सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
१७६
माद्रीकाल्पान्तरं किंचित् खोजूरं वातकोपनम् । तदेव विशदं रुच्यं कफदन् कशनं लघु ॥ १७४ ॥ कषायमधुरं हृद्यं सुगन्धीन्द्रियबोधनम् । खार्जूरं (खजूर से बना) मद्य—माद्रीक मद्य से गुणों में थोड़ा ही भिन्न है, वायुकोपक, विशद, रुचिकारक, कफनाशक, लघु, कृशता उत्पन्न करनेवाला, कषाय-मधुर, हृदय के लिये प्रिय, सुगन्धित, इन्द्रियों में पटुता उत्पन्न करता है ॥ १७४ ॥ कासाशोऽग्रहणीदोषमूत्राघातानिलापहा ॥ १७५ ॥ स्तन्यरक्तक्षयहिता सुरा बृंहणदीपनी । सुरा कास-अर्श ग्रहणीरोग और मूत्राघात-वायुरोग-नाशक, दूष, रक्त की क्षीणता में हितकारी, बृंहण (शरीरवर्धक) और अग्निदीपक है ॥ १७५ ॥ कासाशोऽग्रहणीश्वासप्रतिशयविनाशिनी ॥ १७६ ॥ श्वेता मूत्रकफस्तन्यरक्तमांसकरी सुरा ।
श्वेत सुरा—कास, अर्श, ग्रहणी, श्वास, प्रतिशयानाशक, मूत्र-कफ-दूष-रक्त और मांस को बढ़ाती है ॥ १७६ ॥ छर्द्यराचकहृत्कुक्षितोदशूलप्रमदंनी ॥ १७७ ॥ प्रसन्ना कफवाताशोऽविबन्धानाहनाशनी । प्रसन्ना (मद्य के ऊपर का स्वच्छ भाग)—वमन, अर्चन, हृद्वरोग, तोद (पीड़ा), शूल को नष्ट करती है, कफवायु, अर्श, विबन्ध, आनाह को नष्ट करती है ॥ १७७ ॥
पित्तलाऽल्पकफा रूक्षा यवैर्वातप्रकोपणी ॥ १७८ ॥ विष्टभिन्नो सुरा गुर्वोऽश्लेष्मलं तु मधूलकम् । रूक्षा नातिकफा वृध्या पाचनी चाक्षिकी स्मृता १७९ कुधान्य यव किण्व द्वारा तैयार की गई सुरा—पित्तकारक, थोड़ा कफ को बढ़ाती है, रूक्ष एवं वायुप्रकोपक है । मधुलिका१ (छोटे गेहूँओं से बनी) सुरा—विष्टभिन्न (गुड़गुड़ शब्द करनेवाली), गुरु एवं कफकारक है । आक्षिकी (बहेड़ों से बनी) सुरा—रूक्ष, कफ को थोड़ा बढ़ाती है, वृध्य, पाचन होती है । यह सुरा बहेड़ों की बलकलों से बनती है ॥ १७८, १७९ ॥
त्रिदोषो भेद्यवृष्यश्च कोहलो वदनप्रियः । माहुषणो जगलः पक्ता रूक्षस्तुटकफशाफकृत ॥ १८० ॥ हृद्यः प्रवाहिकाटोपदुर्नामानिलशोषहृत । कोहल मद्य (जो के सत्तु से बना)—त्रिदोष (तीनों दोषों को उत्पन्न करता है), मेदि, अदृष्य और मुख के लिये प्रिय है । जगल (मद्य के नीचे बैठे, किण्व भाग)—संग्राहि, उष्ण, पाचक (लेप करने से शोथ का), रूक्ष, प्यास-कफ (लेप द्वारा) का नाशक है । हृदय के लिये प्रिय, प्रवाहिका, आटोप (आध्मान), दुर्नाम (अर्श), अनिल (वायु) और शोथ (क्षय) को नष्ट करता है ॥ १८० ॥
