भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४५ ]

सूत्रस्थानम्

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मद्य सदा त्याज्य है । जिस मद्य में औषधियाँ थोड़ी हों, तरुण (नवीन), पिच्छिल (स्निग्ध) गुरु हो वह कफ को प्रकुपित करने-वाला, और खासकर दुर्जर होता है । बहल (सान्द्र), तीक्ष्ण, उष्ण, विदाही मद्य पित्तप्रकोपक है । अपिय, पेल्व (अच्छ-स्वच्छ), पूति (दुर्गन्धयुक्त), क्रमियुक्त, रसरहित, एवं रात को रक्खा मद्य वायुप्रकोपक होता है । सम्पूर्ण दोषों से युक्त मद्य सब दोषों को प्रकुपित करता है ॥१६८-२०२॥

चिरस्थितं जातरसं दीपनं कफवातजित् ॥२०३॥

रुच्यं प्रसन्नं सुरभि मद्यं सेव्यं मदावहम् । मद्य के गुण—

पुराना देर तक रक्खा, जातरस (रस पूर्ण उत्पन्न हो गया है), अग्निदीपक, कफ-वातनाशक, रुचिकारक, प्रसन्न (निर्मल) सुरभि (सुगन्धि), मदावह (हर्ष उत्पन्न करनेवाला) मद्य सेवन करना चाहिये ॥२०३॥

तस्यानेकप्रकारस्य मद्यस्य रसवीर्यतः ॥२०४॥

सौक्ष्म्यादौष्ण्याच्च तैदण्य्याच्च विकसित्व्याच्च वह्निना ।

समेत्य हृदयं प्राप्य धमनीरुर्ध्वभागतम् ।

विचाल्येन्द्रियचेतांसि वीर्यं मद्ययतेऽचिरात् ॥२०५॥

मद्य जिस प्रकार से मद उत्पन्न करता है, वह कहते हैं—

रस एवं वीर्य के कारण मूद्रीका आदि भेद से अनेक प्रकार का मद्य—अपनी शक्ति द्वारा चक्षु आदि इन्द्रियों को तथा मन को चलायमान (चञ्चल) करके, वह्नि के साथ मिलकर, धमनियों के द्वारा ऊपर की ओर (आग का स्वभाव ऊपर की ओर जाना है) जाकर हृदय में पहुँचकर शीघ्रता से मद उत्पन्न कर देता है । अग्नि के साथ—मद्य के मिलने के कारण—सौक्ष्म से (मद्य सूक्ष्म गुण है), औष्ण्यसे (उष्ण होने से ऊर्ध्व-गामी है), तैक्ष्ण से (तीक्ष्ण होने से शीघ्र मद उत्पन्न करता है), विकासी (सन्धि-बन्धनों को स्थिथिल करता) है ॥२०४, २०५॥

चिरेण श्लैष्मिके पुंसि पानतो जायते मदः ।

आचाराद्वारिके दृष्टिः, पैत्तिके शीघ्रमेव च ॥२०६॥

कफप्रकृति के मनुष्य में मद्य पीने से मद (नशा) देर में उत्पन्न होता है, वातप्रकृति के में जल्दी, पित्त प्रकृति के मनुष्य में भी शीघ्र एवं तीक्ष्ण (तेज) नशा होता है ॥२०६॥

सात्विके शौचदाक्षिण्यहर्षमण्डनलालसः ।

गीताध्ययनसौभाग्यसुरतोत्साहकृन्मदः ॥२०७॥

मानसभेद से मदभेद—

सत्त्वप्रकृति के मनुष्य में नशा होने से—शौच (पवित्रता), दाक्षिण्य (सहायता), हर्ष (आनन्द) मण्डन लालसा (वेश-भूषा की इच्छा), गीत-अध्ययन की इच्छा, गायन, अध्ययन सौभाग्य (कीर्ति), सुरतोत्साह (मैथुन में उत्साह) उत्पन्न होता है ॥२०७॥

राजसे दुःखशीलत्वमात्मत्यागं ससाहसम् ।

कलहं सानुबन्धं तु करोति पुरुषे मदः ॥२०८॥

राजसप्रकृति के मनुष्य में मद होने से—दुःख उठाना, शरीर नाश करने का साहस, निरन्तर लड़ाई-झगड़ा उत्पन्न होता है ॥२०८॥

अगौचनिद्रामात्सर्गम्यागमनलोलताः ।

असत्यभाषण चापि कुर्याद्वि तामसे मदः ॥२०९॥

तमोगुणवाले पुरुष में मद होने से—अशौच (अपवित्रता), निद्रा मात्सर्ग (अदलाई-ईर्षा), अगम्या के गमन की अभिलाषा, असत्य-भाषण—ये लक्षण होते हैं ॥२०९॥

रक्तपित्तकरं शुक्तं छेदनं मुक्ताचनम् ।

वैश्यं जरणं श्लेष्मपाण्डुकृमिहरं लघु ॥२१०॥

तीक्ष्णोष्णं मूत्रलं हृद्यं कफघनं कटुपाकि च ।

शुक्त—(कांजी या मस्तु में गुड़, शहद मिलाकर बनाया) रक्त-पित्तसारक, छेदि (कफ भेदन), भोजन को पचाता है । स्वरभंग करता है, आमाशय में जलन पैदा करता है, कफ-पाण्डुरोग-कृमि-नाशक, लघु, तीक्ष्ण, उष्ण, मूत्रल, कफनाशक और विपाक में कटु है ॥२१०॥

तद्वत्तदासुतं सर्वं रोचनं च विशेषतः ॥२११॥

शुक्त के समान सन्धान द्वारा कन्दादि से बनाये शुक्त भी शुक्त समान गुणवाले हैं, परन्तु विशेष रूप में रुचिकर होते हैं ॥

गौडाणि रसशुक्तानि मधुशुक्तानि यानि च ।

तथापूर्वं गुरुतराण्यभिष्यन्दकराणि च ॥२१२॥

शुक्त के भेद—

गौड़ (गुड़ से बने), रसशुक्त (गन्ने के रस से बनाये), मधुशुक्त (जम्बीर फल के रस से बनाये), तथा—पूर्व (जो जिससे पूर्व है वह, मधुशुक्त से रसशुक्त, रसशुक्त से गुड़शुक्त) गुरु हैं एवं दोष-धातु-मलों में किल्वता उत्पन्न करनेवाले हैं (प्रकोपक हैं) ॥२१२॥

तुषाम्बु दीपनं हृद्यं हृत्पाण्डुकृमिरोगानुत् ।

तुषाम्बु—अग्निदीपक, हृदय के लिये प्रिय, हृदय-पाण्डु कृमिरोग नाशक है ।

ग्रहण्यशौचिकारघनं भेदि सौवीरकं तथा ॥२१३॥

सौवीरक (कांजी)—ग्रहणी-अशौरोग नाशक भेदक (विरेचक) है ॥२१३॥

१ साहस पाँच प्रकार का है । यथा—मनुष्यमारणं स्तंभं परदाराभिषर्पणम् । पारुष्यमनूत्तब्धैव साहसं पञ्चधा स्मृतम् ॥

२ शुक्त का लक्षण—

“यन्मस्त्वादिशुचो भाण्डे सगुडचौद्राकजिकम् ।

षान्यराशो निरावस्थं शुक्तं चूर्कं तदुच्यते ॥”