सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४५ ]
तिसारप्रवाहिका योनिरोगभं स्नावरक्तपित्तश्रमकलमहरं , पाप्मापहं बल्यं वाजीकरणं रसायनं मेध्यं वयःस्थापन- मायुष्यं जीवनं वृंहणं संधानं वमनविरेचनास्थापनं तुल्यगुणत्वाच्चौजसो वर्धनं बालवृद्धश्रुतक्षीणानां झुद्धव्या- यव्यायामकशितानां च पथ्यतमम् ॥४६॥
यह आठों प्रकार का दूध सब जरायुज प्राणियों के लिये अनुकूल है, जन्म से ही सुखकारक होने से । वात-पित्त रक्त एवं मानस (रज तम-संरगजन्म) रोगों में विरुद्ध भी नहीं है । जोर्णज्वर, कास, श्वास, शोष, क्षय, गुल्म, उन्माद, उदर, मूर्च्छा, भ्रम, बाह, प्यास, हृद्व्रोग, वस्तिदोष, (मूत्रदोष), पाण्डुरोग, ग्रहणी दोष, अर्श, शूल, उदावर्त्त, अतिसार, प्रवाहिका, योनिरोग, गर्भस्त्राव, रक्त, पित्त, भ्रम, कलम का नाशक, पापनाशक, बल्य, वाजीकरण, रसायन, मेध्य, (मेघाजनक), सन्धान (भग्न को जोड़नेवाला), वयस् का आस्थापन, आयुष्य, जीवन, वृंहण, वमन, विरेचन, आस्थापन, ओज के समान गुणवाला होने से आयुवर्धक, बालक, वृद्ध, क्षत क्षीण पुरुषों के लिये एवं मूल, व्यायाम (मैथुन) और व्यायाम से कृश हुए पुरुषों के लिये अतिशय पथ्य है ॥४६॥
अल्पाभिष्यन्दि गोक्षीरं स्निग्धं गुरु रसायनम् ।
रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः ॥५०॥
जीवनीयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम् ।
गाय का दूध—अल्पाभिष्यन्दि ( रोगोत्पादक नहीं ), स्निग्ध, गुरु, रसायन, रक्तपित्तनाशक, शीतल, मधुररस, एवं विपाक में मधुर, जीवनधारक (प्राणदायक), अतिशयेन वात-पित्तनाशक है ॥५०॥
गन्धतुल्यगुणं त्वाजं विशेषाच्छोषिणां हितम् ॥५१॥
दीपनं लघु संग्राहि श्वासकासस्रपित्तनुत् ।
अजानामल्पकायत्वात् कटुतिकर्त्तव्येषणात् ॥५२॥
नात्यश्चुपानाद्ब्यायामात् सर्वन्याधिहरं पयः ।
बकरी का दूध—गाय के दूध के समान गुणवाला है, खास-कर क्षयरोगियों के लिये हितकारी है । अग्निदीपक, लघुसंग्राहक श्वास कास-रक्त-पित्त-नाशक है । बकरियों का शरीर छोटा होने से, कटु-तिक रस के सेवन करने से, थोड़ा पानी पीने से, व्यायाम करने से, इनका दूध सब रोगों का नाश करनेवाला है ॥
रूक्षोष्णं लवणं किंचिदीदृष्टं स्वादुरसं लघु ॥५३॥
शोफगुल्मोदराशौघ्नं कुमिकुष्ठविषापहम् ।
ऊँटनी का दूध—रूक्ष, उष्ण, लवणरस (थोड़ा) और मधुररस, लघु है । शोफ, गुल्म, उदर, अर्श रोगनाशक एवं कुमि, कुष्ठ, विष को दूर करता है ॥५३॥
आविकं मधुरं स्निग्धं गुरु पित्तकफावहम् ॥५४॥
पथ्यं केवलवातेषु कासे चानिलसंभवे ।
भेड़ का दूध—मधुर, स्निग्ध, गुरु है । पित्त एवं कफ का नाशक; शुद्ध वायुरोगों में एवं वायुजनित कासरोग में पथ्य है । (कई आचार्य सेक के लिये इसको उत्तम मानते हैं) ॥५४॥
महाभिष्यन्दि मधुरं माहिषं बहिनाशनम् ॥५५॥
निद्राकरं शीतकरं गन्धान् स्निग्धतरं गुरु ।
भैंस का दूध—दोष-धातु-मल क्षीतों में अतिशय रूप से क्लेद उत्पन्न करने के कारण अभिष्यन्दि, मधुर, अग्निनाशक, निद्रा को उत्पन्न करनेवाला, अधिक शीतल है, गाय के दूध से अधिक स्निग्ध और गुरु है ॥५५॥
उष्णमेकशफं बल्यं शाखावातहरं पयः ॥५६॥
मधुराम्लरसं रूक्षं लवणानुरसं लघु ।
चोड़ी (एक शफ वाली) गंधी का भी दूध—उष्ण, बल-कारक, बाहु, जंघा की वायु नाशक, मधुर, अम्लरस, रूक्ष, लवण अनुरस वाला और लघु है ॥५६॥
नाथस्थु मधुरं स्तन्यं कषायानुरसं हिमम् ॥५७॥
नस्याश्च्योतनयोः पथ्यं जीवनं लघु दीपनम् ।
स्त्रियों का दूध—मधुर, कषाय-अनुरस, शीतल, नस्य एवं आश्च्योतन (आँखों में छोड़ने के) कार्य में पथ्य, जीवन लघु अग्निदीपक है ॥५७॥
हस्तिन्या मधुरं वृष्यं कषायानुरसं गुरु ॥५८॥
स्निग्धं स्थैर्यकरं शीतं चक्षुष्यं बलवर्धनम् ।
हथिनी का दूध—मधुर, वृष्य (वाजीकरण), कषाय-अनुरस, गुरु, स्निग्ध, स्थिरता उत्पन्न करनेवाला, शीतल आँखों के लिये हितकारी और बलवर्धक है ॥५८॥
प्रायः प्राभातिकं क्षीरं गुरु विष्टम्भि शीतलम् ॥५९॥
राञ्ज्याः सोमगुणत्वाच्च व्यायामाभावतस्तथा ।
प्रायः प्रातःकाल का दूध गुरु विष्टम्भि, शीतल होता है । क्योंकि रात्रिकाल सोमगुण युक्त होता है, और व्यायाम का अभाव रहता है ॥५९॥
दिवाकराभितमानां व्यायामानिलसेवनात् ॥६०॥
श्रमघ्नं वातनुच्छेदै चक्षुष्यं चापराह्मिकम् ।
सायंकाल का दूध—सूर्य की किरणों से गौ आदि गरम होने से, व्यायाम एवं वायु के सेवन से वायु का अनुलोमक, यकान को दूर करनेवाला और आँखों के लिये हितकारी है ॥६०॥
पयोऽभिष्यन्दि गुर्वामं प्रायशः परिकीर्तितम् ॥६१॥
तदेवोक्तं लघुतरमनभिष्यन्दि वै श्रुतम् ।
कच्छा दूध—अभिष्यन्दि और प्रायः गुरु, होता है । यही दूध पक्ककर—बहुत ही लघु और अनभिष्यन्दि हो जाता है ॥
वर्जयित्वा क्षियाः स्तन्यमाममेव हि तद्वितम् ॥६२॥
खी के दूध को छोड़कर अन्य सब दूधों को गरम करके पीना चाहिये । खी का दूध कच्छा ही हितकारी है ॥६२॥