भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४५ ]

सूत्रस्थानम्

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पित्ताशक, प्रतुद (कबूतर आदि) विकिर (बटेर आदि) कफनाशक हैं। इनमें घी, तैल, वसा, मेद, मज्जा, ये उत्तरोत्तर (घी से तैल, तैल से वसा आदि), गुरु विपाक और वातनाशक हैं ॥१३१॥ इति तैलवर्गः ॥

अथ मधुवर्गः ।

मधु तु मधुरं कषायानुरसं रूक्षं शीतमग्निदीपनं वण्यं स्वयं लघु सुकुमारं लेखनं हृद्यं वाजीकरणं सन्धानं शोधनं रोपणं संग्राहि चक्षुष्यं प्रसादनं सूक्ष्ममाग्निसारिपित्त-क्षेपममेदोमहादिकारवासकासातिसारच्छदितृण्णाकुमि-विषप्रशमनं ह्लादि त्रिदोषप्रशमनं च; तत्तु लघुस्वात् कफमनं, पैच्छिल्यानमाधुर्यात् कषायभावाच्च वातपित्तघ्नम् ॥१३२॥

इसके आगे मधुवर्ग कहते हैं—

मधु के सामान्य गुण-मधुर, कषाय-अनुरस, रूक्ष, शीतल अनिदीपक, वण्यं (वर्ण के लिये हितकारी), स्वयं (स्वर के लिये हितकारी), लघु, सुकुमार (सुकुमारता करनेवाला), लेखन (मेदनाशक), हृद्य (हृदय के लिये प्रिय), सन्धान (भ्रम को जोड़नेवाला), शोधन, रोपण, वाजीकरण (शुक्ल), संग्राहि, चतुष्प, प्रसादन (आंख और शरीर को स्वच्छ करने-वाला), सूक्ष्म माग्नो में घुसनेवाला, पित्तक्षेप, मेद, मेह; हिवकी, श्वास, कास, अतिसार, छर्दि, तृण्णा, कुमिषिष को शान्त करता है, ह्लादि (सुखकारक) और त्रिदोषनाशक है। यह मधु लघु होने से कफनाशक है, पिच्छिल गुण होने से मधुरता से, कषाय होने के कारण वात पित्तनाशक है ॥१३२॥ पौष्टिकं आमरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च ।

आर्ध्यमौहालकं दालमित्यष्टौ मधुजातयः ॥१३३॥

मधु के आठ भेद हैं। यथा-पौष्टिक, आमर, क्षौद्र, माक्षिक छात्र, आर्ध्य औहालक, दाल ॥१३३॥

१ मखियों के भेद—‘महत्याः पिगलायास्तु मक्षिकाः पुतिकाः स्मृताः ॥’ आमर-प्रसिद्ध है, इनका मधु आमर है। ‘मक्षिकाः कपिलाः सूक्ष्माः क्षुद्राऽऽख्यास्तत्कृतं मधु । मुनिभिः चौद्रमित्युक्तं’। माक्षिक—‘महत्यः पिगलास्तीक्ष्णविषास्तु मक्षिकाः स्मृताः ॥’ छात्र—‘वरटाः पिगलाः पोताः प्रायो हिमवतो वने । कुर्वन्ति छत्र-कारं तज्जं छात्रं मधु स्मृतम् ॥’ आर्ध्य—‘तीक्ष्णतुण्डास्तु याः पोतवर्णाः षट्पदसन्निभाः । अध्यास्ता मक्षिका ज्ञेया आर्ध्यं तत्कृत-मुच्यते ॥’ औहालक—‘प्रायो वलमोकमध्यस्थाः कपिलाः स्वल्प-कोटकाः । कुर्वन्ति कपिलं स्वल्पं तत् स्यादौहालकं मधु ॥’ दाल—‘इन्द्रनील-दलाकाराः सूक्ष्मा या मक्षिकाः शुभाः । वृक्षकोटरमध्य-स्थास्तज्जं दालमुदाहृतम् ॥’ (इन्द्रनील का लक्षण—‘चीरमध्ये किपेक्षीलं चीरञ्चेक्षीलतां व्रजेत् । इन्द्रनील इति ख्यातः’)। वर्ण द्वारा इनका भेद—‘माक्षिकं तैलवर्णं स्यात् घनवर्णस्तु पौष्टिकम् । चौद्रं कपिलवर्णं स्यात्, श्वेतं आमरमुच्यते ॥’

