भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 218

१७०

सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४९ ]

दध्नः सरो गुरुर्वृज्यो विज्ञेयोऽनिलनाशनः ॥७२॥

वहोर्विधमनश्चापि कफशुक्रविवर्धनः ।

दही के ऊपर का स्नेह भाग (मलाई) गुरु, वृष्य (शुक्र-वर्धक) है, वायुनाशक है । अग्निनाशक एवं कफ तथा शुक्र को बढ़ाता है । (शुक्र को बढ़ाता भी है और क्षरण भी करता है) ॥७३॥

दधि रक्सारं रूक्षं च प्राहि विष्टन्निभ वातलम् ॥७४॥

दीपनीयं लघुतरं सकृपायं रुचिप्रदम् ।

स्नेह भाग रहित दही—रूक्ष, संग्राहि, विष्टन्निभ (पेट में वायु का दर्द—मल का न उतरना, गुड़गुड़ाहट होना), वायु-कारक, अग्निदीपक, लघु (पचने में लघु), कृपायरस, रुचिदायक होता है ॥७५॥

शरद्व्रीष्मवसन्तेषु प्रायशो दधि गृहितम् ॥७६॥

हेमन्ते शिशिरे चैव वर्षासु दधि शस्यते ।

प्रायः शरद, व्रीष्म और वसन्त ऋतु में दही निन्दित है । हेमन्त, शिशिर और वर्षा ऋतु में दही श्रेष्ठ है ॥७७॥

तृष्णाकलमहर्ं मस्तु लघु स्रोतोविशोधनम् ॥७८॥

अम्लं कृपायं मधुरमवृष्यं कफवाततुत् ।

प्रह्लादनं प्रीणनं च भिन्नस्याशु मलं च तत् ।

बलमावहते क्षिप्रं भक्तच्छन्द्वं करोति च ॥७९॥

मस्तु के गुण—(दही को कपड़े में बांधकर लटका देने से जो द्रवभाग नीचे आता है, उसका नाम 'मस्तु' है) । मस्तु—तृष्णा, थकान को दूर करता है, लघु, स्रोतों का शोधक, अम्ल-कृपायरस, मधुर, अवृष्य, कफवात का नाशक, सुखदायक, पुष्टिदायक, मल को शीघ्र प्रवृत्त करता है । शीघ्र ही शरीर में बल उत्पन्न करता है, भोजन में रुचि करता है ॥८०, ८१॥

स्वाद्भ्रम्लमत्यम्लकमन्दजातं

तथा श्रुतक्षीरभवं सरश्च ।

असारमेवं दधि समधाऽस्मिन्

वर्गे स्मृता मस्तुगुणास्तथैव ॥८२॥

इति दधिवर्गः ।

इस दधिवर्ग में सात प्रकार के दही के—स्वादु, अम्ल, अत्यम्ल, मन्दजात, श्रुत क्षीर से उत्पन्न, सर, असार के गुण एवं मस्तु के गुण कह दिये हैं ॥८३॥

इति दधिवर्गः ॥

अथ तक्रवर्गः ।

तक्रं तु मधुरमम्लं कृपायानुरसमुष्णवीर्यं लघु रूक्षम-ग्निदीपनं गरगोफातिसारग्रहणीपाण्डुरोगार्गः प्लीहागुल्मा-रोचकविषमववरतृष्णाच्छिदप्रसेकशूलमेदः श्लेष्मानिलहर्ं मधुरविपाकं हृद्यं मूत्रकृच्छ्रस्नेहव्यापस्तमजमनमवृष्यं च ॥

तक्र-मधुर, अम्ल, कृपाय-अनुरस, उष्णवीर्य, लघु, रूक्ष, अग्निदीपक है, गर (संयोजनत्व विष), शोफ, अतिसार, ग्रहणी-रोग, पाण्डुरोग, अर्श, प्लीहा, गुल्म, अरुचि, विषमववर,

तृष्णा, वमन, लालाखाव, शूल, मेद, कफ, और वायु का नाशक है । मधुरविपाकी, हृदय के लिये प्रिय, मूत्रकृच्छ्रनाशक, स्नेह के अतियोग या अयोग से उत्पन्न रोगों को शान्त करने-वाला, अवृष्य (अशुक्ल) है १ ॥८४॥

मन्थनादिपृथग्भूतस्नेहमर्धोदकं च यत् ।

नातिसान्द्रद्रवं तक्रं स्वाद्भ्रम्लं तुवरं रसे ॥८५॥

जिस दही में आधा पानी मिलाकर मथने से स्नेह पृथक् हो जाता है, न तो बहुत गाढ़ा और न तो बहुत पतला तक्र मधुर विपाकी रस में अम्ल एवं कृपायरस होता है ॥८५॥

यत्तु सस्नेहमजलं मथितं घोलमुच्यते ।

जिस दही में पानी मिलाकर मथा जाये एवं स्नेह (घी) भाग पृथक् न किया जाये, उसको घोल कहते हैं । स्नेह एवं जल मिश्रित तक्र को उदशिवत् कहते हैं ।

नैव तक्रं क्षते दद्यान्नोष्णकाले न दुर्बले ।

न मूच्छांश्चमदाहेषु न रोगे रक्तपैतिके ॥८६॥

निम्न अवस्थाओं में तक्र का उपयोग नहीं करना चाहिये—क्षत लगने पर, उष्णकाल में (ग्रीष्म और शरद ऋतु में), दुर्बल अवस्था में, मूच्छां, भ्रम एवं दाह में, रिक्तपित्त रोग में तक्र नहीं वरतना चाहिये ॥८६॥

शीतकालेऽग्निमाम्नाद्ये च कृफोत्थेऽवामयेषु च ।

सार्गावरोधे दुष्टे च वार्यो तक्रं प्रशस्यते ॥८७॥

निम्न अवस्थाओं में तक्र देना उत्तम है—

शीत काल में, अग्निमाम्नाद्यरोग में, कफजन्त्यरोगों में, स्रोतों के अवरुद्ध होने पर, वायु के दूषित होने पर तक्र उत्तम है ॥

तत् पुनर्मधुरं श्लेष्मप्रकापणं पित्तप्रशमनं च; अम्लं वातघनं पित्तकरं च ॥८८॥

मधुर तक्र—कफप्रकोपक और पित्तशामक है । अम्लतक्र-वायुनाशक और पित्तकारक है ॥८८॥

वातेऽम्लं सैन्धवोपेतं स्वादु पित्ते सशर्करम् ।

पिबेतक्रं कफे चापि व्योषक्षारसमन्वितम् ॥८९॥

वायु की अवस्था में—अम्ल तक्र में नमक मिलाकर पीना चाहिये, पित्त की अवस्था में—मधुर तक्र में शर्करा मिलाकर, कफ की अवस्था में—तक्र में सौंठ, मरिच, पीपल और कोई क्षार मिलाकर पीना चाहिये ॥८९॥

प्राहिणी वातला रूक्षा दुर्जरा तक्रकूर्चिका ।

तक्रकूर्चिका (फटी हुई छाछ, जिसमें फुटकियाँ हों), संग्राही, वायुकारक, रूक्ष, कठिनाई से पचती है ।

तक्राललघुतरो मण्डः कूर्चिकादधितक्रजः ॥९०॥

१—तक्र के तीन भेद हैं—

“रूक्षमर्धोद्वतस्नेहं यत्स्वानन्दवृत्तं घृतम् ।

तक्रं दोषाग्निबलवित् त्रिविधं तत्प्रयोजयत् ॥”

सुश्रुत संहिता · पृष्ठ 218, कुल 872 में से · BharatKosha