सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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स्वेदाग्निजननी लब्ध्वी दीपनी वस्तिशोधनी ॥३४१॥
क्षुतृद्धशम्लानिहरी पेया बातानुलोमनी ।
पेया—स्वेद एवं अग्निजनक, लघु, अग्निदीपक, वस्तिशोधक (मूत्रल), क्षुतृ (भूख), प्यास, श्रम और ग्लानि नाशक, एवं वायु का अनुलोमन करती है ॥३४१॥
विलेपी तर्पणी हृद्या ग्राहिणी१ बलवर्धनी ॥३४२॥
पथ्या स्वादुरसा लब्ध्वी दीपनी क्षुर्त्तृषापहा ।
विलेपी—(पेया से सान्द्र-चाटने योग्य)—तर्पणी (वृत्तिकारक), हृद्या (हृदय के लिये प्रिय), संग्राही, बलवर्धक, पथ्या (हितकारी), मधुररस, लघु, अग्निदीपक, भूख-प्यासनाशक है ॥
हृद्या संतर्पणी वृष्या वृंहणी बलवर्धनी ॥३४३॥
शाकमांसफलैर्युक्ता यवाग्बोऽस्म्लारुच दुर्जराः ।
यवाग्—हृदय के लिये प्रिय, सन्तर्पण (वृत्तिकारक) वृष्य (शुक्ल), बलवर्धक है । शाकमांस या फल के साथ पकाने से यवाग् दुर्जर हो जाती है ॥३४३॥
सिक्थैरिंरहितो मण्डः पेया सिक्थसमन्विता ॥३४४॥
विलेपी बहुसिक्था स्याद्यवाग्पूर्विरलद्रवा ।
यवाग् के भेद—
मण्ड—सिक्थ से रहित होता है, पेया—सिक्थ के साथ होती है । २विलेपी—बहुत सिक्थवाली है, ३यवाग्—विरल-द्रव होती है ॥३४४॥
विष्टम्भी पायसो बल्यो भेदःकफकरो गुरुः ॥३४५॥
पायस—खीर विष्टम्भी, बलकारक, भेद-कफ को बढ़ाती है, और गुरु है ॥३४५॥
कफपित्तकरी बलया क्रुशराऽनिलनाशनी ।
क्रुशरा—(तिल चावल और माष से बनाई) कफपित्तकारक, बलकारक और वायुनाशक है ।
धौतस्तु विमलः शुद्धो मनोज्ञः सुरभिः ससः ॥३४६॥
१ कविराज हाराणचन्द्र जी—'हृद्या ग्राहिणी' आदि पाठ नहीं पढ़ते । इसके स्थान पर—'वस्तिसंशोधनी वृष्या ज्वरातिसार्योहिता' यह पढ़कर विलेपी के गुण मानते हैं ।
२ 'विलेपी बहुसिक्था स्यात्' के स्थान पर 'यवाग् बहुसिक्था स्यात्' यह पाठ करते हैं । यह चरक के अनुसार है । परिभाषा—'अन्नं पञ्चगुणे साध्यं विलेपी च चतुर्गुणे ।
मण्डरचतुर्दशगुणे यवाग् षड्गुणेऽस्मसि ॥'
इन्तुणाचार्य ने—'मण्डं पञ्चगुणे तोये, यवाग् षड्गुणे पन्नेत् । चतुर्दशगुणे पेया विलेपी तु चतुर्गुणे ॥' यह पाठ दिया है ।
३ चतुर्विधं भवेद् भक्तं जलदातप्रमाणतः । तत्र भक्तं विलेपी च यवाग् पेयया सह ॥
स्विन्नः सुप्रस्नृतस्तृणो विशद्वस्त्वोदनो लघुः ।
धौत (घुले हुए), निर्मल, शुद्ध, मनोहर, सुगन्धित और अच्छी तरह पके हुए और मांड निकाले हुए उष्ण चावल विशद और लघु होते हैं ॥३४६॥
अधौतोऽप्रस्नृतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥३४७॥
अधौत (न घोये), अप्रस्नृत (बिना मण्ड निकाले)—अस्विन्न (अधपके) शीतल-ओदन (भात) गुरु होता है ॥३४७॥
लघुः सुगन्धिः कफहा विज्ञेयो भृष्टतण्डुलः ।
भृष्ट तण्डुल (भूने चावल) का भात—लघु, सुगन्धि, कफ-नाशक है ।
स्नेहैर्मांसैः फलैः कन्दैर्विदलाम्लैश्च संयुताः ॥३४८॥
गुरवो वृंहणा बलया ये च क्षीरोपसाधिताः ।
स्नेह (घृत आदि), मांस, फल, कन्द, वैदल (शामी धान्य-दालें आदि) और क्षीर (दूध) में बनाये आहार गुरु, वृंहण (देहवर्धक) और बलकारक हैं ॥३४८॥
सुस्विन्नो निस्तुपो भृष्ट ईषत् सूपो लघुहितः ॥३४९॥
सुस्विन्न (भली प्रकार से उबाला), निस्तुप (बिना उप के घुले), थोड़े भूने द्रिदलों का सूप (दालें), लघु तथा हितकारी है ।
स्विन्नं निष्पीडितं शार्कं हितं स्यात् स्नेहसंस्कृतम् ।
अस्विन्नं स्नेहहितमपीडितमतोऽन्यथा ॥३५०॥
स्विन्न (जोश दिया), निष्पीडित (निचोड़ा) और धी आदि स्नेह द्वारा संस्कृत शाक हितकारी है । अस्विन्न, स्नेहहित, एवं बिना निचोड़ा (जिसमें पानी रह गया) शाक अहितकारी है ।
मांसं स्वभावतो वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् ।
स्नेहगोरसधान्याम्लफलाम्लकटुकैः सह ॥३५१॥
सिद्धं मांसं हितं बल्यं रोचनं वृंहणं गुरु ।
मांस—स्वभाव से ही वृष्य (शुक्ल), स्नेहन, बलवर्धक है । यही मांस स्नेह (घृत आदि), गोरस (दही आदि), धान्याम्ल (काझी आदि), फलाम्ल (अनार आदि), कटुक (मरिच आदि) के साथ सिद्ध करने पर, हितकारी, बलकारक, रोचक, वृंहण (देहवर्धक) और गुरु है ।
वि० मन्तभ्य—स्वभावतः कृत्वा मांस, सिद्धमांस—घृत, दही डालकर बनाया मांस—रसेदार मांस ॥३५१॥
तदेव गोरसादानं सुरभिद्रव्यसंस्कृतम् ॥३५२॥
विद्यापित्तकफोद्रेकी बलमांसानिर्बध्ननम् ।
यही मांस—पाक काल में सुगन्धित (स्वग-इलायची आदि) द्रव्यों के साथ मिलाकर, तथा उपयोग काल में गोरस१ (दही या छाछ) के साथ मिलाकर उपयोग करने पर, कफ-पित्त को बढ़ाता है, बल, मांस और अग्नि का वर्धक है ॥३५२॥
१ गोरस शब्द से—दही और तक्र का ही ग्रहण है, दूध का नहीं, क्योंकि दूध मांसरस के साथ नहीं मिलता । यथा—