सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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नैपालो दीर्घपत्रश्च नीलपोरोऽथ कोशकृत ।
इत्येता जातयः स्थौल्याद्,
पौण्ड्रक (पौण्डा), भीरुक, वंशक, शतपोरक, कान्तार, तापसेलु, काष्ठेलु, सूचिपत्रक, नैपाल, दीर्घपत्र, नीलपोरा, कोशकृत, ये संज्ञेप में (स्थूलदृष्टि से) बराह भेद हैं ॥१४६॥
गुणान् वक्ष्याम्यतः परम् ॥१५०॥
सुशीतो मधुरः स्निग्धो वृंहणः श्लेष्मलः सरः ।
अविदाही गुरुवृष्यः पौण्ड्रको भीरुकस्तथा ॥१५१॥
आभ्यां तुल्यगुणः किंचित्संक्षारो वंशको मतः ।
वंशवच्छ्वेतपोरस्तु किंचिदुष्णः स वातहा ॥१५२॥
कान्तारतापसाविच्च वंशकानुगतौ मतौ ।
एवंगुणस्तु काष्ठेभ्यः स तु वातप्रकोपणः ॥१५३॥
सूचीपत्रो नीलपोरो नैपालो दीर्घपत्रकः ।
वातलाः कफपित्तद्वताः सकषाया विदाहिनिः ॥१५४॥
कोशकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः ।
इसके आगे इनके गुणों को कहते हैं—
पौण्ड्रक और भीरुक—शीतल, मधुर, स्निग्ध, वृंहण (देह-वर्धक), कफकारक, सर (विरेचक), अविदाहि, गुरु, वृष्य (शुक्रवर्धक) है । वंशक (बाँस गन्ना)—पौण्ड्रक और भीरुक के समान गुणवाला है, परन्तु कुछ क्षारयुक्त होता है । शतपोर के गुण वंशक के समान हैं, परन्तु कुछ उष्ण एवं वायुनाशक है । कान्तार और तापसेलु के गुण वंशक गन्ने के समान हैं । काष्ठेलु के गुण भी वंशक के समान हैं, परन्तु यह वातप्रकोपक है । सूचीपत्रक, नैपाल, दीर्घपत्र, और नीलपोर वायुकारक, कफ पित्तनाशक, कषायरस, विदाही हैं । कोशकार—गुरु, शीतल, रक्तपित्त एवं क्षय का नाश करता है ॥१५०—१४४॥
अतीव मधुरो मूले मध्ये मधुर एव तु ॥१५५॥
अप्रेषवक्षिषु विज्ञेय इच्छाणां लवणो रसः ॥१५६॥
इत्थु जड़ में अति मधुर होता है, मध्य में मधुर होता है, तथा गन्ने की आँख (पूर्वसन्धि जहाँ पर से गन्ना उगता है) में नमकरस होता है ॥१५५, १५६॥
अविदाही कफकरो वातपित्तनिवारणः ।
वक्रत्रपह्वाद्वनो वृष्यो दन्तनिष्पीडितो रसः ॥१५७॥
दांतों से चूसकर निकाला हुआ रस—अविदाही, कफकारक, वात (पाठ भेद में रक्त)—पित्त का नाशक, मुख को आनन्दित करता है, वृष्य (शुक्रवर्धक) है ॥१५७॥
गुरुविदाही विष्टम्भा यान्न्रकस्तु प्रकांतितः ।
यन्त्र (चरखी) में निकाला रस—गुरु, विदाही* विष्टम्भ
१ विदाही का लक्षण—
“द्वयस्त्वभावादथ गौरवाद् वा चिरेण पाकं जठराग्नियोगात् । पित्तप्रकोपं विदहत् करोति तद्वत्तपानं कथितं विदाहि ॥”
वायुकारक) होता है । (कोल्हू में—वायु-धूप का योग होने से तथा छिलके के भी पेरने से गुरुत्व आदि गुण आ जाते हैं, जिससे देर में पचता है) ।
पक्षो गुरुः सरः स्निग्धः सतोष्णः कफवाततनु ॥१५८॥
आग पर गरम किया रस—गुरु, सर (विरेचक) स्निग्ध,
तीक्ष्ण, कफ-वायु—नाशक है ॥१५८॥
फाणितं गुरु मधुरमभिष्यन्दि वृंहणमवृष्यं त्रिदोषकृच्छ्र ॥
फाणित (राब)—गुरु, मधुर, अभिष्यन्दि, वृंहण, अवृष्य, त्रिदोषकारक है ॥१५९॥
गुडः संक्षारमधुरो नातिशीतः स्निग्धो मूत्ररक्तशोधनो नातिपित्तजिघ्रातद्वनो भेदः क्रमिकफकरो बल्यो वृष्यश्च ॥
मैला गुड—ईशंक्षार, मधुर, थोड़ा शीतवीर्य, स्निग्ध, मूत्रशोधक, पित्त का थोड़ी मात्रा में शमन करनेवाला, वायुनाशक, भेदकफकारक और वृष्य (शुक्रवर्धक) है ॥१६०॥
पित्तद्वनो मधुरः गुडो वातद्वनोऽस्मृकप्रसादनः ।
सपुराणोऽधिकगुणो गुडः पथ्यतमः स्मृतः ॥१६१॥
निर्मल गुड—पित्तनाशक मधुर, वायुनाशक, रक्त को स्वच्छ करता है । पुराना गुड—अधिक गुणशाली एवं अतिशय हितकारी हो जाता है ॥१६१॥
मत्स्यपिंडकाखण्डशर्करा विमलजाता उत्तरोत्तरं शीताः स्निग्धाः गुरुतरा मधुरतरा वृष्या रक्तपित्तप्रशमनास्तृष्णा-प्रशमनाश्च ॥१६२॥
गुड से मत्स्यपिंडका (लाल खण्ड), मत्स्यपिंडका से खाण्ड, खाण्ड से शर्करा, साफ होती है, ये उत्तरोत्तर शीतल, स्निग्ध, गुरुतर (अधिक भारी), मधुरतर, वृष्य, रक्त-पित्त शामक एवं तृष्णा का नाश करती है ।
वि० मन्तभ्य—मत्स्यपिंडका-कच्ची खण्ड-विना मली खण्ड है, इसमें राब का अंश रहता है; खाण्ड—दरदरी खण्ड, कुछ स्वच्छखण्ड मली हुई खण्ड का नाम है, शर्करा—सर्वथा स्वच्छ श्वेत खण्ड का नाम है । शाख विरुद्ध धारणा के कारण—साधारण जनता मलिन खण्ड तथा भुरे गुड को शर्करा (शकर) कहने लग गई है ॥१६२॥
यथा यथैषां वैमत्यं मधुरत्वं तथा तथा ।
स्नेहगौरवशैत्येति सरत्वं च तथा तथा ॥१६३॥
इन गन्ने के विकारों में जिस जिस प्रकार से स्वच्छता आती है, उसी प्रकार से स्नेह (स्निग्धता), गौरव (गुरुता), शीतलता एवं सरत्व (विरेचन गुण) आता जाता है ॥१६३॥
१ क्रियात्मक रूप में शर्करा से खाण्ड और खाण्ड से दानेदार मिश्री (विलायती चीनी) अधिक साफ होती है । खाण्ड से शर्करा कभी भी अधिक साफ नहीं होती । इसलिये 'शर्कराखण्डमत्स्यपिंडका विमला जाता' यह पाठ सम्भवतः ठीक रहता ।