विशेषासौष्ठिकं तेषु रूक्षोष्णं सविषान्वयात् ।

वातासूकपित्तकृच्छ्रेदि विदाहि मदकृन्मधु ॥१३४॥

विषयुक्त मक्षिकाओं से (अथवा विषयुक्त पुष्पों से) उत्पन्न होने के कारण-पौष्टिक मधु-रूक्ष, उष्ण, वायु-रक्त-पित्त को करनेवाला, मेद-ग्रन्थि आदि का छेदक, विदाही, मत्ता उत्पन्न करता है ॥१३४॥

पैच्छिल्यात् स्वादुभूयस्वात् आमरं गुरुसंज्ञितम् ।

क्षौद्रं विशेषतो ज्ञेयं शीतलं लघु लेखनम् ॥१३५॥

तस्मात्लघुतरं रूक्षं माक्षिकं प्रवरं स्मृतम् ।

श्वासोद्विषु च रोगेषु प्रशस्तं तद्विशेषतः ॥१३६॥

स्वादुपाकं गुरु हिमं पिच्छिलं रक्तपित्तजित् ।

शिवत्रमेहकृमिघ्नं च विद्याच्छात्रं गुणोत्तरम् ॥१३७॥

पिच्छिल गुण होने से तथा मधुरता के अधिक होने से आमर मधु-गुरु होता है। क्षौद्र-मधु शीतल, लघु, एवं मेद का लेखन करनेवाला है। माक्षिक मधु-क्षौद्र से भी अधिक लघु; रूक्ष एवं श्रेष्ठ होता है। यह मधु श्वासकासादि रोगों में खासकर उत्तम है। छात्र मधु-स्वादु (मधुर) विपाक, गुरु, शीतवीर्य, पिच्छिल, रक्त-पित्त-नाशक, शिवत्र-प्रमेह-कृमि-नाशक एवं गुणों में श्रेष्ठ है ॥१३५-१३७॥

आर्ध्यं मध्वतिचक्षुष्यं कफपित्तहरं परम् ।

कषायं कटु पाके च बल्यं तित्तमवातकृतं ॥१३८॥

आर्ध्य मधु-आँखों के लिये अतिहितकर, अतिशय, कफ-पित्तनाशक, कषायरस, विपाक में कटु, बलकारक, तित्त है, परन्तु वायु नहीं करता ॥१३८॥

औहालकं रुचिकरं स्वयं कुष्ठविषापहम् ।

कषायमस्मलगुणं च पित्तकृतं कटुपाकि च ॥१३९॥

औहालक मधु-रुचिकारक, स्वयं (स्वर के लिये उपयोगी)

कुष्ठ-विषनाशक, कषाय, उष्णवीर्य, अस्म, पित्तकारक और विपाक में कटु होता है ॥१३९॥

छर्दिमेहप्रशमनं मधु रूक्षं दलोद्भवम् ।

दाल मधु—छर्दि, एवं प्रमेह का नाशक तथा रूक्ष होता है ॥

बृंहणीयं मधु नवं नातिरुलेधमहरं समम् ॥१४०॥

मेदःस्थौल्यापहं प्राहि पुराणमतिलेखनम् ।

नूतन मधु—बृंहण (देह एवं शुक्र को बढ़ानेवाला), कफ को बहुत अधिक कम नहीं करता और सर (विरेचक) होता है।

१ निर्णयसागर की छबी मुश्रुत में—

“कषायमृण्णमस्मलं च पित्तकृतं कटुपाकि च ॥”

यह पाठ दाल मधु के गुणों में लिखा है, परन्तु हारापवत्र जो ने पृथक् किया है।