भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अण ४५ 1 २२ धासेष्णं गुणवत्‌ क्षीरं विपरीतमतोऽन्यथा |

धारेष्ण दुध-गुणवाला होता है, इससे विपरीत अर्थात्‌

देर से निकाला हआ दूध गुण्ीन होता हे ॥६२॥ तदेवाति श्तं ओतं गुर बृंहणमुच्यते ।६३॥

इसी दूध को यदि अधिक पकाया जायतो शीतर, गुर र वरंहण (देदश्ृद्धिकारक) होता हे ॥६२॥

अनिष्टगन्धमम्छं च विवणं विरसं च यत्‌

वञयं सख्वणं क्षीरं यच्च विग्रथितं भवेत्‌ ॥६४॥ इति क्षीरवगः ।

निम्न प्रकार का दूध-अनिष्टगन्ध (जिस दघ मे इष्ट गन्ध

न हो), अम्छरस, विवणं ( शुक्ल से अन्य रंगवाला ), विरस

(मधुर से अन्य रसाला), ख्वणयुक्त, विग्रथित (फटा इभ) त्याज्य है ॥६४॥

| ॥ | अथ दधिवगेः | द्धि मधुरमभ्छमत्यम्टं चेति; तत्कषायानुरसं स्निग्ध मुष्णं पीनसविषमञ्वरातिसारारोचकमून्कृच्छकार्यौपहं

वृष्य प्राणकरं मङ्गल्यं च ॥६५॥ | द्ही तीन प्रकार काहे, यथा--मधुर, अम्ल, अव्यग्ल

(अतिखड्ा) । दही के सामान्य गुण-कपरायअनुरस, स्निग्ध,

तथा उष्णएवीय दै, पीनस, विषमञ्वर, अतिसार, अर्चि, मूतर- कृच्छर, शता को दूर करनेवारा, वृष्य, प्राणकारक ओर मंगल्य (पवित्र) हे १ ॥६५॥ महाभिष्यन्दि मधुरं कफमेदोविवधेनम्‌ ।

कफपित्तकृद्म्छ स्यादर्यम्छं रक्तदूषणम्‌ ॥&६॥ मधुर दही--महा अभिष्यन्दि, कफ एवं मेद को बद़ने- बाला है, अम्डदही-कृए- पित्त को करता दै, अस्यम्छ दही र्त को दूषित करता दे | ६६॥ विदाहि सृष्टविण्मूत्रं मन्दजातं त्रिदोषङ्त्‌ । मन्द्‌ जात दही--(जो दही मी प्रकार से नदीं जमा) दादी, मलमूत्र को प्रहृत्त करनेवाला एवं तीन दोषों को कुपित करता है ॥ थ | | प्नं विपाके मधुरं दीपनं.बरवरधनम्‌ ॥६७॥ वातापहं पविच्रं च दधि गण्यं रुचिप्रदम्‌। गाय का दही- स्निग्ध, विपाक मे मधुर, अभिदीपक,

स्वधक, वात को दूर करनेवाला, पवि, खचिप्रद होता है रभ्याजं कफपित्तघ्नं छघु वातक्षयापहम्‌ ॥६८॥ इुनामश्वासकासेषु हितमग्नेश्च दीपनम्‌ । बकरी शि दही-कफ.पित्तनारक, ल्घु; श दूर

क मभिदौपक है अश; श्वास; श्वास, कास कास रोग रोग स मे हितकारी एवं |

दधि तु मधुरं सष्टपरीषं गवम्नमभिष्यनद, इलष्मपित्त- शश्यापहं रोचनं साङ्ख्यं च. तदेव चोद्धृतसारं च) ससरं कफमेदःगुक्रकृत्‌ । त्रिदोषङ्ृन्मन्द्‌- । भातम्‌ ॥ यह पाठन्तर है \

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सूत्रस्थानम्‌ ९६९ विपाके मधुरं चृष्यं बातपित्तग्रसादनम्‌ ॥६९॥

बर ।सघधनं सिनिगधं विरोषादयि माहिषम्‌ ।

मस का दही- विपाक मे मधुर, इष्य, वातपित्त को शान्त करनेवाखा, कफवधक विशेष कर स्निग्ध है |६६॥ विपाके कटु सक्षारं गुरु भेदयौष्टकं दधि ॥७०॥ वातमासि कुष्ठानि कृमीन्‌ हन्द्युदराणि च । ऊटनी का दही-विपाक मेकटु, क्षारयुक्त, गुरु, मेदक (विरेचक), वायु, अशं, कुष्ठ, कृमि ओर उदररोग को न करता हे ॥(७०] कोपनं कफवातानां दु नौम्नां चाविकं दधि ॥७१॥

रसे पाके च मधुरमत्यभिष्यन्दि दोषलम्‌ । मेड का दही-कफ़, वायु एवं अशंरोग को बदाता है । रस ओर विपाक मे मधुर, अयन्त अभिष्यन्दि. ओर दोषों को कुपित करता है (अपथ्य होने से विकार उन्न करता है) ॥७१॥ दीपनीयम च्ष्यं वाडवं दधि वातलम्‌ ॥०२॥

रुक्षयुष्णं कषायं च कृफमूत्रापहं च तत्‌ । घोड़ी के दूध का दही -अग्निदीपक, अखोंकेल्यि

अहितकर, वायुजनक, रूक्ष; उष्ण, कपायरख, कफ एवं मूत्ररोग को दूर करता है ॥७२॥

स्निग्धं विपाके मधुरं बल्यं संतपेणं गुर ॥७३॥ चचुष्यमम्रयं दोषघ्नं दधि नायो गुणोत्तरम्‌ ।

स्री के दूध का दही- स्निग्ध, विपाक मे मधुर, बरुकारक,

सन्तपक, गुरु आंखों के स्थि अति श्रेष्ठ, दोषनाश्क एवं गुणों

मे उत्कृष्ट हे ॥७२॥ | घु पाके बखासषनं वीर्योष्णं पक्तिनाशनम्‌ ॥७३॥

कषायानुरसं नाग्या दधि वर्चोविवधेनम्‌।

हथिनी के दध का दही--विपाक में ल्घु, कफना्क; उष्णवीयं, अग्निमान्यकारक, कषाय--अनुरस, मर को बढ़ाने-

वाला है ॥७४॥ | | द्धीन्युक्तानि यानीह ग्यादीनि प्रथक्‌ प्रथक्‌ ॥७५॥। विज्ञेयमेवं सवेषु गन्यमेव गुणोत्तरम्‌ ।

यहा पर गाय आदि के दही के जो जो गुण प्रथक्‌ रूप से कटे ह, इन सब मे गाय के दुध का दही ही उत्तम गुणवाडा

समश्चना चाये ॥७५॥ = ` | |

वातष्तं कफकृत्‌ स्तिरधं इहं नाति पित्तञ्कत्‌ ॥७६॥

कुयाद्रक्ताभिखाषं च दधि यत्‌ सुपरिखतम्‌।

वस्र मे से छाना दही-वायुनाशक, कफकारक, स्तिग्ध) हण (देहवधंक) है, पित्त को बहुत नहीं बढाता 1 भोजन में

खचि उत्पन्न करता ह ॥७६॥ =

शतात्‌ क्षीरात्त॒ यज्ञात गुणबहधि तत्‌ स्पृतम्‌ ॥अ9. `

`. वातपित्तहरं रुच्य धाटग्निबिर्वधेनम्‌ ( ~ र + क ~

च कर