरीतेषु तमके व्रमथौ तथा ॥ २८ ॥
ऊर्ध्वगै रक्तपित्ते च शीतमभ्रमः प्रशस्यते।
निम्न अवस्थाओं में शीतल पानी का देना उत्तम है—मूच्छा, पित्तबृद्धि, उष्ण (शरद् एवं ग्रीष्मऋतु में) दाह में, विषविकार में, रक्तविकार में, मद्यविकार में, भ्रम (चक्कर आने) में, क्लम (थकान आने) पर, तमक श्वास में, वमन में, और ऊर्ध्वमार्गगामी रक्तपित्ते में शीतल जल देना चाहिए ॥
पाश्वशूले प्रतिश्याये वातरोगे गलग्रहे ॥ २९ ॥
आधमाने स्तिमिते कोष्ठे सद्यःसुद्धे नवज्वरे।
हिक्कायां स्नेहपीते च शीताम्बु परिवर्जयेन ॥ ३० ॥
निम्न अवस्थाओं में शीतल पानी नहीं देना चाहिये। (उष्ण पानी बरतना चाहिये)। यथा—पाश्वशूल में, प्रतिश्याय में, वातरोग में, गलग्रह में, आधमान में, स्तिमित (आम) कोष्ठ में, जिस दिन संशोषन लिया हो उस दिन, नवज्वर में, हिक्कीरोग में, स्नेहपान करने पर शीतल जल नहीं देना चाहिये ॥ २९, ३० ॥
नादैयं वातलं रूक्षं दीपनं लघु लेखनम्।
तदभिष्यन्दि मधुरं सान्द्रं गुरुं कफावहम् ॥ ३१ ॥
तृष्णाघ्नं सारसं वल्यं कषायं मधुरं लघु।
ताडागं वातलं स्वादु कषायं कटुपाकि च ॥ ३२ ॥
वातश्लेष्महरं वाष्पं सक्षारं कटु पित्तलम्।
सक्षारं पित्तलं कौषं श्लेष्मघ्नं दीपनं लघु ॥ ३३ ॥
चौण्द्यमग्निकरं रूक्षं मधुरं कफक्रुचं च।
कफघ्नं दीपनं हृयं लघु प्रसन्नवोद्भवम् ॥ ३४ ॥
मधुरं पित्तशमनमविदाहोद्भिदं स्मृतम्।
वैकिरं कटु सक्षारं श्लेष्मघ्नं लघु दीपनम् ॥ ३५ ॥
कैदारं मधुरं प्रोक्तं विपाके गुरु दाषलम्।
तद्वत्पलवलमुद्भिदं विशेषादोषलं तु तत् ॥ ३६ ॥
सामुद्रमुदकं विषं लवणं सर्वदोषकृतं।
शीघ्रवहा नदी का जल—वायुकारक, रूक्ष, अग्निदीपक, लघु, लेखन होता है। मन्दगा नदियों का पानी अभिष्यन्दि (दोष-प्रकोप), मधुर, सान्द्र, गुरु और कफवर्धक होता है। सरोवर का पानी तृष्णानाशक, बलकारक, कषाय एवं मधुररस लघु होता है। तडाग का जल वायुकारक, स्वादु, कषायरस एवं कटु-विपाकयुक्त होता है। वापी का जल-वात-कफ-नाशक, क्षारयुक्त, कटुरस और पित्तवर्धक है। कुंए का खारा पानी-क्षारयुक्त, पित्तकारक, श्लेष्मनाशक, अग्निदीपक और लघु है। (कई कुओं का पानी अन्यकरस होता है)। चौण्द्य (बिन्ना