सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४४ ]
सुरासव—(सुरा से बना आसव)—तीक्ष्ण; हृदय के लिये प्रिय, मृत्रल, कफ-वातनाशक, मुख के लिये प्रिय, स्थिर-मद (चिरकाल तक मत्ता करनेवाला), वायुनाशक है ॥१८७॥
लघुमध्वासवश्छेदो मेहकुष्ठविषापहः ॥ १८८ ॥
तित्तः कषायः शोफन्ततीक्ष्णः स्वादुरवातकृन् ।
मध्वासव (मधु और गुड से बनाया)—लघु, छेदी (कफ को निकालनेवाला), प्रमेह, कुष्ठ, विषनाशक, तित्तकषायरस, शोफनाशक, तीक्ष्ण, स्वादु एवं गुरु है ॥१८८॥
तीक्ष्णः कषायो मदकृदुर्नार्मकगुरुमहत् ॥ १८९ ॥
कृमिमेदोनिलहरो मरेयो मधुरो गुरुः ।
मरेय (सुरा और आसव को मिलाकर तैय्यार की हुई शराब)—तीक्ष्ण, कषाय, मदकारक, दुर्नम (अर्श), कफगुरुम नाशक, कृमि-मेद-वायु नाशक, मधुर एवं गुरु है ॥१८९॥
वरुणः पित्तहरो वर्ण्यो हृद्यश्चक्षुरसासवः ॥ १९० ॥
गन्ने के रस से बना आसव—बलकारक, पित्तनाशक, वर्ण-कारक, हृदय के लिये प्रिय होता है ॥१९०॥
श्रीधर्मधुकपुष्पोत्थो विदाह्यग्निबलप्रदः ।
रूक्षः कषायः कफहृद्वातपित्तप्रकोपणः ॥ १९१ ॥
महुवे के फूलों से बना सीधु—विदाही, अनि एवं बलवर्धक, रूक्ष, कषायरस, कफनाशक वातपित्तप्रकोपक है ॥
निर्दिशेद्रसतक्ष्यान्यन् कन्दमूलफलासवान् ।
कन्द, मूल, फल (काण्डत्वक) आदि से बने आसवों के गुण इनके रसों के अनुसार ही समझने चाहिये ॥
नवं मध्यमभिष्यन्दि गुरु वातादिकोपनम् ॥ १९२ ॥
अनिष्टगन्धि विरसमहर्द्य च विदाहि च ।
नूतन मध्य—अभिष्यन्दि, गुरु, वात आदि दोषों का प्रकोपक, अवाञ्छित गन्धवाला, रस रहित, हृदय के लिये अप्रिय और विदाहि होता है । (नूतन मध्य—एक साल पुराना न हो, या जिसमें रसोत्पत्ति न हुई हो) ॥१९२॥
सुगन्धि दीपनं हृद्यं रोचिष्युं कृमिनाशनम् ॥ १९३ ॥
स्फुटस्नोतस्करं जीर्णं लघु वातकफापहम् ।
पुरातन (जीर्ण) मध्य—सुगन्धि, रोचिष्युं (अच्छी प्रकार रुचता है), अग्निदापक, हृदय को प्रिय, कृमिनाशक, स्फुट स्नोतस्कर (छोतों को खोलनेवाला), लघु, वायु-कफनाशक है । (पुरातन—एक साल व्यतीत होने पर) ॥१९३॥
अरिष्टो द्रव्यसंयोगसंस्कारादधिको गुणोः ॥ १९४ ॥
बहुदोषहरश्चैव दोषाणां शमनश्च सः ।
दीपनः कफवातघ्नः सरः पित्ताविरोधनः ॥ १९५ ॥
शूलाध्मानोदरसौहृद्वराजीर्णार्शसा हितः ।
अरिष्ट के गुण१—अरिष्ट में आसव से अधिक (अभ्या-चित्रक आदि) द्रव्यों का संयोग होता है, संस्कार से (आसव से अधिक कर्म किये जाने से), गुणों में अधिक होता है । अतः अरिष्ट—बहुत रोगों को नष्ट करता है, दोषों को शान्त करने-वाला है, अग्निदीपक, कफवातनाशक, सर (विरेचक), पित्त को शांता कम करता है । शूल, आध्मान, उदर, प्लीहा, ज्वर, अजीर्ण, अर्शरोग में हितकारी है ॥१९४-१९५॥
पिप्पलूयादिकृतो गुल्मकफरोगहृरः स्मृतः ॥ १९६ ॥
पिप्पलूयाद्यरिष्ट—पिप्पलूयादिगुण से बनाया अरिष्ट—गुल्म-कफ-रोग-नाशक है ॥१९६॥
चिकित्सितेषु वक्ष्यन्तेऽरिष्टा रोगहराः पृथक् ।
रोगनाशक अरिष्टों को पृथक् रूप से चिकित्सास्थान में कहेंगे ।
अरिष्टासवशीघृत्ता गुणान् कर्माणि चादिशेत् ॥ १९७ ॥
बुद्ध्या यथास्वं संस्कारमवेद्य कुशलो भिषक् ।
अरिष्ट (क्वाथ द्वारा सिद्ध-द्रव्य प्रधान), आसव (बिना क्वाथ के सिद्ध-द्रव्य प्रधान), सीधु (गुडकृत), मद्य (द्रव्य एवं द्रवप्रधान-उभयप्रधान), इनके गुण-कर्म को—इनके संस्कार (बनाने की विधि) को देखकर—जो जिस रोग आदि को अपेक्षा से द्रव्य संस्कार किया जाता है, उसके अनुसार इनके गुण-कर्मों को अपनी बुद्धि से वैद्य को जानना चाहिये ॥१९७॥
सान्द्रं विदाहि दुर्गन्धं विरसं कृमिलं गुरु ॥ १९८ ॥
अहर्द्यं तरुणं तीक्ष्णमुष्णं दुर्भाजनस्थितम् ।
अल्पोष्यं पर्युषितमत्यन्च्छं पिच्छिलं च यत् ॥१९९॥
तद्व्यं सर्वथा मद्यं किंचिच्छेषं च यद्भवेत् ।
तत्र यत् स्तोकसम्भारं तरुणं पिच्छिलं गुरु ॥ २०० ॥
कफप्रकोपि तन्मद्यं दुर्जरं च विशेषतः ।
पित्तप्रकोपि बहलं तोदनमुष्णं विदाहि च ॥ २०१ ॥
अहर्द्यं पेल्वं पूति कृमिलं विरसं च यत् ।
तथा पर्युषितं चापि विद्यादन्तिकोपनम् ॥ २०२ ॥
सर्वदोषैरुपेतं तु सर्वदोषप्रकोपणम् ।
सान्द्र (घना), विदाही (देर में जीर्ण होनेवाला), दुर्गन्ध, रसरहित, कृमियुक्त, गुरु, अप्रिय, तरुण (नूतन), तीक्ष्ण, उष्ण (स्पर्श में) कुसित पात्र में स्थित, अल्पोष्य (जिसमें घातको आदि द्रव्य थोड़े पड़े हों), पर्युषित (सन्धान से दूसरे पात्र में रात को रक्खा), अति अच्छ (अत्यन्त पतला), पिच्छिल (गुरु, और जो मद्य नीचे पात्र में थोड़ा बचा हो, वह
१ “अरिष्टः क्वाथसिद्धः स्यात्” आसव-बिना क्वाथ के बना है ।