सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४५ ]
पुराना मधु—मेद एवं स्थूलता को घटानेवाला, संग्राहि और अतिशय लेखन करनेवाला होता है ॥१४०॥
दोषत्रयहरं पक्वमासमरुलं त्रिदोषवृत्त ॥१४१॥
कालवश के कारण पका हुआ मधु (अग्नि के संयोग से नहीं), तीनों दोषों का नाशक होता है, आम (थोड़े समय का संचित मधु, अपक्व) मधु—तीनों दोषों को उत्पन्न करता है ॥
तद्युक्तं विविधैर्योगैर्निह्न्यादामयात् वृह्न् ।
नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु ॥१४२॥
मधु यदि युक्तिपूर्वक नाना प्रकार के औषधि-समूहों के साथ मिलाकर व्यवहार किया जाये, तो बहुत से रोगों का नाश करता है । क्योंकि—मधु नाना प्रकार के द्रव्यों से एकत्रित किया जाता है, और अति उत्तम योगवाहि है (जिस प्रकार के द्रव्य के साथ मिलता है, उसी प्रकार का कर्म करता है) ॥१४२॥
तत्तु नानाद्रव्यरसगुणवीर्यविपाकविरुद्धानां पुष्परसानां मक्षिकासंभवत्वाच्चानुष्णोपचारम् ॥१४३॥
निम्न कारण से मधु को शीत अवस्था में ही (बिना गरम किये) व्यवहार में लाना चाहिये । मधु—नाना प्रकार के द्रव्य, रस, गुण, वीर्य, विपाक विरुद्ध, पुष्प रसों से उत्पन्न होने के कारण; विषैली मक्षियों से उत्पन्न होने के कारण मधु उष्ण वस्तुओं के साथ नहीं मिलता ॥१४३॥
उष्णैर्विरुध्यते सर्वं विषान्नयतया मधु ।
उष्णार्तमुष्णैरुष्णे वा तत्त्रिहन्ति यथा विषम् ॥१४४॥
विषैली मक्षियों से उत्पन्न होने के कारण मधु गरम वस्तुओं के साथ नहीं मिलता । क्योंकि—जिस प्रकार विष गरम वस्तुओं के साथ नहीं मिलता, उसी प्रकार—उष्णार्त (यर्म-गरमी से पीड़ित) उष्ण (उष्ण स्पर्श वाले) द्रव्यों के साथ (उष्णवीर्य द्रव्य के साथ नहीं) उष्ण (उष्ण देश या काल) में मधु नहीं मिलता ॥१४४॥
तत्सौकुमारोच्च तथैव शैत्यात्रानौषधीनां रससंभवाच्च । उष्णैर्विरुध्यते विशेषतश्च तथाऽन्तरीक्षेण जलेन चापि ॥
और जिस प्रकार कोमल नवनीत गरम पानी या गरम वस्तुओं के साथ नहीं मिलता, इसी प्रकार मधु भी कोमल, शीतल होने से, नाना प्रकार की औषधियों के रस से उत्पन्न होने कारण मधु गरम द्रव्यों से तथा आन्तरीक्ष जल के साथ विरोधी होता है ॥१४५॥
उष्णेन मधु संयुक्तं वमनेष्ववचारितम् ।
अपाकादनवस्थानात्र विरुध्यते पूर्ववत् ॥१४६॥
परन्तु वमन कार्यों में मधु को उष्ण द्रव्यों के साथ मिलाकर देना चाहिये । क्योंकि इस प्रकार से यह जीर्ण नहीं होता, शरीर में स्थिर नहीं होता, इसलिये पूर्व कारणों से विरोधी नहीं है । (तथापि वृद्ध वैद्य इसका व्यवहार नहीं करते, क्योंकि कहीं कुछ भाग नीचे की ओर न चला जाये ॥१४६॥)
मध्वामात्परस्त्वन्वदामं कर्ष्टं न विद्यते ।
विरुद्धोपक्रमस्वात्तत्तु सर्वं हन्ति यथा विषम् ॥१४७॥
इति मधुवर्गः ।
मधुजन्य आम (अजीर्ण) से बढ़कर और कोई अजीर्ण नहीं है, मधु से उत्पन्न अजीर्ण रोग अतिकष्टसाध्य है । क्योंकि—विरुद्ध चिकित्सा होने से (आम की, स्वेद, उष्णोदक उपचार हैं, इनका मधु के साथ विरोध है । यह अजीर्ण विष के समान सम्पूर्ण चिकित्सा को निष्फल कर देता है ।
वि० मन्तव्य—वनवासी तथा हिमालय आदि पर्वतों के निवासी आज भी भोजन में तथा महामान्यों (महमानों) के भोजन में खण्ड एवं गुड़ शक्कर के समान ही मधु का प्रयोग करते हैं और प्राचीन काल में तो मधुपकं का भोजन के समान प्रयोग-उपयोग होता ही था । अस्तु-इस प्रकार भरपेट मधु खाने पर यदि अजीर्ण हो जाता है तो वह अन्य रोटी आदि के अजीर्ण की अपेक्षा बड़ा भीषण होता है । मधु की उक्त जातियों की आज भी वे लोग कुछ न कुछ जानते हैं । छात्रमधु—बरे के छत्ता में मिशरी के से कण पाये जाते हैं । माक्षिकमधु—मक्षिकाविट् नाम से बाजार में मिलता है । आयुर्वेदिक योगों में उसकी चर्चा भी पाई जाती है, यूनानी चिकित्सा में उसका विशेष प्रचार है । हमारे विचार में 'दाल' मधु वह है जो आम आदि के दलों पत्तों पर तेलिया लगता है । यह कभी २ कहीं लगता है, मधुर होता है । क्षौद्रमधु—यह श्वेताम, छोटी २ प्रायः न काटनेवाली मक्षिकाओं का मधु है, इनको मखीर कहते हैं, इनकी गोणी भी छोटी होती है । अधर्ममधु-यह अधोपयोगी मधु है जो अधिक पाया जाता है । यही सर्वत्र मधु या शहद के नाम से मिलता है, इसकी गोणी बहुत बड़ी होती है । उस में से ५-७-१० सेर तक मधु और १ सेर तक मोम निकलता है, यह मक्षिका तीक्ष्णतुण्डा-बुरी तरह काटनेवाली होती है । उक्त सब प्रकार की मक्षिकाओं को धूअों से उड़ाकर मधु प्राप्त किया जाता है ॥१४७॥
इति मधुवर्गः ।
अथेजुवर्गः ।
इक्षुवो मधुरा मधुरविपाका गुरवः शीताः स्निग्धा बल्या वृष्या मृत्रला रक्तपित्तशमनाः क्रमिकफकराश्चेति । ते चानेकविधाः । तथाथा—॥१४८॥
इसके आगे इजुवर्ग कहते हैं—
इजु के समान्य गुण—इक्षु मधुर, मधुरविपाक, गुरु, शीतल, स्निग्ध, बलकारक, वृष्य (शुक्रवर्धक), मृत्रल रक्तपित्तशमक, क्रमि एवं कफ को करते हैं ॥१४८॥
यथा—
पौण्ड्रको भीरुकश्चैव वंशः श्वेतपोरकः ।
कान्तरस्तापसेजुश्च काष्ठेजुः सूचिपत्रकः ॥१४९॥