भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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मुश्रतसंहिता

[ अ० ४५ ]

मैंस का घी—मधुर, रक्त-पित्त नाशक, विपाक में गुरु, कफवर्धक, वात-पित्त को शान्त करनेवाला शीतवीर्य होता है ॥

औरुं कटु घृतं पाके ओफकुमिषिपापहम् ।

दीपनं कफवातघ्नं कुष्ठगुल्मोदरापहम् ॥ १०० ॥

ऊंटनी का घी—विपाक में कटुरस, शोफ-कुमिषिप को दूर करनेवाला, अग्निदीपक, कफ-वायुनाशक, कुष्ठ, गुल्म, उदर को नष्ट करता है ॥ १०० ॥

पाके लघुवायिकं सर्पिनं च पित्तप्रकोपणम् ।

कफेऽनिले योनिदोषे शोषे कम्पे च तद्धितम् ॥ १०१ ॥

मेड़ का घी—विपाक में लघु, पित्त को कुपित नहीं करता। कफ, वायु, योनिरोग, शोष और कम्पयोग में हितकारी है ॥ १०१ ॥

पाके लघुणवीर्यं च कषायं कफनाशनम् ।

दीपनं बद्धमूत्रं च विद्यादेकशकं घृतम् ॥ १०२ ॥

घोड़ी का घी—विपाक में लघु, उष्णवीर्य, कषायरस कफ-नाशक, अग्निदीपक, मूत्र को रोकनेवाला है ॥ १०२ ॥

चक्षुष्यमग्रयं खीणां तु सर्पिः स्याद्वृत्तोपसम् ।

वृद्धिं करोति देहान्योल्लघुपाकं विषापहम् ॥ १०३ ॥

खियों का घी—आँखों के लिये अतिश्रेष्ठ, अमृत के समान, शरीर एवं अग्नि को बढ़ाता है, विपाक में लघु, विष-नाशक है ॥ १०३ ॥

कषायं बद्धविष्णूमूत्रं तित्तमग्निकरं लघु ।

हन्ति कारणं सर्पिः कफकुष्ठविषकुमौन् ॥ १०४ ॥

हथिनी का घी—कषायरस, मल-मूत्र का अवरोधक, तित्त, अग्निकारक, लघु, कफ, कुष्ठ, कुमि को नष्ट करता है ॥ १०४ ॥

क्षीरघृतं पुनः संप्राहि रक्तपित्तभ्रममूर्च्छाप्रशमनं नेत्ररोगहितं च ॥ १०५ ॥

दूध से निकला घी—संप्राहि, रक्तपित्त, भ्रम, मूर्च्छा को नाश करता है और नेत्र रोगों में हितकारी है ॥ १०५ ॥

सर्पिसंण्डस्तु मधुरः सरो योनिश्रोत्राक्षिशिरसां शूलघ्नो वस्तिनस्याक्षिपूरणेपूषदिर्यते ॥ १०६ ॥

घी का मण्ड (पिघले घी के ऊपर का स्वच्छ भाग), मधुर; सर (विरेचक), योनिशूल, कर्णशूल, नेत्रशूल और शिरःशूल को मिटानेवाला, वस्ति (कर्म), नस्य एवं आँख के पूरण तर्पण में व्यवहृत होता है ॥ १०६ ॥

सर्पिः पुराणं सरं कटुविपाकं त्रिदोषापहं मूर्च्छासिंदोन्मादोदरज्वरगरशोषापस्मारयोनिश्रोत्राक्षिशिरःशूलघ्नं दीपनं वस्तिनस्यपूरणेपूषदिर्यते ॥ १०७ ॥

पुरातन घी (दस साल पुराना)—सर (विरेचक), कटु-विपाकी त्रिदोष—(वात, पित्त, कफ) नाशक, मूर्च्छा, मद (विष-रक्त एवं मद्यजनित मद), उन्माद, ज्वर, उदर, गर (संयोगजन्म, विष)—शोष; अपस्मार रोगनाशक; योनिशूल;

कर्णशूल, नेत्रशूल, शिरःशूल को नष्ट करता है, अग्निदीपक, वस्ति-कर्म नस्य और आँख के तर्पणमें प्रयुक्त किया जाता है ॥

भवति चात्र—

पुराणं तिमिरश्चासपीनसज्जरकासनतु ।

मूर्च्छाकुष्ठविषोन्मादग्रहापस्मारनाशनम् ॥ १०८ ॥

दस साल का पुराना घी—तिमिर (नेत्ररोग), श्वास, पीनस, ज्वर, कास, मूर्च्छा, कुष्ठ, विष, उन्माद, ग्रह (स्कन्दादि), अपस्मार को नाश करता है ॥ १०८ ॥

(एकादशशतं चैव वत्सरानुषितं घृतम् ।

रक्षोघ्नं कुम्भसर्पिः स्यात् परतस्तु महाघृतम् ॥ १०९ ॥

एक सौ ग्यारह साल तक रक्खा हुआ घी, राक्षसों के मय को नाश करता है, इसके आगे (एकसौ ग्यारह साल के आगे) महाघृत हो जाता है। एक सौ ग्यारह साल का घी कुम्भसर्पि हो जाता है, कई आचार्य सौ साल के पुराने घी को कुम्भसर्पि कहते हैं।

वि० मन्तव्य—पुराना घी—१ वर्ष पुराना, १० वर्ष पुराना, १५ वर्ष से अधिक पुराना अथवा १०० वर्ष अथवा १११ वर्ष पुराना घृत “पुराण” या पुराना कहलाता है। सब का तात्पर्य है जितना अधिक पुराना हो उतना अधिक उत्तम होता है। पुराना होने पर घृत का वर्ण मोमियाँ या कुछ काला-पीला सा हो जाता है जैसा मोममिश्रित तैल का। उसमें विशेष प्रकार की गन्ध उत्पन्न हो जाती है। वह सन्निपात में शिर (तालु ब्रह्म-रन्ध्र स्थान) पर, श्वास में—वक्षस एवं पार्श्व पर लगाया या मला जाता है। अपस्मार आदि में ५-१० रत्नी मात्रा में खाया भी जाता है। इसका नाम “महाघृत” है।

पेयं महाघृतं भूतैः कफघ्नं पवनार्धिकैः ।

बल्यं पवित्रं मेध्यं च विशेषात्तिमिरापहम् ॥ ११० ॥

सर्वभूतहरं चैव घृतमेतत् प्रशस्यते ॥ १११ ॥

इति घृतवर्गः ।

जिन प्राणियों में वायु की अधिकता हो उनको महाघृत पीना चाहिये, वह कफनाशक है। बलकारक, पवित्र, मेधावर्धक खासकर नेत्ररोगनाशक है। सब तरह की बाधा को दूर करता है, यह घी प्रशस्त है ॥ ११०, १११ ॥

अथ तैलानि

तैलं त्वान्नेयमुष्णं तीक्ष्णं मधुरं मधुरविपाकं बृंहणं प्रीणनं व्यवायि सूक्ष्मं विशदं गुरुं सरं विकासि वृष्यं त्वकप्रसादनं मेधासाद्वर्माससंश्रैर्यवर्णविलकरं चक्षुष्यं बद्धमूत्रं लेखनं तित्तकषायानुरसं पाचनमनिलबलासक्षयकरं कुम्भितमशितं पित्तजननं योनिशिरःकर्णशूलप्रशमनं गर्भाशयशोधनं च तथा छिन्नभिन्नविद्रोहिषष्ठच्युतमथितक्षतपिबितभ्रमस्फुटितक्षाराग्निदग्धविशिष्टद्वारिताभिहृदतुर्भंगनं