१ मधूलिका का अर्थ महुबे के फूलों से बनी भी करते हैं ।
वक्खसो हृतंसारंवाद्धिष्टम्भी वातकोपनः ॥ १८१ ॥ वक्खस (जल रहित किण्व) में सार न रहने से यह विष्टभिन्न (देर में जीर्ण होनेवाला) एवं वायुप्रकोपक है ॥ १८१ ॥ दीपनः सूष्टविषमूत्रो विजदोऽल्पमदो गुरुः । कषायो मधुरः शीघुगौंडः पाचनदीपनः ॥ १८२ ॥ गुड्जन्व (गन्ने के रस को पकाकर उसमें घाव के फूल, और थोड़ा—गुड डालकर बनाया) सीधु—मल-मूत्र निकालने-वाला, थोड़ा मदकारक, कषाय मधुररस, पाचक तथा अग्नि-दीपक है ॥ १८२ ॥
शार्करो मधुरो रुच्यो दीपनो बस्तिशोधनः । वातघ्नो मधुरः पाके हृद्य इन्द्रियबोधनः ॥ १८३ ॥ शर्कराजन्व शीघु-मधुर, रुचिकारक, अग्नि-दीपक मूत्राशय का शोधन करता है । वातनाशक, विषाक में मधुर, हृदय को प्रिय, इन्द्रियों में पटुता उत्पन्न करता है ॥ १८३ ॥ कर्जनः शीतरसिकः इवयथूरतनाशनः । वर्णकूडजरणः स्वयं विबन्धघ्नोऽर्सा हितः ॥ १८४ ॥ शर्करा की भाँति पके हुए रस से बना सीधु—बल एवं वर्ण (गौरादि)—कारक, विरेचक, शोथनाशक, अग्निदीपक, हृदय के लिये प्रिय, रुचिकारक, कफ तथा अर्श रोग के लिये हितकारी है ॥ १८४ ॥
तद्वत् पक्वरसः शीघुर्वलवर्णकरः सरः । शोधनो दीपनो हृद्यो रुच्यः इल्लेष्मार्सा हितः ॥ १८५ ॥ शीतरसिक२ (अपक्व गन्ने के रस से बना) सीधु—शरीर में कृशता उत्पन्न करता है, शोफ और उदररोगनाशक, वर्ण-कारक, अन्नादि को जीर्ण करता है, स्वर के लिये हितकारी, विबन्धनाशक; और अर्श के लिये हितकारी है ॥ १८५ ॥
माक्षिकः पाण्डुरोगघ्नो व्रणः संग्राहको लघः । कषायमधुरः शोभः पित्तघ्नोऽसूक्ष्मप्रसादनः ॥ १८६ ॥ आक्षिक (बहेड़े के छिलकों से बना) सीधु—पाण्डुरोग-नाशक, व्रण के लिये हितकारी, संग्राहि, लघु, कषाय-मधुर, पित्तनाशक, रक्त को स्वच्छ करता है ॥ १८६ ॥
जाम्बवो बद्धनिष्यन्दस्तुवरो वातकोपनः । जाम्बव (जामुन से बना) सीधु—बद्धनिष्यन्द (मूत्र को बन्द करनेवाला), तुवर (कषाय)—रस, वात का प्रकोपक है । (यह मद्य जामुन के रस में घाव के फूल प्रक्षेप करके बना है) । तीक्ष्णः सुरासवो हृद्यो मूत्रलः कफवाततुत् ॥ १८७ ॥ मुखप्रियः स्थिरमदो विजयोऽनिलनाशनः ।
१ "शालिपिष्टकपिष्टचादि कृतं मद्यं सुरा ।"
(२) "इक्षुः पक्वै रसैः सिद्धः सीधुः पक्वरसः स्मृतः ।
आमैस्तेरेव यः सीधुः स शीतरसिको मतः ॥"