भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४५ ]

आदि के तैल, मधुररस, मधुर-विपाक, वात-पित्तशामक, शीत-वीर्य, अभिष्यन्दि, मूत्रविरेचक और अग्निमान्य करनेवाले हैं ॥

मधुककाशगर्भपलाशतैलानि मधुरकषायणि कफ-पित्तप्रशमनानि ॥१२१॥

मधुक (महुआ), काशमरी (गम्भारी), पलाश (ढाक) के बीजों के तैल-मधुर-कषाय रस, कफपित्तनाशक है ॥१२१॥

तुवरकभल्लातकतैले उष्णे मधुरकषाये तित्कानुरसे वातकफकुष्ठमेदोमेहकृमिप्रशमने उभयतोभागदोषहरे च ॥१२२॥

तुवरक१ और भिलावे का तैल—उष्णवीर्य, मधुरकषायरस, तित्त-अनुरस, वायु, कफ, कुष्ठ, मेद, मेह, कृमि, नाशक तथा वमन एवं विरेचन दोषों मार्गों से दोष नाशक है ॥१२२॥

सरलदेवदारुशिशपागुरुण्डीरसारस्नेहास्तिककटुक-पाया दुष्टव्रणशोधनाः कृमिकफकुष्ठानिलहराश्च ॥१२३॥

सरल, देवदारु, गण्डीर (वृक्ष विशेष), शिशपा (शीशम), अगर के सार (मध्य काष्ठ) का स्नेह, तित्त, कटु, कषायरस, दूषित व्रणों का शोधक, कृमि-कुष्ठ वायु नाशक है ॥१२३॥

तुम्बीकोशाम्रदन्तीद्रवन्तीश्यामासप्तलानीलिकाकम्पिल्लकशङ्खिनीस्नेहास्तिककटुकपाया अधोभागदोषहराः कृमिकफकुष्ठानिलहरा दुष्टव्रणशोधनाश्च ॥१२४॥

तुम्बी ( कडुवी तुम्बी ), कोशाम्र ( एक प्रकार के आम), दन्ती (जमालगोटा), द्रवन्ती, (दन्त मेद), श्यामा (विधारा), सप्तला (सातला), तीलिका (नीलनी), कम्पिल्ल (कमीला), शङ्खिनी (यवतित्का), इनका स्नेह, (तैल), तित्त, कटु, कषाय रस, अधो भाग (विरेचन) द्वारा दोषनाशक, कृमि, कुष्ठ, कफ, वायुनाशक, दूषित व्रणों का शोधक है ॥१२४॥

यवतित्कातैलं सर्वदोषप्रशमनमोषतिक्तमपिनदीपनं लेखनं मेध्यं पथ्यं च ॥१२५॥

यवतित्का (कालमेव) के फल का तेल, सब दोषों को शान्त करता है, थोड़ा-सा तित्त, अग्निदीपक, लेखन (मेद को कम करनेवाला), मेध्य (पवित्र), पथ्य और रसायन है ॥१२५॥

एकैषिकातैलं मधुररसतिश्रीतं पित्तहरमनिलप्रकोपणं श्लेष्माभिर्वर्धनं च ॥१२६॥

एकैषिका (काली त्रिवृत का फल) का तेल, मधुर, अति-शीतल, पित्तहर, वायु का प्रकोपक और कफवर्धक है ॥१२६॥

१ तुवरक—पश्चिमसमुद्र तीर पर उत्पन्न होनेवाला एक वृक्ष है। जैसे कहा है :—

पत्रैस्तु केशराकारैः कपित्थसदृशैः फलैः ।

बृक्षस्तुवरको नाम पश्चिमाग्निवतीरजः ॥

सहकारतैलमोषतिक्तमतिसुगन्धि वातकफहरं रुक्षं मधुरकषायं रसवन्नतिपित्तकरं च ॥१२७॥

सहकार तैल (आम का तेल), ईषत् तित्त, अतिसुगन्धित, वात-कफहर, रुक्ष, मधुर-कषाय, रसवान्, बहुत पित्तकारक नहीं (थोड़ा पित्त करनेवाला) है ॥१२७॥

फलोद्भवानि तैलानि यान्यनुक्तानि कानिचित् ।

गुणान् कर्म च विज्ञाय फलानीव विनिदिशेत् ॥१२८॥

इस स्थान में फल से उत्पन्न जिन तेलों का वर्णन नहीं किया उन तेलों के गुण एवं कर्मों से ही जानना चाहिये ॥

यावन्तः स्थावराः स्नेहाः समासात्परिकीर्तिताः ।

सर्वं तैलगुणा ज्ञेयाः सर्वं चानिलनागनाः ॥१२९॥

जितने भी स्थावर स्नेह संक्षेप से यहाँ पर कहे हैं; उन सब के गुण तैल के समान समझना चाहिये, ये सब तैल वायु के नाशक हैं।

वि० मन्तव्य—स्थावर द्रव्यों का स्नेह—तिल, एरण्ड एवं निम्ब आदि, किराततित्त आदि, मधुक आदि बीजों का स्नेह (तैल) कोल्हू आदि में पीड़ कर निकाला जाता है। इसी प्रकार सौफ, अजवायन तथा इलायची, लवङ्ग, जयफल आदि का भी निकाला जाता है। तुम्बी आदि के बीजों का तैल होता है और प्रणियों की वसा आदि स्नेह भी स्निग्ध होने के कारण तैल के समान खाने और लगाने के उपयोग में आते हैं ॥१२९॥

सवभ्यस्तिवह तैलेभ्यस्तिलतैलं विशिष्यते ।

निष्पत्तेस्तदगुणत्वाच्च तैलत्वमितरेष्वपि ॥१३०॥

सब प्रकार के तेलों में तिल का तेल ही गुणवान् है—अन्य एरण्डादि के स्नेह को भी तैल कहते हैं। क्योंकि—निष्पत्तेः—(जिस प्रकार तिलों से तेल बनता है, उसी प्रकार इनसे भी बनता है), गुणत्वात्—तिल तैल के कर्म-धर्मगुणयुक्त होने से अन्यों को भी तैल कहते हैं ॥१३०॥

ग्राम्यान्पौदकानां च वसामेदोमज्जानो गुरुष्णमधुरा वातघ्नाः, जाङ्गलैकशफकव्यादादीनां लघुशीतकषाया रक्त-पित्तघ्नाः, प्रतुद्वारिकराणां श्लेष्मघ्नाः । तत्र घृततैलवसा-मेदोमज्जानो यथोत्तरं गुरुविपाका वातहराश्च ॥१३१॥

इति तैलवर्गः ।

ग्राम्य (गाय, ऊँट आदि), आनूप (महिष आदि), औदक (मछली आदि) प्रणियों की वसा, मेद और मज्जा गुरु, उष्णवीर्य, मधुररस, वातनाशक है। जाङ्गल (हिरण आदि) एकशफ (घोड़े आदि), कव्याद (व्याघ्र आदि), की वसा आदि लघु, शीत, कषाय रस, रक्त-

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