भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ४५ ]

सूत्रस्थानम्

१७१

दधि के साथ दूध के पकाने से 'दधिकूर्चिका' बनती है, इसी प्रकार तक के साथ दूध को पकाने से तककूर्चिका बनती है। तक से लघु छाछ का मण्ड [मस्तु] है, तककूर्चिका दधि-कूर्चिका से लघु है।

वि० मन्तव्य—तक के तथा दही के गाढ़े भाग का नाम "कूर्चिका" है, उसे "पनीर" भी कहते हैं, उसके जल का नाम "मस्तु" है, उसको तकमण्ड तथा दधिमण्ड भी कहते हैं। दूध के गाढ़े भाग का नाम भी "कूर्चिका" है, जिसका नाम "खोया" या "खुर्चन" है। दूध को पकाने पर जलांश भाप बनकर उड़ जाता है और "खोया" रह जाता है, दूध को फाइकर घन भाग ले लिया जाता है उसको "छेना" कहते हैं।

गुरुः किलाटोऽनिलह्य पुस्त्वनिद्राप्रदः स्मृतः।

किलाट (फटे हुए दूध का घना भाग), गुरु, वायुनाशक, पुस्त्वप्रद (शुक्रवर्धक) एवं निद्राप्रद है।

मधुरो बृंहणो वृध्यौ तद्वत्पीयूषमोरटौ ॥ ६१ ॥

पीयूष (तुरन्त विआई गाय का सात दिन तक का दूध), और मोरट (सात दिन के पीछे जब तक दूध साफ न हो), मधुररस और देह एवं शुक्रवर्धक हैं।

वि० मन्तव्य—पीयूष को "फेउँच" तथा पञ्जाब में "बाहुली" कहते हैं। परन्तु यह प्रसूता गौ मैस के दूध को गर्म करने पर बनती है। वैसे भी दुहने के १०, २० मिनट के पश्चात् दूध जम जाता है। यह दूध यदि धारोष्ण दिया जाय तो खास में लाभ करता है, इसका नाम पीयूष-अमृत है। प्रसव के अनन्तर ३-४-५ दिन तक का दूध पीयूष कहलाता है। जब तक वह जमता या गाढ़ा होता रहता है ॥ ६१ ॥

नवनीतं पुनः सद्यस्कर् लघु सुकुमारं मधुरं कषायमी-षदरुलं शीतलं मेध्यं दीपनं हृव्यं संप्राहि पिन्तानिलहरं वृष्यमविदाहि क्षयकासत्रणगोषागोऽदितापहं, चिरोतिथं गुरुं कफमेदोविवर्धनं बलकरं बृंहणं शोषधनं विशेषेण बालानां प्रशस्यते ॥ ६२ ॥

तुरन्त निकाला मक्खन-लघु, देह को कोमल करनेवाला, मधुर-कषाय, थोड़ा अम्ल, शीतल, मेधावर्धक अग्निदीपक, हृव्य, संप्राही, पिन्त-वायुनाशक, वृध्य (शुक्रवर्धक), अविदाहि, क्षय, कास, खास, त्रण, शोष, अर्श, अदित को दूर करनेवाला है। देर का निकला मक्खन-गुरु, कफ, मेद को बढ़ानेवाला, बलकारक (ओजस्कर), बृंहण (देह की वृद्धि करनेवाला), शोषनाशक, विशेषकर बालकों के लिये उत्तम है ॥ ६२ ॥

क्षीरोत्थं पुनर्नवनीतमुक्कृष्टस्तेहमाधुर्यमतिशीतं सौकु-मार्यकरं चक्षुष्यं संप्राहि रक्तपित्तनेत्रगोहरं प्रसादनं च।

दूध से निकला मक्खन—इसमें स्नेह और मधुरता बहुत अधिक रहती है, अतिशीतल, देह को सुकुमार करनेवाला,

