भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४५ ]

सूत्रस्थानम्

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चिने कुर्प का) पानी अग्निकारक, रूक्ष, मधुर और कफ नहीं करता। झरने का पानी—कफनाशक, अग्निदीपक, हृदय के लिये प्रिय, लघु होता है। औदुम्बिद (ओगल, जमीन से निकला) पानी मधुर, पित्तशामक, अविदाही होता है। वैकिर ( रेत आदि हटाकर प्राप्त किया पानी, फलगु नदी आदि का ) पानी कटु क्षारयुक्त, श्लेष्मानाशक, लघु और अग्निदीपक है। केदार (खेतों) का पानी मधुर, विपाक में गुरु और दोषप्रकोपक है। पल्लव (छोटे गड्ढों) का पानी भी केदार के पानी के समान है, विशेषतया दोषप्रकोपक है। समुद्र का पानी-विष ( दुर्गन्ध-युक्त), लक्षण मिश्रित, सब दोषों का प्रकोपक है ॥३१-३६॥

अनेकदोषमानूपं वार्यभिष्यन्दि गहितम् ॥३७॥

एभिदोषैरमंयुक्तं निरवर्धं तु जाङ्गलम् ।

पीतेऽविदाहि तृष्णाघ्नं प्रशस्तं प्रीतिवर्धनम् ॥३८॥

दीपनं स्वादु शीतं च तोयं साधारणं लघु ।

आनूप देश का पानी—अनेक दोषों से युक्त, अभिष्यन्दि (सम्पूर्ण देह में व्याप्त होनेवाला है), और निन्दित है। जांगल देश का पानी—आनूपदेश के पानी के दोषों से रहित और प्रशंसित है। साधारण देश का पानी दाह उत्पन्न नहीं करता, तृष्णानाशक, श्रेष्ठ, प्रीति को बढ़ानेवाला, अग्निदीपक, स्वादु, शीतल और लघु होता है ॥३७,३८॥

कफमेदोऽनिलामघ्नं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥३९॥

श्वासकासज्वरहरं पथ्यमुष्णोदकं सदा ।

गरम पानी—कफ, मेद, वायु और आम का नाशक अग्निदीपक, बस्तिका शोधन करता है, श्वास, कास एवं ज्वर को दूर करनेवाला—सदा पथ्य (हितकारी) है ॥३९॥

यत् काथ्यमानं निर्वर्गं निष्केनं निर्मलं लघु ॥४०॥

चतुर्भागवशेषं तु तत्तोयं गुणयत् स्मृतम् ।

जो पानी पकाने से निर्वर्ग (निश्चेष), क्षागरहित, निर्मल एवं चौथाई बचाया जाता है, वह लघु एवं अधिक गुणकारी होता है ॥४०॥

न च पर्युषितं देयं कदाचिद्वादि जानता ॥४१॥

अम्लीभूतं कफोत्कटेदि न हितं तत् विपासवे ।

रात का बासी पानी कभी भी पीने के लिये नहीं देना चाहिये। जो कि अम्ल हो जाता है, कफ को कुपित करता है, वह प्यासे मनुष्य के लिये हितकारी नहीं होता ॥४१॥

मद्यपानात्समुद्भूते रोगे पित्तोत्थिते तथा ॥४२॥

सन्निपातसमुत्थे च शूतशीतं प्रशस्यते ।

मद्यपान से उत्पन्न रोग में, पित्तजन्य रोग में एवं सन्निपातजन्य रोग में, गरम करके ठंडा किया पानी बरतना चाहिये ॥

स्निग्धं स्वादु हिमं हृद्यं दीपनं बस्तिशोधनम् ॥४३॥

वृष्यं पित्तपिपासाघ्नं नालिकेरोद्गकं गुरु ।

नारियल का पानी—स्निग्ध, मधुर, हिम (ठण्डा), हृदय के लिये प्रिय, अग्निदीपक, बस्ति का शोधक (मूत्रल), वृष्य (वीर्यवर्धक), पित्त एवं पिपासा का नाशक और गुरु है ॥४३॥ दाहातीसारपित्तास्तुङ्गमूच्छीमद्यविधातिषु ॥४४॥

श्रुतशीतं जलं शस्तं तृष्णाच्छुद्धिभ्रमेषु च ।

निम्न अवस्थाओं में गरम करके ठण्डा किया हुआ जल देना चाहिये—दाह, अतीसार, रक्त-पित्त, मूच्छी, मेद्यजन्य मत्तता—विष रोग में, तृष्णा, वमन और प्रमरोग में गरम पानी को ठण्डा करके देना चाहिये ॥४४॥

अरोचके प्रतिरुयाये प्रसेके क्षयथौ क्षये ॥४५॥

मन्देऽग्नानुदरे कुष्ठे ज्वरे नेत्रामये तथा ।

ब्रणे च मधुमेहे च पानीयं मन्दमाचरेत् ॥४६॥

इति जलवर्गः

निम्न अवस्थाओं में पानी थोड़ा या धीरे-धीरे पीना चाहिये—अरुचि में, प्रतिरुयाय में, मुख लाला (लार) बहने में, रूचयथु में, क्षय में, अग्निमान्द्य में, उदर रोग में, ज्वर में, नेत्ररोगों में, ब्रण-रोग में, मधुमेह में, पानी धीरे-धीरे (वूट-वूट) पीना चाहिये ॥४५,४६॥

इति जलवर्गः ।

अथ क्षीरवर्गः ।

गण्यमाजं तथा चौष्ट्रमाविकं माहिषं च यत् ।

अश्वायाश्चैव नार्याश्च करेणूनां च यत्पयः ॥४७॥

इसके आगे दूध का वर्ग कहते हैं—

दूध आठ प्रकार का है, यथा—गाय का, बकरी का, जूँटनी का, मेड़ का, मैस का, घोड़ी का, खी का, हथिनी का—इन आठों का दूध व्यवहार में आता है ॥४७॥

तत्त्वनेकौषधिरसप्रसादं प्राणदं गुरु ।

मधुरं पिच्छिलं शीतं स्निग्धं श्लक्ष्णं सरं मृदु ।

सर्वंप्राणभूतां तस्मात् सात्स्यं क्षीरमिहोच्यते ॥४८॥

यह दूध अनेक द्रव्यों ( वनस्पतियों ) के रस का प्रसाद (सार रूप) है, इसलिये सब प्राणियों के लिये सात्स्य रस होता है। इस दूध में ओज के दस गुण हैं—यह मधुर, पिच्छिल, शीत, स्निग्ध, श्लक्ष्ण, सर, मृदु, प्राणों को देनेवाला और गुरु है ॥४८॥

तत्र सर्वमेव क्षीरं प्राणिनामप्रतिषिद्धं जातिसा- त्म्यात्, वातपित्तशोणितमानसेष्वपि विकारेष्वविरुद्धं, जौर्णज्वरकासश्वासशोषक्षयगुरुस्नोन्मादोदरमूच्छीप्रमसद- दाहपिपासाहृद्वस्तदोषपाण्डुरोगग्रहणीदोषार्शःशूलोदावर्ती-

१ विस्तार के लिये देखिये चरकसंहिता में ओज एवं गाय के दूध के गुण, जो परस्पर समान हैं। यथा— तदेवं गुणमेवाजःसामान्यादभिवर्धयेत् ॥