आँखों के लिये हितकारी, संप्राहि, रक्तपित्तनेत्रगोनाशक एवं वर्ण को स्वच्छ करनेवाला है ॥ ६३ ॥

संतानिका पुनर्वातघ्नो तपंगो वृध्या बलया स्तिग्ध्या सन्ध्या मधुरा मधुरविपाका रक्तपित्तप्रसादनी गूर्वा च ॥

दूध की मलाई—वातनाशक, वृत्ति करनेवाली, बलकारक, शुक्रवर्धक, स्तिग्ध, चिकारक, मधुररस, विपाक में मधुर, रक्त-नाशक और गुरु है ॥ ६४ ॥

विकल्प एष दध्यादिः श्रेष्ठो गठ्योऽभिर्वर्णितः।

विकल्पानवशिष्टास्तु क्षीरवीर्यात्समादिशेत् ॥ ६५ ॥

इति तकवर्गः।

यह जो दधि एवं तक आदि का वर्णन किया है, यह सब गाय के दूध से ही बनी वस्तुओं के हैं, अजा आदि के शेष रहे भेदों को दूध के वीर्य (गुणों) से ही कल्पना कर लेना चाहिये ॥ ६५ ॥ इति तकवर्गः ॥

अथ घृतम्।

घृतं तु मधुरं सौम्यं मृदुं शीतवीर्यमनभिष्यन्दिस्तेहन-मुदावर्तन्मादापस्मारशूलञ्चरानाहवातपित्तप्रशमनमग्नि-दीपनं स्मृतिमतिमेधाकान्तिस्वरलावण्यसौकुमार्योजस्तेजो-बलकरमायुष्यं वृध्यं मेध्यं वयःस्थापनं गुरुं चक्षुष्यं इले-ष्माभिर्वर्धनं पाप्मालद्वमीप्रशमनं विषहरं रक्षोघ्नं च ॥ ६६ ॥

इसके आगे घृतवर्ग कहते हैं—

धी के सामान्य गुण—मधुररस, सौम्य, मृदु, शीतवीर्य, शोड़ा अभिष्यन्दि, शरीर का स्तिग्ध करनेवाला; उदावत्, उन्माद, अपस्मार, शूल, ज्वर, आनाह, वातपित्त को शान्त करता है, अग्निदीपक, स्मृति, मति, मेधा, कान्ति, स्वर, लाव-ण्य, सुकुमारता, ओज तेज बल को बढ़ाता है, आयुवर्धक, वृध्य, पवित्र है, आयु को स्थिर रखता है, गुरु, आँखों के लिये हितकारी, कफवर्धक पाप एवं अलक्ष्मी को शान्त करता है, विषनाशक एवं राक्षस भय को दूर करता है ॥ ६६ ॥

विपाके मधुरं शीतं वातपित्तविषापहम्।

चक्षुष्यमग्र्यं बल्यं च गव्यं सर्पिगुणात्तरम् ॥ ६७ ॥

गाय का धी—विपाक में मधुर, शीतवीर्य, वात-पित्त-विष-नाशक, आँखों के लिये अतिश्रेष्ठ, बलकारक, गुणों में अति-श्रेष्ठ है ॥ ६७ ॥

आजं घृतं दीपनीयं चक्षुष्यं बलवर्धनम्।

कासे श्वासे क्षये चापि पथ्यं पाके च तल्लघु ॥ ६८ ॥

बकरी का धी—अग्निदीपक, चक्षुष्य, बलवर्धक कास, खास, क्षय में भी हितकारी, और विपाक में लघु है ॥ ६८ ॥

मधुरं रक्तपित्तघ्नं गुरुं पाके कफावहम्।

वातपित्तप्रशमनं सुग्रातं माहिषं घृतम् ॥ ६९ ॥

१—"यस्मात्तेजोमयं ब्रह्म घृते तच्च व्यवस्थितम्। तेजोऽमृतमयं दिव्यं महापातकनाशनम् ॥"